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संपादकीय: विनिर्माण में सुधार की जरूरत

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पीएलआई योजना कंपनियों का चयन करती है और निवेश और उत्पादन के आधार पर उन्हें 4-6 फीसदी की सब्सिडी देती है।

Last Updated- May 08, 2024 | 9:48 PM IST
India-US Trade Deal

इस समाचार में प्रकाशित खबर के अनुरूप ही इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जों के निर्माण के लिए उत्पादन से संबद्ध प्रोत्साहन योजना (PLI Scheme) बनाने के इरादे से इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने विभिन्न अंशधारकों से कहा है कि वे विभिन्न देशों के साथ प्रतिस्पर्धा में भारत की कमी, निर्यात क्षमता,कलपुर्जों तथा सब-असेंबली के मूल उपकरण खरीदारों के साथ-साथ देश में विनिर्माण संयंत्र स्थापित करने की योजना बना रही विदेशी और देसी कंपनियों के बारे में जानकारी साझा करें।

सरकार का लक्ष्य क्षमता बढ़ाने, किफायत में सुधार करने तथा अगले पांच सालों में 75 अरब डॉलर मूल्य की कलपुर्जा संबंधी पारस्थितिकी तैयार करने का है। हालांकि पुराने उदाहरणों को देखें तो सवाल यही है कि क्या पीएलआई योजना देश के विनिर्माण परिदृश्य को बदलने वाली साबित होगी?

अमेरिका और चीन के मध्य बढ़ते तनाव के बीच भारत बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चीन प्लस एक (चीन से इतर एक अन्य विनिर्माण केंद्र) की रणनीति का हिस्सा बनना चाहता है। इस संबंध में पीएलआई जो कि एक उत्पादन सब्सिडी योजना है, वह विभिन्न क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण क्षमताओं का विस्तार करना चाहती है।

यह सही है कि पीएलआई योजना औद्योगिक नीति के करीब है लेकिन यह भी सही है कि इसकी सफलता सीमित है। देश में मोबाइल फोन निर्माण से जुड़ी पीएलआई को छोड़ दिया जाए तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में महत्त्वपूर्ण विनिर्माण आधार तैयार करने की इच्छुक नहीं नजर आतीं।

यह सही है कि आईफोन का निर्माण देश में सफलतापूर्वक किया जा रहा है लेकिन उसके अधिकांश कलपुर्जे अन्य स्थानों पर बनाए जा रहे हैं। ध्यान रहे कि ऐपल के दो वेंडर विस्ट्रॉन और पेगाट्रॉन ने भारत से कारोबार समेट लिया है।

कुलमिलाकर निवेश भी पीएलआई योजनाओं की शुरुआत वाले अन्य क्षेत्रों के शुरुआती अनुमान से बहुत कम है। इनमें उच्च क्षमता वाले सोलर फोटोवॉल्टिक मॉड्यूल, वाहन और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्र शामिल हैं जिनसे बड़े पैमाने पर कामयाबी की उम्मीद है। दुर्भाग्यवश देश की औद्योगिक रणनीति उत्पादक रोजगार तैयार करने और निर्यात क्षमता में इजाफा करने के बजाय आयात प्रतिस्थापन की ओर झुक रही है।

पीएलआई योजना कंपनियों का चयन करती है और निवेश और उत्पादन के आधार पर उन्हें 4-6 फीसदी की सब्सिडी देती है। यह कहा जा सकता है कि पीएलआई से जुड़ा निवेश वांछित स्तर पर रोजगार तैयार कर पाने में नाकाम रहा। खासतौर पर कम कौशल वाले रोजगार। टेक्सटाइल के लिए पीएलआई का उदाहरण लिया जा सकता है। टेक्सटाइल एक ऐसा क्षेत्र है जहां श्रम की जरूरत बहुत ज्यादा होती है। इसमें रोजगार तैयार करने की बहुत अधिक क्षमता है।

बहरहाल इस क्षेत्र में निवेश के वृद्धि अनुमान से कम रही। जैसा कि सोलहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पानगड़िया ने हाल ही में कहा भी, पीएलआई समग्र औद्योगीकरण का उपाय नहीं है। यह निर्यात क्षमता बढ़ा सकता है और कुछ क्षेत्रों में लाभदायक साबित हो सकता है। इसका इस्तेमाल हर क्षेत्र को सब्सिडी देने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

आयात प्रतिस्थापन तथा राष्ट्रीय स्तर पर चुनिंदा सफलताओं के विचार ने भी टैरिफ संरक्षण में इजाफा किया है। यह उन कंपनियों के लिए अच्छा नहीं है जो वैश्विक मूल्य श्रृंखला में शामिल होना चाहती हैं। औद्योगिक उत्पादन और निर्यात के लिए वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ एकीकरण अहम है।

शुरुआत से ही पीएलआई योजनाओं पर आवंटन की मूल योजना का बहुत छोटा हिस्सा व्यय किया गया है। इसके अलावा सैद्धांतिक स्तर पर भी यह बाजार के कामकाज और अफसरशाही नियंत्रण में इजाफा करने वाला है। ऐसे में नए क्षेत्रों को पीएलआई योजना में शामिल करने के पहले बेहतर होगा अगर सरकार योजना के अब तक के प्रदर्शन का आकलन कर ले।

बड़ी कंपनियों को उत्पादन सब्सिडी देना और टैरिफ संरक्षण मुहैया कराना ही लंबी अवधि में औद्योगिक उत्पादन और निर्यात बढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। भारत को कहीं अधिक गहरे सुधार की आवश्यकता है। मजबूत और टिकाऊ अधोसंरचना, जिसमें हाल के वर्षों में काफी सुधार हुआ है, कम टैरिफ वाली एक मजबूत व्यापार नीति, एक कुशल और नियुक्ति योग्य श्रम शक्ति तथा निवेशकों के अनुकूल कारोबारी माहौल औद्योगिक विकास के लिए अहम है।

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First Published - May 8, 2024 | 9:36 PM IST

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