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सिंगुर: ममता की कल्याणकारी योजनाएं बनाम उद्योग की लड़ाई

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Last Updated- December 12, 2022 | 6:01 AM IST

सिंगुर में टाटा मोटर्स के नैनो कारखाने के लिए जमीन देने वाले करीब 2,000 असंतुष्ट लोग साल 2008 में तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी के राजनीतिक अभियान के केंद्र में थे। उन दिनों कोलकाता से करीब 40 किलोमीटर दूर ग्रामीण क्षेत्र सिंगुर में लोग दो गुटों में बंट गए थे जिनमें से एक कारखाने के लिए जमीन देने के पक्ष में था जबकि दूसरा गुट जमीन देने के खिलाफ  था। इसके बाद यहां हिंसात्मक आंदोलन हुए और फिर अनिश्चितकालीन घेराबंदी की वजह से आखिरकार कंपनी को यहां से अपने हाथ खींचने पड़े जो अपनी सबसे छोटी कार यहां बनाने की योजना बना चुकी थी।
अब 2021 की बात करें तो आप देखेंगे कि जमीन देने के इच्छुक और अनिच्छुक वर्ग अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राज्य में उद्योग को वापस लाने की मुहिम में साथ एकजुट होते दिख रहे हैं और माकपा भी इसी मुद्दे पर अपनी खोई हुई जमीन हासिल करने की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ  ममता के वफ ादार भी सिंगुर के हितों की बात को भुनाने की भरसक कोशिश में हैं।
नैनो कारखाने को राष्ट्रीय राजमार्ग से लगी 997 एकड़ की खास जमीन आवंटित की गई थी और उन दिनों यह क्षेत्र चुनाव के केंद्र में था। हालांकि अब यह जगह पहचान में नहीं आ रही है और पश्चिम बंगाल में अभूतपूर्व बदलाव वाली घटनाओं का गवाह बने इस क्षेत्र में अब मशहूर नैनो कारखाने के कोई भी निशान नहीं हैं। 2016 में उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद यहां मौजूद धातु स्क्रैप को भी नीलाम कर दिया गया था। एक ऐतिहासिक आदेश में उच्चतम न्यायालय ने 2006 में वाम मोर्चे के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा किए गए भूमि अधिग्रहण को मुल्तवी कर दिया था। वाम मोर्चे की तत्कालीन सरकार ने टाटा मोटर्स को सिंगुर में नैनो का कारखाना लगाने में मदद देने के लिए भूमि अधिग्रहण पर जोर दिया था। अदालत के निर्देश को ध्यान में रखते हुए वहां की जमीन उनके मूल मालिकों को वापस कर दी गई और ‘अनिच्छुक’ किसानों को चेक वितरित किया गया। लेकिन पांच साल बाद भी यह जमीन काफी अव्यवस्थित है हालांकि बीच-बीच में कहीं-कहीं थोड़ी हरियाली दिखती है।   
ममता ने इस जमीन को खेती योग्य बनाने का वादा किया था और हाल ही में सिंगुर की एक जनसभा में कहा था कि सरकार ने इस दिशा में करीब 1,500 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। लेकिन सवाल यह है कि यहां कि कितनी जमीन खेती के योग्य है? इस सवाल पर आप सिंगुर में जिस किसी से भी पूछेंगे, आपका सामना अलग-अलग सच से होगा।   
अपनी मर्जी से जमीन देने वाले उदयन दास ‘सिंगुर शिल्प बचाओ’ समिति के संयोजक भी हैं जो वामपंथ समर्थक उद्योग संगठन हैं। वह कहते हैं कि 50-70 एकड़ जमीन खेती योग्य है जबकि अपनी इच्छा के विरुद्ध जमीन देने वाले और तृणमूल कांग्रेस से जुड़े महादेव दास का कहना है कि करीब 300-350 एकड़ जमीन खेती योग्य है। बातचीत से अंदाजा मिलता है कि जो लोग जमीन देने के ‘अनिच्छुक’ थे उनकी तादाद कम है। भूमि अधिग्रहण में जमीन देने वाले कुल लोगों में उनकी तादाद 20 फीसदी से भी कम है। लेकिन ममता ने उनके पीछे अपनी सारी ताकत लगा दी थी और इस आंदोलन की वजह से ही 34 सालों के वामपंथी शासन का अंत होने की पटकथा लिख दी गई थी।
हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में ही सिंगुर में बदलाव के संकेत तब मिले जब हुगली लोकसभा क्षेत्र से में भाजपा के लॉकेट चटर्जी को 10 हजार से अधिक वोटों की बढ़त मिली थी जिसके अंतर्गत सिंगुर विधानसभा क्षेत्र भी आता है। चटर्जी ने चुनाव जीतने के बाद कहा था कि टाटा को वापस वाला ही उनकी प्राथमिकता होगी और इससे लोगों की उम्मीदें बढ़ीं।
35 साल के सुब्रत घोष पिछले 10 दिनों से सिंगुर में माकपा के सृजन भट्टाचार्य के प्रचार के लिए डेरा जमाए हुए हैं जिन्होंने कारखाने की जमीन पर एक औद्योगिक परियोजना लगाने का वादा किया है। वद्र्धवान विश्वविद्यालय में वाणिज्य विषय में एमए की पढ़ाई पूरी करने के बाद घोष ने सिंगुर में टाटा मोटर्स की कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) परियोजनाओं पर काम किया था और यह सिलसिला करीब तीन से चार महीने तक चला। जब कंपनी यहां से दूसरी जगह चली गई तब घोष नौकरी की तलाश में कोलकाता आए। सिंगुर में केवल उनकी ही उम्मीदों पर पानी फिरने की कहानी नहीं मिलेगी बल्कि ऐसी कई और भी कहानियां हैं। उदयन दास का कहना है कि सिंगुर शिल्प बचाओ समिति से जुड़े कई लोग लोकसभा चुनाव से पहले ही भाजपा में शामिल हो गए क्योंकि वे ‘परिवर्तन’ चाहते थे।
हालांकि भाजपा यहां मुख्य रूप से चुनौती देने वाली पार्टी है जिसने 88 साल के रवींद्रनाथ भट्टाचार्य को चुनाव में उतारा है जिन्होंने एक बार तृणमूल के लिए सिंगुर आंदोलन का नेतृत्व किया था। ऐसे में यह बात पार्टी के खिलाफ  भी जा सकती है। उन्हें तृणमूल के बेचाराम मन्ना के खिलाफ  चुनावी मैदान में उतारा गया है जो इस आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा हैं। सिंगुर में भाजपा का मुख्य चुनावी मुद्दा उद्योग और नौकरियां हैं जो यहां के लोगों के मिजाज के अनुरूप हैं। हाल ही में एक रोड शो में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि भाजपा सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि सिंगुर में छोटे, मझोले और बड़े उद्योग स्थापित किए जाएं। माकपा के 28 साल के प्रत्याशी और छात्र नेता सृजन भट्टाचार्य कहते हैं, ‘औद्योगीकरण के लिए हमारा नारा गलत नहीं था। अगर माकपा जीतती है तो हम कारखाने की जमीन पर फिर से उद्योग वापस लाएंगे क्योंकि यह खेती के लिए उपयुक्त जमीन नहीं है।’ गुरुवार को चुनावी अभियान के अंतिम दिन भट्टाचार्य के साथ ‘भूतेर भविष्यत’ नाम की मशहूर फिल्म के निर्देशक अनिक दत्ता भी थे। दत्ता ने कहा, ‘हर कोई जानता है कि माकपा उद्योग समर्थक थी। अगर वे अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो एक संकेत बाहर जाएगा कि सिंगुर ने अपना मन बदल लिया है।’
सिंगुर में हर कोई अलग-अलग स्तर पर उद्योग के पक्ष में अपने तर्क दे रहा है। हालांकि, ममता को अपनी कल्याणकारी योजनाओं पर भरोसा है जिसके लाभार्थियों की तादाद अच्छी-खासी है। 19 साल के तमाल घोष, पहली बार विधानसभा चुनाव में वोट देंगे। वह बताते हैं कि उनकी बड़ी बहन को ममता की वजह से ही कन्याश्री (उच्च शिक्षा के लिए लड़कियों को वित्तीय सहयोग) योजना के तहत 50,000 रुपये मिले थे और रूपाश्री (वयस्क बेटियों की शादी के लिए 25,000 रुपये का एकमुश्त वित्तीय अनुदान) योजना की वजह से उनकी शादी में मदद मिल पाई थी।  
चंद्राणि मैती अभी युवा हैं जिनके पति की मृत्यु हो चुकी है और वह राज्य सरकार की वजह की वजह से ही अपना जीवन यापन कर पा रही है जिसके तहत उन्हें 2 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से 16 किलोग्राम चावल (लॉकडाउन के बाद से मुफ्त) और 2,000 रुपये प्रति माह (जमीन देने के अनिच्छुक लोगों के लिए) का विशेष भत्ता मिलता है। इसी तरह बंटाईदारी पर खेती करने वाले चांदी मैती, जमीन मालिक के मालिक नित्यानंद सतरा आदि भी इसी कतार में शामिल हैं। हालांकि सिंगुर में ममता ने भी उद्योग के खिलाफ  अपने सुर में बदलाव करते हुए कहा है कि यहां कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना पहले होगी उसके बाद ही बड़े उद्योग भी स्थापित किए जाएंगे।
इस चुनाव में काफी हद तक सांप्रदायिकता की विभाजनकारी राजनीति का दबदबा है लेकिन सिंगुर की लड़ाई दो स्तंभों पर टिकी हुई है और यह उद्योग और ममता की सामाजिक कल्याणकारी योजनाएं हैं। शनिवार को इन पर ही केंद्रित चुनाव होगा। नंदीग्राम में धार्मिक पहचान आधारित राजनीति का बोलबाला देखा गया था लेकिन उसके विपरीत यहां ‘जय श्री राम’ के नारों की गूंज खूब सुनाई देती है। इसकी वजह यह भी है कि नंदीग्राम में अल्पसंख्यकों की आबादी एक-तिहाई है।
‘क्लीन बोल्ड’ हुईं दीदी की पारी समाप्त: मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को राज्य में चुनावी रैलियों को संबोधित करते हुए दावा किया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नंदीग्राम में ‘क्लीन बोल्ड’ हो गईं और चार चरणों का मतदान संपन्न होने के बाद उनकी पारी भी समाप्त हो गई। उन्होंने कहा कि और इस ‘बौखलाहट’ में वह हिंसा पर उतारू हो गई हैं तथा इसके जरिये ‘लोकतंत्र को लूटने’ की साजिश कर रही हैं। वद्र्धमान में चुनावी रैली में प्रधानमंत्री ने ममता बनर्जी पर हमला बोला तो कल्याणी में उन्होंने कूचबिहार की हिंसा को ‘दीदी’ के ‘मास्टर प्लान’ का हिस्सा बताया। बारासात में आरोप लगाया कि पिछले पंचायत चुनावों की तरह वह इस बार भी चुनावों में हिंसा और अशांति फैलाकर ‘लोकतंत्र को लूटने’ की साजिश रच रही हैं।  

राजनीतिक प्रतिबंध लगाया जाए: ममता
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य के भाजपा नेताओं पर सोमवार को निशाना साधते हुए कहा कि जो लोग कूचबिहार जैसी और घटनाओं की पुनरावृत्ति की धमकी दे रहे हैं, उन्हें राजनीतिक तौर पर पर प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे नेता किस तरह के इंसान हैं, जो यह कहते हैं कि सीतलकूची जैसी और घटनाएं होंगी और मृतक संख्या अधिक होनी चाहिए थी। कूचबिहार जिले के सीतलकूची में कथित गोलीबारी में चार लोगों की मौत ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। पुलिस ने कहा था कि शनिवार को स्थानीय लोगों द्वारा कथित तौर पर हमला किए जाने के बाद सीआईएसएफ के जवानों ने गोलीबारी की जिसमें चार लोगों की मौत हो गई।  

तृणमूल एनआरसी पर फैला रही झूठ: शाह
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) को लेकर पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पर पहाड़ के लोगों के बीच झूठ फैलाकर डर पैदा करने का आरोप लगाया और कहा कि गोरखा समुदाय पर इसका असर नहीं पड़ेगा। कलिम्पोंग में एक रोडशो के बाद शाह ने कहा कि जब तक केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार है, गोरखा लोगों को कोई परेशानी नहीं होगी। शाह ने कहा, ‘एनआरसी अभी लागू नहीं हुआ है लेकिन जब भी ऐसा होगा, एक भी गोरखा को जाने के लिए नहीं कहा जाएगा।’ केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा, ‘तृणमूल कांग्रेस गोरखा लोगों के बीच डर पैदा करने के लिए एनआरसी पर झूठ फैला रही है।’

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First Published - April 12, 2021 | 11:12 PM IST

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