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बिजली की मार से मप्र के कारोबारी बेहाल

Last Updated- December 06, 2022 | 9:05 PM IST

पिपरिया शहर में दाल की पैदावार करने वाले दुआ दयाल बीते कई सालों से बिजली की समस्या से लड़ रहे हैं।


मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले का पिपरिया शहर भारत में सबसे स्वादिष्ट दाल उत्पादक के लिए जाना जाता है। लेकिन यहां उत्पन हुई बिजली की विकट समस्या ने कारोबारियों की कमर तोड़ दी है।


अनियमित रूप से बिजली की कटौती की वजह से मानो राज्य के  छोटे व मझोले उद्योगों पर बिजली ही गई पड़ी है। हालांकि यह उद्योग राज्य बिजली नियामक के उच्च प्राथमिकता सूची में दर्ज है।उल्लेखनीय है कि बीते चार सालों में राज्य में जितनी बिजली की व्यवस्था (3000 मेगावाट) की गई है वह बीते  55 साल में मुहैया कराए गए बिजली के बराबर है।


लेकिन इसके बावजूद यहां कई क्षेत्रों में बिजली की समस्या बदस्तूर बनी हुई है। यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं कि राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी इस दिशा में प्रभावी कदम उठाने में नाकाम साबित हुए हैं। इसमें कोई शक नहीं कि अगर राज्य में चीजें योजनाबध्द तरीके से कार्यान्वित की जाती, तो बिजली की लिहाज से मध्य प्रदेश सबसे बेहतर स्थिति में होता।


योजना के तहत जहां 7600 मेगावाट बिजली की उपलब्धता होती वहां सिर्फ 500 मेगावाट की ही कमी का सामना करना पड़ता क्योंकि राज्य में बिजली की अधिकतम मांग 8000 मेगावाट है। लेकिन सबसे दुखद सच्चाई यह है कि यहां की स्थिति बेहद भयावह बनी हुई है और राज्य इस तरह की किसी भी परियोजना से कोसो दूर है।


उल्लेखनीय है कि साल 2006-07 के दौरान जहां राज्य में 35746 मिलियन यूनिट बिजली की जरूरत थी वहीं साल 2007-08 में कुल 40771 मिलियन यूनिट बिजली का इस्तेमाल किया गया। यह भी विदित है कि राज्य में रबी के मौसम में बिजली की मांग 23026 मिलियन यूनिट से बढ़कर 24341 मिलियन यूनिट तक पहुंच गई थी।


इसके अलावा गैर रबी मौसम में भी बिजली की मांग 15677 मिलियन यूनिट से बढ़कर 16430 मिलियन यूनिट तक पहुंच गई थी। अगर आम लोगों की शब्दों में कहें तो पूरे राज्य भर में दो घंट से भी ज्यादा बिजली की कटौती की जाती है। राज्य में बिजली की विकट समस्या की ओर इशारा करते हुए मुख्यमंत्री चौहान ने प्रधानमंत्री को खत लिखा, जिसमें उन्होंने इस समस्या के लिए केंद्र को जिम्मेदार ठहराया है।


उन्होंने बताया, ‘राज्य में कोयले की सप्लाई को कम कर दिया गया है और साथ ही हमारे केंद्रीय हिस्सेदारी को घटाकर सिर्फ 67 मेगावाट कर दिया गया है। केंद्र सरकार भेल पर वीरसिंहपुर बिजली परियोजना द्वारा 500 मेगावाट और अमरकंटक बिजली परियोजना द्वारा 210 मेगावाट को फिलहाल लागू नहीं करने के लिए दबाव डाल रही है।’ बिजनैस स्टैंडर्ड से हुई बातचीत के दौरान भेल के भोपाल यूनिट ने बताया कि देश की किसी भी बड़ी कंपनियों ने इन दोनों परियोजनाओं में कोई भूमिका नहीं निभाई हैं।

First Published - May 5, 2008 | 9:32 PM IST

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