बिजनेस स्टैंडर्ड - राष्ट्रीय शिक्षा नीति का क्रियान्वयन
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति का क्रियान्वयन

अजय शाह /  August 14, 2020

शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में सरकार की उत्पादक, नियामक और वित्त पोषण करने वाली तीन भूमिकाओं में आपसी खिंचाव है। नई शिक्षा नीति (एनईपी) हस्तक्षेप के इन आधारों के बीच अलगाव के प्रस्ताव की शुरुआत करती है। सरकारी क्षमता और नियमन के मामले में जो भी ज्ञान उपलब्ध है उसका बड़ा हिस्सा सक्षम नियामकीय संस्थान स्थापित करने में इस्तेमाल किया जा सकता है। जब विद्यालयों से बेहतर प्रदर्शन की आशा की जाती है और सरकार के संसाधन बच्चे में लगते हैं तो सरकारी विद्यालय और निजी विद्यालय के साथ व्यवहार भी एक समान होना चाहिए। विकेंद्रीकृत व्यवस्था में यह बेहतर ढंग से किया जा सकेगा।

किसी भी क्षेत्र में सार्वजनिक नीति को लेकर जो पहला सवाल पूछा जाना चाहिए वह यही है कि बाजार की विफलता दरअसल क्या है? शिक्षा के क्षेत्र में बाजार की विफलता एक ही है और वह है बाह्य कारकों की मौजूदगी। जब कोई बच्चा ज्ञान अर्जित करता है तो वह पूरे ज्ञान से अकेले लाभान्वित नहीं होता है। बल्कि उस ज्ञान लाभ का आंशिक हिस्सा अन्य सकारात्मक बाह्य कारकों से अर्जित होता है क्योंकि वह दूसरों तक पहुंचता है। बाजार की इस विफलता को वित्तीय सहायता की मदद से दूर किया जा सकता है। मसलन सामान्य कर राजस्व में इजाफा करके और माता-पिता को विद्यालयीन व्यय आंशिक रूप से वापस देकर ऐसा किया जा सकता है।

सूचनाओं की असमानता के रूप में भी बाजार की विफलता सामने आ सकती है। माता-पिता के लिए तय कर पाना मुश्किल होता है कि कोई विद्यालय बच्चों की देखरेख के अलावा भी कुछ कर रहा है। ऐसे में राज्य सरकार के थोड़ा नियमन करने की गुंजाइश बनती है। उदाहरण के लिए हर कक्षा के पहले और बाद में उसके ज्ञान के आकलन की व्यवस्था करना। ऐसी सूचना यदि हर विद्यालय के स्तर पर जारी की जाए तो माता-पिता को यह चयन करने में आसानी होगी कि उनके बच्चों के लिए कौन सा विद्यालय बेहतर होगा।

यह दलील हस्तक्षेप के दो स्तंभों की बात सुझाती है: पहला वित्तीय स्तंभ (माता-पिता को इस प्रकार सार्वजनिक धन मिले कि उसे शैक्षणिक व्यय से जोड़ा जा सके) और दूसरा नियमन स्तंभ (माता-पिता के क्रय संबंधी निर्णयों में सुधार)। भारत में ऐतिहासिक कारणों से सरकार ने अपना प्राथमिक ध्यान तीसरे और अलहदा रास्ते पर केंद्रित कर रखा है और वह है सरकारी पैसे से विद्यालय चलाना। इस राह में तमाम दिक्कतें हैं क्योंकि इसके लिए बनी विशालकाय शैक्षणिक अफसरशाही पर जवाबदेही बहुत कम है।

मौजूदा शैक्षणिक अफसरशाही विद्यालयीन सेवाओं को लेकर वैश्विक दृष्टि से ग्रस्त है। वहां अधिकाधिक धन व्यय करने पर जोर है। दिल्ली के सरकारी विद्यालयों में प्रति छात्र व्यय सन 2013 से 2019 के बीच 123 फीसदी बढ़ गया। वर्ष 2018-19 में यह राशि 66,038 रुपये प्रति छात्र था। इसके अलावा इस बात के प्रमाण बहुत कम हैं कि सरकारी विद्यालयों के बच्चों में सन 2018-19 के शैक्षणिक नतीजे बीते छह वर्षों से कुछ खास बेहतर रहे हों।

शिक्षा क्षेत्र की अफसरशाही ने बच्चों के ज्ञान के मामले में भारतीय भागीदारी को वैश्विक तुलनाओं से बचाया है। मिसाल के तौर पर आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन द्वारा आयोजित प्रोग्राम फॉर इंटरनैशनल स्टूडेंट असेसमेंट में भागीदारी। ऐसी भागीदारी के बाद नागरिक और राजनेता इस महंगे व्यय के बदले अच्छे प्रदर्शन की मांग भी करेंगे।

हस्तक्षेप के तीनों स्तंभों के बीच विवाद की स्थिति है। शिक्षा क्षेत्र की अफसरशाही की विचार प्रक्रिया एक ऐसे निकाय की तरह है जो कमजोर विद्यालयों का संचालन करती है। वही अफसरशाही नियमन के क्षेत्र में सरकार की उत्पीड़क शक्ति का प्रयोग करती है। इस शक्ति का इस्तेमाल निजी विद्यालयों को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है। वही अफसरशाही शैक्षणिक व्यय प्रणाली पर नियंत्रण रखती है। ऐसे में सार्वजनिक धन निजी विद्यालयों तक नहीं पहुंच पाता। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत निजी विद्यालयों को प्रति छात्र 450 रुपये का भुगतान करता है। वहीं सरकारी विद्यालयों में प्रति छात्र प्रति माह 3,064 रुपये खर्च किए जाते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति इन समस्याओं को हल करने की दिशा में कुछ पहलकदमी करती है। इसमें हस्तक्षेप के तीन में से दो स्तंभों को स्पष्ट किया गया है: राज्य स्तर पर शिक्षा महानिदेशालय (सरकारी विद्यालयों के संचालन के लिए जवाबदेह) और हर राज्य में राष्ट्र विद्यालय मानक प्राधिकार (नियामकीय कामों के लिए)। राष्ट्रीय शिक्षा नीति समान कार्य क्षेत्र की बात करती है जहां मानक प्राधिकार को सरकारी विद्यालयों बनाम निजी विद्यालयों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए। इसमें विभिन्न स्तरों पर अध्ययन के बेहतर नतीजों के आकलन की बात शामिल है।

ये तीन तत्त्व अगर सही ढंग से क्रियान्वित किए जाएं तो उपयोगी साबित हो सकते हैं। राज्य क्षमता और नियमन के बारे में बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध है। हमारे देश में इसका इस्तेमाल चीजों को बेहतर बनाने में किया जा सकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जहां इस दिशा में प्रगति हुई है, वहीं इसमें दो बड़ी खामियां भी हैं। पहली कमी है लाभ के लिए संचालित निजी विद्यालयों को लेकर शत्रुता का भाव। यदि मुनाफे के लिए चलने वाले विद्यालय माता-पिता का ध्यान आकृष्ट करते हैं तो अच्छी बात है। इसका लाभ उठाते हुए बेहतर शिक्षा की राह आसान करनी चाहिए और बाजार की विफलता को हल करना चाहिए। दूसरा है एक विकेंद्रीकृत रुख। राष्ट्रीय शिक्षा नीति देश के हर इलाके के लिए एक नीति लागू करने की बात कहती है। यह बात देश के संविधान के मुताबिक नहीं है। संविधान शिक्षा और स्वास्थ्य को राज्य का विषय मानता है। देश की विविधता को देखते हुए भी यह बात कही जा सकती है। शिक्षा को लेकर जननीति की दिक्कतें काफी अलग हैं। मसलन केरल बनाम उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण ले लें। कोई एक ऐसा दस्तावेज नहीं हो सकता है जो दोनों जगह के स्थानीय लोगों के काम आए। केरल के भीतर भी विभिन्न जिलों और शहरों में अंतर है। ऐसे में विकेंद्रीकृत सोच बेहतर साबित होगी।

स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में हमारा देश काफी समय से नीतिगत विफलताओं से दो-चार है। इन दोनों क्षेत्रों में बाजार की विफलता और सरकार की भूमिका को समझना आवश्यक है। सरकारी क्षमता और संसाधन सत्ताधारी प्रतिष्ठान के प्रति झुकाव रखते हैं। फिलहाल वह रुझान विद्यालयों और अस्पतालों के उत्पादन की सुविधाओं के प्रबंधन की वैश्विक दृष्टि रखता है। आगे की राह हस्तक्षेप के तीनों स्तंभों यानी उत्पादकता, नियमन और वित्तीय सहायता को अलग-अलग करने और इन सभी के लिए कड़े जवाबदेही मानक तय करने से निकलेगी।
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं)

Keyword: Foreign Institutions, Education Policy, Higher Education, NEP, विदेशी संस्थान, शिक्षा नीति, स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, एनईपी,
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