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कार्बन की कम खपत में भारत का फायदा

अजय शाह /  October 26, 2021

कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) एक प्रदूषक है और हवा में जितनी भी सीओ2 मौजूद है उसका बड़ा हिस्सा विकसित देशों की देन है। भारत में कई लोग जो 'जलवायु न्याय' पर जोर देते हैं, उनके लिए इसका अर्थ यह है कि भारत को तब तक कार्बन उत्सर्जन की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है जब तक वह विकसित देश नहीं बन जाता। भारत के अपने हितों और जलवायु न्याय पर सामान्य जोर के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। वैश्विक वित्तीय तंत्र मेंं ऐसे बदलाव आए हैं जो भारत के कार्बन उत्सर्जन आधारित वृद्धि पथ में हस्तक्षेप करते हैं। विकसित देशों ने अपनी स्थिति बदल ली है और लोकतांत्रिक देशों में यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नए सिरे से तय करने का काम करेगा।

हवा में सीओ2 बहुत अधिक है क्योंकि औद्योगिक युग के आरंभ से ही हम इंसान जीवाश्म ईंधन जलाते आ रहे हैं। वायुमंडल में उत्सर्जित कुल सीओ2 में भारत के उत्सर्जन का योगदान 3.1 फीसदी है। यह समस्या हमने नहीं निर्मित की है: इसे अमीर देशों ने जन्म दिया है।

सीओ2 के कारण हुए प्रदूषण में कमी करने के लिए पूरी दुनिया संघर्ष कर रही है। वर्तमान में विश्व स्तर पर सीओ2 का सालाना उत्सर्जन 55 गीगाटन हो चुका है। पेरिस समझौते में बातें इतनी नरमी से कही गई हैं कि उनका उल्लंघन संभव है। ऐसे में बड़ी आपदाओं की संभावनाओं को समुचित रूप से कम करने के लिए उत्सर्जन को सन 2055 तक समाप्त करना होगा। मौजूदा गति से देखें तो 2055 तक उत्सर्जन के 80 गीगाटन वार्षिक हो जाने का अनुमान है। इन तीन बड़े आंकड़ों 55, 80 और शून्य का आकलन करने की आवश्यकता है। आज दुनिया सालाना 55 गीगाटन कार्बन उत्सर्जन कर रही है और अगर पेरिस समझौता कारगर रहा तो यह आंकड़ा स्थिर रहेगा। सन 2055 में हमारे 80 गीगाटन उत्सर्जन करने का अनुमान है जबकि हमें उसे शून्य करना है। इसके लिए प्रयास करने होंगे। सीओ2 को शून्य करने का अर्थ है मौजूदा तेल और कोयला आधारित उद्योगों में भारी बदलाव। महज 35 वर्ष में ये बदलाव हासिल करना आसान नहीं है।

भारत का कार्बन उत्सर्जन सन 2001 के एक गीगाटन वार्षिक से बढ़कर आज 2.6 गीगाटन प्रति वर्ष हो गया है। इसमें सालाना 5 फीसदी की संयुक्त वृद्धि हुई। जबकि वैश्विक उत्सर्जन के मामले में हम 2000 के 4 फीसदी से बढ़कर आज 7 फीसदी पर पहुंच गए हैं। उत्सर्जन के चौथे सबसे बड़े स्रोत के रूप में भारत पर तब ध्यान दिया जाएगा जबकि वह मजबूती से बदलाव न शुरू कर पाए। भारत में सूर्य की रोशनी पर्याप्त मात्रा में है लेकिन हाल के दशकों में ऊर्जा उत्पादन में कार्बन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। जबकि इस अवधि में चीन और ब्रिटेन समेत कई देशों का प्रदर्शन भारत की तुलना में बेहतर रहा है।

यदि भारत कार्बन आधारित भविष्य की ओर बढऩा चाहता है तो दो चीजें उसकी राह रोकेंगी। पहली है पूंजी की लागत। भारत में अचल संपत्ति निवेश परियोजनाएं अब अंतरराष्ट्रीय परिसंपत्ति मूल्यांकन माहौल में नियोजित की जा रही हैं। दुनिया भर में परिसंपत्ति प्रबंधकों के व्यापक संसाधन अब पर्यावरण, सामाजिक और संचालन (ईएसजी) आधारित विश्व के अनुरूप तैयार हो रहे हैं। इसके चलते कार्बन आधारित बिजली संयंत्रों की पूंजी की लागत अधिक है जबकि नवीकरणीय परियोजनाओं की कम। यदि भारतीय कंपनियां जीवाश्म ईंधन का प्रयोग करना चाहती हैं तो उन्हें इसके लिए पूंजी की अधिक लागत का सामना करना होगा। ईएसजी निवेश के लिए यह आवश्यक है कि बड़ी कंपनियां कम उत्सर्जन करें। गूगल जैसी कंपनी ताप बिजली नहीं खरीदती। ईएसजी आधारित निवेश की नई दुनिया भारत की ऊर्जा कंपनियों और ग्राहकों पर दबाव बनाती है कि वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कार्बन उत्सर्जन न करें।

दूसरी समस्या है विकसित देशों के नजरिये की। लोगों को विज्ञान पढ़ाना बहुत मुश्किल है लेकिन बीते 30 वर्षों में बहुत बड़ी तादाद में लोगों को यह समझ में आया है कि सीओ2 एक प्रदूषक है जो पूरी दुनिया को प्रभावित कर रही है। यह भी कि  अगर हमने हवा में इसका स्तर कम नहीं किया तो समस्या कम होने के बजाय बढ़ती ही चली जाएगी। प्यू रिसर्च सेंटर ने 17 विकसित देशों में शोध किया जिसे गत माह प्रकाशित किया गया। इसके मुताबिक 72 फीसदी लोगों को लगता है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन सभी लोगों को नुकसान पहुंचाएगा और 80 फीसदी लोग इससे निपटने के लिए अपने जीवन और काम में बदलाव लाने को उत्सुक थे। करीब 52 फीसदी लोगों को यकीन नहीं था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस समस्या को समाप्त करने के लिए पर्याप्त कदम उठा रहा है अथवा नहीं।

ऐसे लोगों की तादाद बढ़ी है और इसके कारण विकसित देशों के नेताओं का नजरिया बदला है क्योंकि उन्हें लोकतांत्रिक जवाबदेही निभानी पड़ रही है। इसके अलावा उन्हें औसत मतदाताओं के नजरिये में आए बदलाव का अनुसरण करना होगा। इसके चलते अर्थ नीति के विभिन्न हिस्सों में बदलाव संभव है। इससे ईएसजी निवेश को आकार देने वाले नियम और अधिक गहन हो सकते हैं। विकसित देशों के आयात में शामिल कार्बन पर कर लग सकता है। यदि कोई देश जलवायु के प्रश्न पर कुछ ज्यादा कट्टर है तो यह विदेश नीति में लेनदेन का हिस्सा बन सकता है।

प्यू रिसर्च के सर्वेक्षण में पाया गया कि विकसित देशों के 78 फीसदी लोग सोचते हैं कि चीन जलवायु परिवर्तन के लिए एक बुरा कारक है। यह सही है कि आज चीन बहुत अधिक मात्रा में सीओ2 का उत्सर्जन करता है लेकिन उसने जलवायु परिवर्तन को भी तेजी से अपनाया है। चीन में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 2013 में अपने उच्चतम स्तर पर था। चीन में बौद्धिक क्षमता भी है और जरूरी नीतिगत ढांचा भी है जिसकी मदद से चीन के राजनेता यह दिखा सकते हैं कि वे जलवायु परिवर्तन के लिए प्रयासरत हैं। यह बात चीन को लेनदेन की कूटनीति में बढ़त प्रदान करती है।

भारत ने सीओ2 की समस्या नहीं पैदा की है लेकिन हमें अपने हित में काम करना होगा। अंतरराष्ट्रीय परिसंपत्ति मूल्यांकन के अधीन भारत में कार्बन आधारित निवेश को पूंजी की लागत में इजाफे के चलते क्षति पहुंची है। वर्ष 2016 से 2020 के बीच वैश्विक जलवायु परिवर्तन प्रक्रिया का ध्यान कट्टर डॉनल्ड ट्रंप से निपटने पर केंद्रित था। ऐसे में जब पूरी दुनिया 2055 तक उत्सर्जन समाप्त करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है अंतरराष्ट्रीय संबंधों का बदलता माहौल बताता है कि कार्बन खपत कम करने में भारत का फायदा है।

(लेखक पुणे इंटरनैशनल सेंटर में शोधकर्ता हैं)

Keyword: कार्बन उत्सर्जन, कार्बन डाइऑक्साइड, सीओ2, प्रदूषक, जलवायु, जीवाश्म ईंधन,
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