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सियासी हलचल: तेलंगाना…..चुनाव से आगे कांग्रेस की राह मुश्किल

रेवंत रेड्‌डी अब तेलंगाना के मुख्यमंत्री हैं। रेड्‌डी ने उक्त विरोध परदे के पीछे के रणनीतिकार सुनील कानुगोलू के मशविरे के कारण किया।

Last Updated- December 22, 2023 | 11:13 PM IST
Telangana CM Revanth Reddy

चुनाव बीत जाने के बाद तमाम विश्लेषणों से परे और उनके ऊपर एक या दो ऐसे कारकों पर ध्यान देना आवश्यक है जिन्होंने चुनावी जीत में योगदान किया है। वाई एस शर्मिला जिन्होंने तेलंगाना में वाईएसआर कांग्रेस का अपना संस्करण पेश किया था, उन्होंने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय इसलिए नहीं किया या उन्हें विलय नहीं करने दिया गया कि रेवंत रेड्‌डी ने इसका भारी विरोध किया था।

रेवंत रेड्‌डी अब तेलंगाना के मुख्यमंत्री हैं। रेड्‌डी ने उक्त विरोध परदे के पीछे के रणनीतिकार सुनील कानुगोलू के मशविरे के कारण किया।

कानुगोलू ने उनसे कहा कि शर्मिला जिन सीटों पर दावा कर रही हैं उनके कारण उनकी जीत की संभावनाओं पर बुरा असर होगा क्योंकि शर्मिला की पार्टी में कई दावेदार हैं। उन्होंने इस बात को नकार दिया कि शर्मिला की मौजूदगी कांग्रेस को नुकसान पहुंचाएगी क्योंकि वह मतों में हिस्सेदारी करेंगी।

कानुगोलू कौन हैं? राजनीति के रणनीतिक मशविरा क्षेत्र (यकीन कीजिए ऐसे लोग हैं और बाकायदा पैसे कमा रहे हैं) में उनके समकक्ष कहते हैं कि सबसे बढ़कर वह बहुत अच्छे व्यक्ति हैं। इस क्षेत्र के तमाम अन्य लोगों की तरह उन्होंने भी प्रशांत किशोर के साथ काम किया।

उन्होंने किशोर की गलतियों से सबक लिया और एमबीए और फाइनैंस में एमएस करने तथा मैकिंजी में कंसल्टिंग से जुड़ा एक पद संभालने के बाद जब उन्होंने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक कंसल्टेंसी शुरू की तो वे उन गलतियों को दोहराने से बचे।

किशोर को एक बाहरी व्यक्ति होने का फायदा मिला और उन्होंने इस निष्पक्षता के बल पर राजनेताओं को यह सलाह दी कि उन्हें कैसे अपनी गड़बड़ियों को दूर करना चाहिए। इससे उन्हें एक दल से दूसरे दल में जाने की अतिरिक्त स्वायत्तता मिली।

इस दौरान वह एक खेमे की अंदरूनी जानकारी का इस्तेमाल दूसरे पक्ष को फायदा पहुंचाने के लिए करते थे। सभी दलों के राजनेता उन्हें संदेह की दृष्टि से देखते थे। यही वजह थी कि कांग्रेस की उदयपुर बैठक में प्रशांत किशोर की सलाह को पूरी तरह नकार दिया गया था।

उस समय तक कानुगोलू (कन्नड़-तेलुगू मूल के जो बेंगलूरु में बस चुके थे) अपनी संस्था बना चुके थे और उन्होंने तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) के साथ रिश्ते बनाने की कोशिश की जिसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिली। उन्होंने 2016 के चुनाव में तमिलनाडु में द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम को मशविरा दिया हालांकि पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।

लगभग इसी समय वह कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल और कर्नाटक के दिग्गज कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार की नजर में आए। बहरहाल, प्रशांत किशोर के उलट कानुगोलू से कहा गया कि अगर वह कांग्रेस की मदद करना चाहते हैं तो उन्हें पार्टी में शामिल होना पड़ेगा और फ्रीलांस काम करना बंद करना होगा।

अब वह कांग्रेस के सवैतनिक सदस्य हैं। वह कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के सलाहकार हैं और उनके साथी कहते हैं कि वह जनता की नब्ज को समझते हैं। यह बात विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की सरकार को ’40 प्रतिशत की सरकार’ के नारे में भी सामने आई थी और इन चुनावों में कांग्रेस ने आसान जीत दर्ज की थी।

शिवकुमार ने यह अनुशंसा की थी वे रेवंत रेड्‌डी को सलाह दें। रेड्‌डी खुद कानुगोलू की मदद चाहते थे। सभी संकेत यही कहते हैं कि कानुगोलू हमें आने वाले समय में भी नजर आते रहेंगे हालांकि यह देखना होगा कि वह आगामी लोकसभा चुनावों में उत्तर भारत में पार्टी को कामयाबी दिला पाते हैं या नहीं।

कांग्रेस के सामने जो चुनौतियां हैं उनमें रणनीति तैयार करना तो केवल एक हिस्सा है। पार्टी का जर्जर सांगठनिक ढांचा कहीं अधिक बड़ी चुनौती है।

पार्टी, संचालन को बेहतर ढंग से समझती है। परंतु यहां भी तेलंगाना की सरकार को संघर्ष करना पड़ेगा और उसे चुनावी वादे भी पूरे करने हैं। सरकार बनाने के पहले ही सप्ताह में ही जनता के सामने कांग्रेस की चुनौती की विशालता उजागर हो गई।

भारत राष्ट्र समिति को हार का सामना करना पड़ा क्योंकि लोगों ने पार्टी के विधायकों को दंडित किया। पार्टी ने करीब 80 फीसदी विधायकों को दोबारा टिकट दिया था। हालांकि उसे ऐसा नहीं करने की सलाह दी गई थी। पार्टी ने जिन 14 नए लोगों को टिकट दिए उनमें से 11 को जीत मिली। यानी जनता ने पार्टी की योजनाओं को नहीं बल्कि उसके विधायकों को नकारा। करीब 37 फीसदी मत हिस्सेदारी के साथ भारत राष्ट्र समिति अभी भी एक मजबूत शक्ति है।

कांग्रेस सरकार ने कहीं यह नहीं कहा है कि वह पिछली सरकार की योजनाओं मसलन रैयत बंधु आदि को बंद करने वाली है। इसके बजाय उसने और सहायता देने की घोषणा की: महिलाओं को प्रति माह 2,500 रुपये की राशि, 500 रुपये में गैस सिलिंडर, महिलाओं को राज्य सरकार की बस में निशुल्क यात्रा, किसानों को प्रति एकड़ सालाना 15,000 रुपये की मदद और भूमिहीन कृषि श्रमिकों को सालाना 12,000 रुपये की सहायता राशि।

इसके अलावा पार्टी ने कहा है कि वह सरकार बनाने के एक साल के भीतर दो लाख रिक्तियों को भरेगी। पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में एक विशिष्ट रोजगार कैलेंडर जारी किया था।

प्रदेश के वित्त मंत्री भट्टी विक्रमार्क ने विधानसभा में जो श्वेत पत्र प्रस्तुत किया उससे फंडिंग की चुनौतियां एकदम साफ नजर आती हैं। श्वेत पत्र में कहा गया है कि राज्य की वित्तीय हालत खराब है क्योंकि उसे कर्ज चुकाना है। उसे बजट से इतर लिए गए ऋण को चुकाना है, बड़ी सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करना है जिनमें प्रतिफल कम है और समय अधिक लगेगा। इसका असर शिक्षा और स्वास्थ्य की फंडिंग पर पड़ा है।

हालांकि मुख्यमंत्री रेवंत रेड्‌डी ने विधानसभा में कहा कि यह नई सरकार के वादे पूरे करने के मामले में किसी बहाने की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को ये तथ्य अप्रिय लग सकते हैं लेकिन सच को सच की तरह कहना होगा।

कुल 119 विधायकों वाली विधानसभा में कांग्रेस के 64 विधायक हैं। अपना पक्ष मजबूत करने के लिए उसने सात विधायकों वाली मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी एमआईएम को अपने साथ मिलाया और उसके विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी को विधानसभा अध्यक्ष का पद सौंपा। परंतु भारतीय जनता पार्टी का मत प्रतिशत दोगुना हुआ है और ऐसे में लोकसभा चुनाव एक बड़ी चुनौती साबित होने वाले हैं। उन चुनावों में जीत हासिल करने के लिए कांग्रेस को सुनील कानुगोलू से अधिक की जरूरत होगी।

First Published - December 22, 2023 | 10:44 PM IST

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