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ईवी अपनाने में लागत, रेंज सबसे बड़ी बाधा: टेरी महानिदेशक

ज्योति मुकुल /  July 26, 2019

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस महीने पेश अपने पहले बजट में घोषणा की कि राजग सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देगी। साथ ही उन्होंने डीजल और पेट्रोल पर कर बढ़ाने की भी घोषणा की थी। द एनर्जी ऐंड रिर्सोसेज इंस्टीट्यूट (टेरी) के महानिदेशक अजय माथुर ने ज्योति मुकुल से ई वाहनों और वाहन उद्योग की समस्याओं के बारे में विस्तार से बात की। संपादित अंश:

 
बजट में इलेक्टिक वाहनों (ईवी) को बढ़ावा देने की घोषणा पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है और 1,50,000 रुपये की आय कर छूट से उपभोक्ता ई-वाहन खरीदने के लिए प्रेरित होंगे?
 
निश्चित तौर पर 1.5 लाख रुपये की आय कर छूट से कुछ उपभोक्ताओं का रुझान ई-वाहनों की तरफ बढ़ेगा। उम्मीद है कि इन उपभोक्ताओं से ई-वाहनों की स्वीकार्यता बढ़ाने और ऐसे वाहनों के लिए बाजार बनाने में मदद मिलेगी। 
 
सरकार ने ई-वाहनों पर कर की दर 12 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी करने के लिए जीएसटी परिषद में प्रस्ताव भेजा है। क्या आपको लगता है कि इससे लागत में कमी आएगी और उपभोक्ताओं को ई-वाहन खरीदने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा?
 
निश्चित तौर से जीएसटी प्रोत्साहन से काफी मदद मिलेगी। लेकिन साथ ही हमें बाजार जाकर देखना पड़ेगा कि उपभोक्ता क्या चाहते हैं। जब तक यह बात स्पष्टï नहीं होगी, ई-वाहनों पर बात आगे नहीं बढ़ेगी।
 
क्या ई-वाहनों की आगे की योजना के संबंध में स्थिति स्पष्टï है और देश को ऐसे वाहन अपनाने क्यों अपनाने चाहिए?
 
हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे पाए एक ऐसी ई-वाहन नीति है जो काम करती है। साथ ही इस बारे में भी हमारी समझ स्पष्टï होनी चाहिए कि हमें यह क्यों चाहिए। अगर हमारा लक्ष्य शून्य कार्बन परिवहन व्यवस्था अपनाना है तो हमें इलेक्ट्रॉनिक वाहनों का रुख करना होगा और अक्षय ऊर्जा के स्रोतों से बिजली बनानी होगी। ये दोनों काम साथ-साथ हो सकते हैं। अगर आप केवल हवा को साफ करना चाहते हैं या अगर आप केवल तेल आयात का बिल कम करना चाहते हैं तो इसके लिए दूसरी चीजों भी करनी होंगी लेकिन परिवहन का विद्युतीकरण इन सभी को एक साथ देखता है। इससे आपको स्वच्छ हवा, कम ईंधन आयात और शून्य कार्बन प्रणाली की ओर जाने का लाभ मिलता है। 
 
जन परिवहन प्रणालियों ने ई-वाहनों को अपना लिया है लेकिन क्या इसकी रफ्तार पर्याप्त है?
 
हमें सर्वाधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनो पर ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि इससे ज्यादा असर होगा। बसें सबसे अधिक प्रदूूषण फैलाती हैं। कुछ शहरों को 80 लाख रुपये प्रति बस की बोली मिली है जबकि कुछ शहरों को 45 से 70 रुपये प्रति किमी की बोली मिली है। दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) सीएनजी बस के लिए प्रति किमी 60 रुपये का भुगतान करता है। मुझे लगता है कि कीमतें दुरुस्त हो चुकी हैं और इलेक्ट्रिक बसें सीएनजी से सस्ती हैं। उन्हें रिचार्ज करना आसान है क्योंकि वे वापस डिपो में आती हैं जहां उन्हें चार्ज किया जा सकता है। 
 
क्या राज्य परिवहन विभाग इसमें पर्याप्त काम कर रहे हैं?
 
नहीं। आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय को इसके लिए प्रयास करने चाहिए। मंत्रालय की शहरी परिवहन नीति इलेक्ट्रिक परिवहन से पहले के जमाने में बनाई गई थी लेकिन इसमें सार्वजनिक परिवहन और स्वच्छ परिवहन को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया था। भारी उद्योग मंत्रालय का फेम कार्यक्रम और आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय की स्मार्ट सिटी परियोजना से शहरों को इलेक्ट्रिक बसें खरीदने में मदद मिल सकती है। 
 
लेकिन क्या चार्जिंग और बैटरी को लेकर कोई अनिश्चतता है?
 
सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती बैटरी है। आने वाले समय में बैटरी आज से बेहतर होंगी लेकिन हम इंतजार नहीं कर सकते हैं। जब हम इसका इस्तेमाल करेंगे तो बेहतर प्रौद्योगिकी आएगी। जहां तक कीमत का सवाल है तो बसों के मामले में यह स्थापित हो चुकी है। जब आप अगले चरण में जाएंगे तो आपको टैक्सियों और तिपहिया वाहनों के बारे में सोचना है। निजी वाहनों के मामले में सबसे बड़ी श्रेणी दोपहिया वाहनों की है लेकिन बैटरी चालित दोपहिया वाहन पेट्रोल से चलने वाले वाहनों की तुलना में बहुत महंगे हैं। हालांकि एक बार खरीदने के बाद यह सस्ता पड़ता है। इस समस्या को हल करने के लिए हमें बिजनेस मॉडल की जरूरत है। निजी और सावर्जनिक परिवहन के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों की राह आसान बनाने के वास्ते मार्केटिंग ढांचा बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। हमें बाजार की मांग बनाने की जरूरत है।
 
अगर उपभोक्ता चार्ज को लेकर सुनिश्चित नहीं हैं तो आप उन्हें ई-वाहन अपनाने के लिए कैसे मनाएंगे?
 
उपभोक्ताओं को ई-वाहन अपनाने के लिए मनाना चुनौती है। इसकी लागत और रेंज इसे अपनाने की राह में सबसे बड़ी बाधा हैं। 
 
वाहन बनाने वाली कंपनियां इसमें अहम पक्ष हैं लेकिन वे ई-वाहनों से खुश नहीं हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें बीएस-छह मानक अपनाने को कहा गया था और उन्होंने ऐसा किया। क्या आपको लगता है कि नीतिगत अस्पष्टïता पर उनका रुख सही है?
 
जब आप नई प्रौद्योगिकी अपनाते हैं तो आपको उसे अपने और उपभोक्ताओं के हिसाब से ढालना पड़ता है। ऐसा करना वांछनीय है। क्या ई-वाहनों के संदर्भ में हम इस बिंदु पर हैं? मैं कहूंगा नहीं। इसे वांछनीय बनाने के लिए आपको सस्ते या स्वच्छ या भविष्य की प्रौद्योगिकी के साथ उपभोक्ताओं तक पहुंचना होगा। दूसरी बात यह है कि वाहन की लागत और रेंज हमें स्वीकार होनी चाहिए लेकिन इस समय मैं इस बारे में नहीं जानता हूं। अगर मैं वाहन निर्माता होता तो कोई ऐसी गाड़ी नहीं बनाता जिसे लेकर उपभोक्ताओं के मन में संशय होता। एक बार उपभोक्ताओं ने इसे स्वीकार कर लिया तो सभी वाहन निर्माता इसे बनाएंगे।
 
क्या ई-वाहनों को अपनाने की अनिवार्यता होनी चाहिए और इसके लिए समयसीमा तय की जानी चाहिए?
 
अगर आप किसी चीज को अनिवार्य बना रहे हैं तो किसी और चीज को प्रतिबंधित कर रहे हैं। इसके खिलाफ प्रतिक्रिया हो सकती है। आपको किसी ई-वाहन की कुल क्षमता के अधिक जाना पड़ सकता है। आप पूरा दिन चलाएं और आपको रिचार्ज करने का समय न मिले। ऐसी स्थिति भी हो सकती है कि कोई गांव में रहता है जहां कोई प्रदूषण नहीं है। तो वह पेट्रोल या डीजल वाहन पसंद करेगा। उपभोक्ता की पसंद किसी चीज को प्रतिबंधित करने से बेहतर तरीका है। अलग-अलग उपभोक्ताओं की अलग-अलग जरूरतें होती हैं। जब मैं बीईई में था तो ज्यादा ऊर्जा खपत वाले उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव था लेकिन हमने ऐसा नहीं किया। लेकिन अब वन से फाइव स्टार तक उत्पाद उपलब्ध हैं। वन स्टार वाले उत्पाद में ऊर्जा की ज्यादा खपत होती है लेकिन यह सस्ता बैठता है। यह आप पर निर्भर करता है कि आप कौन सा उत्पाद खरीदते हैं। एलईडी बल्बों की कीमत एक कार्यक्रम के जरिये घटाई गई लेकिन परंपरागत बल्बों पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया। अगर किसी के पास 100 रुपये नहीं होंगे तो वह परंपरागत बल्ब खरीदेगा। इसका एक और उदाहरण चिकन फार्म हैं जिन्हें ऊष्मा और बिजली दोनों की जरूरत होती है। उनके लिए परंपरागत बल्ब ही आदर्श हैं।
 
परिवहन के विद्युतीकरण के खिलाफ भी तर्क दिए जा रहे हैं। इनमें एक तर्क यह भी है कि बिजली उत्पादन से भी प्रदूषण होता है। क्या देश में वाहनों के लिए पर्याप्त बिजली उपलब्ध है क्योंकि देश में बिजली की विश्वसनीयता बहुत कम है?
 
देश में बिजली की स्थापित क्षमता 358 गीगावाट है। हम इसका पूरा इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। इससे लंबे समय तक बिजली की बढ़ती मांग पूरी होती रहेगी। हमारा और सीईए का अनुमान है कि इस क्षमता से 2025-2027 तक बिजली की मांग पूरी होगी। उसके बाद नई क्षमता की जरूरत होगी। इस साल हमने सभी घरों तक बिजली पहुंचा दी है लेकिन अतिरिक्त क्षमता के बावजूद उन्हें चौबीसों घंटे बिजली नहीं मिल रही है। वितरण कंपनियों के साथ समस्या है जो नुकसान झेलने के बजाय लोड कम करना पसंद करती हैं। यहीं हमें लगता है कि अक्षय ऊर्जा बढ़ेगी। जब तक ग्रिड की बिजली उपलब्ध है आप उसका इस्तेमाल करते हैं और जब बिजली चली जाती है तो आप अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं। दिन के दौरान अक्षय ऊर्जा सस्ती है। हमें लगता है कि दिन के समय कृषि जल पंपों के लिए अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल होगा। 
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