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हर तरफ लगी है आग, जल रहे हैं तमाम लोगबाग

Last Updated- December 05, 2022 | 7:41 PM IST

दुनिया की ज्यादातर अर्थव्यवस्थाएं बढ़ती मुद्रास्फीति (महंगाई दर) की गिरफ्त में आ गई हैं।


बात अमेरिका और ब्रिटेन की हो या फिर चीन, मध्य पूर्व और भारत की, हर देश महंगाई की मार झेल रहा है। दरअसल, महंगाई के कारक कुछ वर्ष पहले से ही पैदा होने शुरू हो गए थे। इराक युध्द ने तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की बुनियाद रख दी थी।


पिछले 3 वर्षों में ज्यादातर कमोडिटीज की कीमतों में जबर्दस्त उछाल आया है। खासकर धातुओं और खाद्य पदार्थों के दाम आसमान छूने लगे हैं, जिसकी वजह चीन, रूस, भारत और मध्य पूर्व के देशों में बढ़ी खपत है।


हालांकि हाल तक ज्यादातर अर्थव्यवस्थाएं मैक्रो-इकोनॉमिक मैनेजमेंट के जरिये इस संकट पर काबू पाने में कामयाब रही थीं।पर पिछले साल भर में कई चीजें बदली हैं और इस वजह से दुनिया की अधिकांश सरकारों और केंद्रीय बैंकों को आनन-फानन में कई कदम उठाने पड़े हैं।


संकट की कड़ी में सबसे ताजा मामला अमेरिका में करीब-करीब तय मंदी और अमेरिकी डॉलर की विनिमय दर में गिरावट के रूप में सामने आया है, जिसका दबाव दुनिया की बाकी अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ा है, चाहें वे विकसित अर्थव्यवस्थाएं हों या विकासशील।


इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि बढ़ती महंगाई दर भारत में भी सबसे ज्वलंत मुद्दा बनकर उभरी है। चुनावी साल को देखते हुए यह मुद्दा संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) और विपक्षी दलों दोनों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बन चुका है। यूपीए के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बढ़ती महंगाई दर की मौजूदा जड़ें भारत से भारत स्थित हैं और ऐसे में भारत में महंगाई दर पर काबू पाना काफी कठिन कार्य होगा।


साथ ही यूपीए के लिए यह टेढ़ी खीर होगी कि वह ऐसा तार्किक कदम उठाए, जिससे निकट भविष्य में महंगाई के दबाव पर काबू पाया जा सके। आयात भी समस्या का समाधान नहीं है, क्योंकि दुनिया भर में खाध्द पदार्थों की मौजूदा कीमतें पहले से ही काफी ज्यादा हैं और यदि भारत सरकार यदि शून्य आयात शुल्क भी कर देती है, तो इसका कोई खास असर देखने को नहीं मिलेगा।


महंगाई से निपटने का एक कारगर तरीका सब्सिडी जरूर है, पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) की मौजूदा हालत को देखकर इस कदम के हश्र का भी अंदाजा लगाया जा सकता है। बहुत संभव है कि पीडीएस के जरिये दी जाने वाली सहूलियतों का फायदा असामाजिक तत्व उठा ले जाएं और गरीब व मध्य वर्ग ऊंची कीमतों की मार झेलने को मजबूर रहें।


महंगाई दर जुड़े शुरुआती आंकड़े यह कहानी बयां कर रहे हैं कि सबसे ज्यादा बढ़ोतरी खाने के सामान की कीमतों में दर्ज की गई है और इसका ज्यादा असर शहरी इलाकों (खासकर दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों) में देखने को मिल रहा है। जाहिर है इसकी ज्यादा मार उन इलाकों को झेलनी होगी, जहां इंडस्ट्री है और सर्विस क्लास के लोग रहते हैं।


इस साल खाने के सामान और किराना के सामान (फूड ऐंड ग्रॉसरी) पर देश भर के लोग अपनी आमदनी का औसतन 42 फीसदी हिस्सा खर्च कर रहे हैं और कम आमदनी वाले भारतीयों को तो आमदनी का 47 फीसदी हिस्सा इन चीजों पर खर्च करना पड़ रहा है।


यदि फूड और ग्रॉसरी की कीमतों में 10 फीसदी का इजाफा दर्ज किया जाता है तो किसी व्यक्ति की आमदनी उसकी मूल आमदनी के मुकाबले 5 फीसदी कम मान ली जानी चाहिए, क्योंकि आमदनी का वह हिस्सा उसे खाद्य पदार्थों की बढ़ी हुई कीमतों के भुगतान पर खर्च करना पड़ता है। हालांकि यह सिध्दांत धनी और संपन्न लोगों पर लागू नहीं होता। अब जबकि महंगाई दर 7 फीसदी से ज्यादा हो चुकी है, लोगों की खर्च करने की क्षमता में कमी 5 फीसदी से ज्यादा मानी जाएगी।


इसका असर यह होगा कि लोग गैर-खाद्य पदार्थों पर किए जाने वाले अपने खर्च में कटौती करेंगे, क्योंकि खाद्य पदार्थों पर किए जाने वाले खर्च में कटौती की ज्यादा गुंजाइश नहीं होती। ऐसे में लोग कपड़ों, बाहर के खानपान, उपभोक्ता वस्तुओं, मनोरंजन और गाड़ियों आदि पर अपने खर्च को सीमित करेंगे।


कुछ मामलों में लोग कपड़ों और बाहर के खानपान आदि पर दूसरे जरिये से कटौती करेंगे, जिनके तहत वे पहले के मुकाबले सस्ते कपड़े खरीदेंगे या फिर खानपान के लिए सस्ते रेस्तरां आदि में जाने लगेंगे। उपभोक्ता वस्तुओं के मामले में लोग इसकी खरीद तब तक नहीं करेंगे, जब तक उन्हें इनकी बेहद सख्त जरूरत महसूस न हो और इन मामलों में खरीदारी को टालने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।


बढ़ती महंगाई दर का सबसे ज्यादा असर हाउसिंग जैसे बड़े निवेश के मामले में दिखेगा, क्योंकि देश का मध्य वर्ग ज्यादा ईएमआई देने की हालत में नहीं होगा।कारोबारियों के लिए भी यह स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण व कड़वी है, जिसे वे चाहकर भी टाल नहीं सकते। यदि वे अपने मौजूदा कारोबारी वॉल्यूम को बनाए रखना चाहते हैं तो उन्हें जहां तक संभव हो, अपने ग्राहकों के लिए कॉस्ट इफेक्टिव यानी पहले के मुकाबले सस्ती चीजें पेश करनी होंगी।


ऐसी स्थिति में सुभिक्षा, बिग बाजार, विशाल मेगा मार्ट और रिलायंस ट्रेंड्स जैसे वैल्यू रिटेलर्स को अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने का मौका मिलेगा। कूटन्स और कॉटन काउंटी जैसे वैल्यू कपड़ा ब्रैंड्स का कारोबार भी परवान चढ़ सकता है। यदि ऐसा होता है तो शॉपर्स स्टॉप और और वेस्टसाइड जैसे प्रीमियम रिटेल ब्रैंड्स के कारोबार पर बुरा असर पड़ेगा।


इसी तरह, कपड़ों या दूसरे कंस्यूमर प्रॉडक्ट्स की मिडल या लोअर प्रीमियर कैटिगरी के ब्रैंड्स पर की हालत ‘नो मैन्स लैंड’ जैसी हो जाएगी, जहां ग्राहक जाने से बचेंगे और इन ब्रैंड्स की बिक्रियों पर दबाव बढ़ेगा। दूसरी ओर, वैल्यू ब्रैंड्स या अपर प्रीमियम कैटिगरी के ब्रैंड या लग्जरी ब्रैंड्स की हालत अच्छी रहेगी या जस की तस बनी रहेगी।


ग्राहकों के लिए वैल्यू प्राइस विकल्प यानी कॉस्ट इफेक्टिव प्रॉडक्ट मुहैया कराने के अलावा कारोबारियों को अपने अंदरुनी खर्चों में कटौती करनी होगी। देश में पेशेवरों की तनख्वाहें पहले ही गैर-बराबरी के स्तर तक जा चुकी हैं। ऑफिस किराए, ट्रैवल आदि से लेकर कई मोर्चों पर कंपनियों की ऑपरेटिंग कॉस्ट में इजाफा हो रहा है। कंपनियों को इन चीजों पर काबू करने की पहल करनी होगी।


अगले 1 साल या उससे ज्यादा वक्त तक दुनिया भर में और जाहिर तौर पर भारत में भी, महंगाई की प्रवृत्ति बनी रहेगी। तब तक कंपनियों और कारोबारियों को उचित कदम उठाने होंगे। यह वह दौर नहीं है, जब व्यापार को ‘जस की तस हालत’ में चलाने की हिमाकत की जाए।

First Published - April 9, 2008 | 11:33 PM IST

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