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नए लेबर कोड पर उद्योग जगत की बड़ी आपत्ति, दावा: वेतन के नियम और ग्रेच्युटी से बढ़ेगा भर्ती खर्च

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ये मुद्दे बुधवार को श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के सामने भी उठाए गए। इस बैठक की अध्यक्षता श्रम सचिव वंदना गुरनानी ने की, जिसमें विभिन्न उद्योग संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए

Last Updated- December 25, 2025 | 10:08 AM IST
New Labour Codes
उद्योग संगठनों ने बुधवार को केंद्रीय श्रम सचिव के साथ हुई बैठक में कई मुद्दे उठाए | फाइल फोटो

New Labour Codes: केंद्र सरकार द्वारा नोटिफाइड नए लेबर कोड को लेकर भारतीय उद्योग के प्रतिनिधियों ने चिंता जताई है। उद्योग संगठनों ने खास तौर पर वेतन की परिभाषा और ग्रेच्युटी से जुड़े प्रावधानों में अस्पष्टता की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा है कि इससे कंपनियों की भर्ती लागत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है।

ये मुद्दे बुधवार को श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के सामने भी उठाए गए। इस बैठक की अध्यक्षता श्रम सचिव वंदना गुरनानी ने की, जिसमें विभिन्न उद्योग संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए।

मामले से जुड़े एक व्यक्ति ने बताया कि कुल पारिश्रमिक में से 50 फीसदी वेतन की गणना को लेकर कंपनियों में भ्रम की स्थिति है और इस पर स्पष्टता की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी की पात्रता अवधि घटाकर एक साल कर दी गई है। ये दोनों प्रावधान कंपनियों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालेंगे।

सूत्र के मुताबिक, उद्योग संगठनों से संभावित वित्तीय बोझ का आकलन करने को कहा गया है और इस मुद्दे पर आगे भी कई दौर की बातचीत होने की संभावना है। यह बैठक श्रम मंत्रालय की उस प्रक्रिया का हिस्सा थी, जिसके तहत नए लेबर कोड के ड्राफ्ट नियमों को सार्वजनिक परामर्श के लिए जारी करने से पहले सभी हितधारकों से सुझाव लिए जा रहे हैं।

Also Read: राज्य अपनी जरूरत के मुताबिक बना सकेंगे नए लेबर कोड के नियम, समय-सीमा का पालन जरूरी

New Labour Codes में वेतन और ग्रेच्युटी में क्या बदला?

वेतन संहिता (Code on Wages) के तहत अब फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों को कम से कम एक साल की सेवा पूरी करने पर ग्रेच्युटी का भुगतान किए जाने का प्रावधान किया गया है। इससे पहले वेतन और भत्तों के बीच कोई निश्चित अनुपात नहीं था और कंपनियां सामाजिक सुरक्षा योगदान कम करने के लिए वेतन घटाकर भत्तों का हिस्सा बढ़ा देती थीं।

नए लेबर कोड के तहत अब वेतन में बेसिक पे, महंगाई भत्ता और रिटेनिंग अलाउंस को शामिल किया गया है। यदि हाउस रेंट अलाउंस, कन्वेयंस अलाउंस समेत अन्य भत्ते कुल पारिश्रमिक के 50 फीसदी से अधिक हो जाते हैं, तो 50 फीसदी से ऊपर की राशि को वेतन में जोड़ना अनिवार्य होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कुल पारिश्रमिक का कम से कम 50 फीसदी हिस्सा वेतन के रूप में गिना जाए, जिससे कर्मचारियों के सामाजिक सुरक्षा योगदान में बढ़ोतरी हो सके।

पिछले महीने बिजनेस स्टैंडर्ड को दिए एक इंटरव्यू में श्रम सचिव वंदना गुरनानी ने कहा था कि इन प्रावधानों का मकसद वेतन को कृत्रिम रूप से कम रखकर भत्तों को बढ़ाने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करना है। उन्होंने कहा था कि इससे ग्रेच्युटी में योगदान बढ़ेगा, जो नियोक्ता की जिम्मेदारी है। इसी तरह मातृत्व लाभ भी वेतन से जुड़ा होता है और यह भी नियोक्ता की जिम्मेदारी बढ़ाएगा।

बुधवार की बैठक में भारतीय उद्योग परिसंघ (CII), फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI), एसोचैम और फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो एंड स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (FISME) सहित कई प्रमुख उद्योग संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद थे।

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First Published - December 25, 2025 | 10:00 AM IST

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