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समुद्री लहरों से बनेगी बिजली

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Last Updated- December 14, 2022 | 11:55 PM IST
Rising sea level, will Chennai and Kolkata drown? danger looming over the metropolis

आईआईटी मद्रास के शोधकर्ताओं ने समुद्री लहरों से विद्युत बनाने की तकनीक विकसित कर ली है। इन शोधकर्ताओं ने एक ऐसे उपकरण का निर्माण किया है जो महासागर की लहरों को विद्युत ऊर्जा में बदल देती है। भारत द्वारा जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए साल 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से 500 गीगावॉट विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में यह तकनीक काफी मददगार हो सकती है।

आईआईटी मद्रास के महासागरीय इंजीनियरिंग विभाग के अब्दुस समद कहते हैं कि शोधकर्ताओं द्वारा 2024 तक इस तकनीक के माध्यम से वाणिज्यिक उत्पादन की उम्मीद की जा रही हैं। जो लक्षद्वीप और अंडमान निकोबार के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है।

इनके द्वारा लगभग 40 से 50 गीगावॉट विद्युत का उत्पादन महासागरीय लहरों के माध्यम से किया जा सकता है। भारत के पास 7,500 किलोमीटर लंबी समुद्रतटीय रेखा है, जिसके द्वारा 54 गीगावॉट तक की विद्युत उत्पादन करने की क्षमता है। इसके माध्यम देश की पर्याप्त मात्रा में ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है।

भारत के पास ज्वार ऊर्जा, महासागर तरंग ऊर्जा और महासागर ताप ऊर्जा के माध्यम से 40 गीगावॉट तक का विद्युत उत्पादन संभव है। इसी साल नवंबर के दूसरे सप्ताह में इस उपकरण का सफलतापूर्वक परीक्षण कर लिया गया है। इस उपकरण को तमिलनाडु के तूतीकोरिन तटीय क्षेत्र से 6 किलोमीटर दूर एक स्थान पर 20 मीटर की गहराई पर लगाया गया है। इस उपकरण के माध्यम से अगले तीन सालों में 1 मेगावॉट तक विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।

इस परियोजना के प्रमुख शोधकर्ता अब्दुस समद ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से कहा कि इस परियोजना की सफलता के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र महासागरीय दशक और सतत विकास जैसे उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी। भारत के लक्ष्यों में गहरे समुद्री मिशन, स्वच्छ ऊर्जा और समुद्री अर्थव्यवस्था जैसे उद्देश्यों को प्राप्त करना शामिल हैं।

दुनिया भर के कई देशों और कंपनियों ने पहले ऐसा किया है। अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल जैसे देश इसके जरिये विद्युत पैदा कर रहे हैं। हालांकि यह भारत में पहली बार किया जा रहा है। हम साल 2024 तक इस तकनीक का व्यवसायीकरण करने की योजना बना रहे हैं। इस उपकरण को दूरस्थ तटीय क्षेत्रों की ओर स्थापित किया जाता है जहां रिलिबल इलेक्ट्रसिटी और संचार की जरूरत होती है। इसके लक्षित हितधारक तेल, गैस, रक्षा, सुरक्षा प्रतिष्ठान और संचार क्षेत्र हैं।

समद लगभग एक दशक से अधिक समय से तरंग ऊर्जा पर काम कर रहे हैं, उन्होंने आईआईटी मद्रास में एक अत्याधुनिक वेव एनर्जी ऐंड फ्लुइड्स इंजीनियरिंग लैबोरेटरी (डब्ल्यूईएफईएल) स्थापित कर रखी है। प्रयोगशाला में इस तकनीक के अन्य कई अनुप्रयोगों पर भी शोध कार्य हो रहा है जिसमें समुद्र में चलने वाले छोटे उपकरण, नौवहन आदि के लिए ऊर्जा की आपूर्ति करना शामिल है।

प्रमुख शोधकर्ता समद ने कहा कि भारतीय तटरेखा के साथ विभिन्न स्थानों में एकल उपकरण बड़ी मात्रा में स्वच्छ ऊर्जा उत्पन्न कर सकते हैं। हम एक स्थान से अधिकतम तरंग शक्ति निष्कर्षण के लिए एक विशेष क्रम में में कई उपकरणों को रखने पर भी विचार कर रहे हैं। हमारा लक्ष्य समुद्री ऊर्जा के जरिये भारत को सतत विकास की ओर ले जाना है और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से निपटने के लिए शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को भी प्राप्त करना है।

एक बयान में कहा गया है कि इस प्रोजेक्ट को आईआईटी मद्रास के ‘इनोवेटिव रिसर्च प्रोजेक्ट’ डीएसटी निधि-प्रयास योजना के तहत टीबीआई-केआईईटी और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मामलों और व्यापार विभाग द्वारा ऑस्ट्रेलियाई पूर्व छात्र अनुदान योजना-2022 के माध्यम से अनुदान मिला है।

आईआईटी मद्रास ने इस इस प्रोजेक्ट के परीक्षण के लिए एक स्टार्टअप वीर्य परमिता एनर्जी (वीपीई) और मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी) इलाहाबाद के साथ साझेदारी की थी। इलेक्ट्रिकल स्टोरेज सिस्टम को जीकेसी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग ऐंड टेक्नोलॉजी और एमसीकेवी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग, पश्चिम बंगाल द्वारा डिजाइन किया गया था। वाटरफ्रंट इंजीनियरिंग ऐंड इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड ने इस उपकरण को महासागर में तैनात करने में सहायता की। प्रमुख शोधकर्ता समद ने कहा कि स्टार्टअप वीपीई इस परियोजना के वाणिज्यिक पहलू को देख सकता है।

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First Published - December 14, 2022 | 11:39 PM IST

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