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दुर्लभ खनिज, मैग्नेट की चीन से आपूर्ति बाधित, अन्य स्रोतों से आयात की तैयारी

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'केंद्र सरकार इस मसले को हल करने के लिए चीन के साथ बातचीत कर रही है। क्योंकि कोई घरेलू विकल्प मौजूद नहीं है।'

Last Updated- June 08, 2025 | 10:21 PM IST
Electric vehicles (EV)
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

चीन से आपूर्ति में जारी व्यवधान के बीच भारत अब मैग्नेट आयात करने के वैकल्पिक स्रोत की तलाश कर रहा है। एक सरकारी अधिकारी ने जानकारी दी है। उन्होंने कहा कि फिलहाल कोई अस्थायी घरेलू विकल्प मौजूद नहीं होने की वजह से यह कवायद की जा रही है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा चीन पर लगाए गए भारी जवाबी शुल्क के बाद चीन ने 4 अप्रैल से सात भारी और मध्यम दुर्लभ खनिज और मैग्नेट के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है। इनमें सैमेरियम, गैडोलीनियम, टेरबियम, डिस्प्रोसियम, ल्यूटेटियम, स्कैनडियम और यिट्रिटियम शामिल हैं, जिनका उपयोग रक्षा, ऊर्जा और वाहन में किया जाता है। चीनी कंपनियों को अब इनके निर्यात के लिए रक्षा लाइसेंस प्राप्त करने की जरूरत है।

हालांकि, भारत ने यह आश्वासन दिया था कि इन मैग्नेट का उपयोग रक्षा विनिर्माण में नहीं होगा, बल्कि केवल वाहन विनिर्माताओं द्वारा घरेलू उद्देश्यों के लिए किया जाएगा। फिर भी, चीन इन मैग्नेट के संभावित सैन्य उपकरणों में प्रयोग और अमेरिका को निर्यात के बारे में चिंतित है।

संभावित देशों के नाम नहीं जाहिर करते हुए अधिकारी ने कहा, ‘केंद्र सरकार इस मसले को हल करने के लिए चीन के साथ बातचीत कर रही है। मगर इसके अलावा भी हम व्यवहार्य विकल्पों पर विचार कर हैं, क्योंकि कोई घरेलू विकल्प मौजूद नहीं है।’

भारी उद्योग, वाणिज्य और विदेश मंत्रालय के सचिवों और प्रवक्ताओं को भेजे गए सवाल का खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं मिला। उल्लेखनीय है कि वियतनाम, मलेशिया, ऑस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश विकल्प के तौर पर हो सकते हैं। मगर उद्योग के विश्लेषकों और जानकारों का कहना है कि नई आपूर्ति श्रृंखला स्थापित करने में वक्त लगता है और इनमें से कुछ देश फिलहाल छोटे पैमाने में मैग्नेट का उत्पाद कर रहे हैं।

इस बीच, समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने चीन के वाणिज्य मंत्रालय के हवाले से बताया है कि पेइचिंग ने देशों और उद्योगों का नाम बताए बगैर मैग्नेट निर्यात के लिए कुछ आवेदनों को मंजूरी दे दी है। क्रिसिल इंटेलिजेंस के वरिष्ठ प्रैक्टिस लीडर और निदेशक हेमल एन ठक्कर ने कहा, ‘भारतीय वाहन और पुर्जा विनिर्माता चीन के प्रतिबंधों को अपनी आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाने और चीन के अलावा अन्य विकल्प तलाशने के लिए चेतावनी के तौर पर देख रहे हैं। इस प्रक्रिया में मूल रूप से तीन प्रमुख क्षेत्रों पर विचार किया जाना है, जिनमें दुर्लभ  भंडार, निष्कर्षण और प्रसंस्करण शामिल है।’

उल्लेखनीय है कि चीन के पास दुनिया का करीब आधा दुर्लभ भंडार है, 70 फीसदी निष्कर्षण क्षमता और 90 फीसदी प्रसंस्करण क्षमता है। चीन के बाद अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया के पास महत्त्वपूर्ण भंडार है, जबकि भारत के पास सिर्फ 7 से 8 फीसदी भंडार है। बावजूद इसके न तो ऑस्ट्रेलिया, न ब्राजील और न ही अमेरिका मैग्नेट का उत्पादन करता है। हॉन्गकॉन्ग में दुर्लभ अयस्क निष्कषर्ण का 10 से 15 फीसदी हिस्सेदारी है, जबकि जापान और दक्षिण कोरिया का 2 से 4 फीसदी योगदान रहता है। वियतनाम और मलेशिया 7 से 8 फीसदी प्रसंस्करण करते हैं और शेष हिस्सेदारी चीन की है।

ठक्कर ने कहा, ‘इसलिए, दुर्लभ खनिजों के प्रसंस्करण के लिए मलेशिया और वियतनाम विकल्प हो सकते हैं, लेकिन हम यह पता नहीं लगा सकते कि वे अपनी तकनीक का उपयोग करते हैं या उन्होंने चीनी फर्मों से लाइसेंस वाली प्रौद्योगिकियां ली हैं। सोर्सिंग के विकल्पों में ऑस्ट्रेलिया, जापान और संभवतः हॉन्गकॉन्ग शामिल हो सकते हैं।’ मगर उन्होंने चेताया है कि इन देशों की उत्पादन क्षमता सीमित होने के कारण यह एक व्यवहार्य समाधान नहीं हो सकता है।

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First Published - June 8, 2025 | 10:21 PM IST

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