नए साल यानी 2026 के आगाज के मौके पर शराब का जमकर सेवन हुआ। एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत में इस दौरान शराब खपत के 1.2 से 1.5 करोड़ मामले सामने आए। दूसरी तरफ, उसी रात मुंबई में शराब पीकर वाहन चलाने से जुड़े मामले रोकने के लिए मुंबई पुलिस ने अपनी तैनाती दोगुना बढ़ा दी। पुलिस की सख्त तैनाती से शराब पीकर वाहन चलाने से जुड़े मामले 37 फीसदी कम रहे।
शराब का प्रशासन (उत्पादन, वितरण, बिक्री और कराधान) सार्वजनिक नीति का सबसे विवादास्पद पहलू रहा है। शराब सेवन के साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य, सामाजिक नैतिकता और वित्तीय आवश्यकता, ये तीनों पहलू जुड़े हैं। सरकार के लिए यह चुनौती बेमियादी और बड़ी है। इसकी वजह यह है कि आखिर कोई पूरी जिम्मेदारी से उस पदार्थ का प्रबंधन कैसे करे जो राजस्व का एक प्रमुख स्रोत है मगर समाज के लिए एक बड़ा खतरा भी है?
शराब कारोबार में सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत मौलिक अर्थशास्त्र से शुरू होती है। शराब सेवन समाज पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसके सेवन से होने वाले नुकसान (सार्वजनिक अशांति, यातायात दुर्घटनाएं, घरेलू दुर्व्यवहार, उत्पादकता का नुकसान और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव) न केवल इसका सेवन करने वाले लोगों को प्रभावित करता है बल्कि समाज भी इसकी जद में आ जाता है। लिहाजा, शराब से सामाजिक ताने-बाने को जो नुकसान पहुंचता है उसका आकलन नहीं हो पाता है। अगर शराब कारोबार पूरी तरह बाजार पर छोड़ दिया जाए तो इसकी खपत जरूर बढ़ जाएगी, मगर इसके सामाजिक परिणाम खतरनाक होंगे।
यह मूलभूत बाजार विफलता सामाजिक दुष्प्रभाव और नुकसान कम करने के लिए सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत पर बल देती है। हालांकि, सरकारी हस्तक्षेप दो कारणों से थोड़ा नरम रहना चाहिए। पहली बात, शराब हेरोइन जैसी वस्तुओं की श्रेणी में नहीं आती है जिन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना जरूरी है। ज़्यादातर समाज में, इसका सीमित मात्रा में सेवन करना व्यक्तिगत पसंद-नापसंद की बात है। इसे देखते हुए सार्वजनिक नीति का लक्ष्य शराब पर प्रतिबंध लगाना नहीं बल्कि जिम्मेदारी के साथ इसके सेवन की अनुमति देते हुए सामाजिक स्तर पर होने वाले नुकसान को कम से कम करना है।
दूसरी बात, सरकार की उपलब्ध सीमित क्षमता एवं संसाधन का इस्तेमाल बुद्धिमानी से होना चाहिए। उदाहरण के लिए इनका इस्तेमाल सामान्य कानून लागू करने एवं सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने, शिक्षा की निगरानी और बेहतर स्वास्थ्य सेवा के लिए होना चाहिए। लिहाजा शराब के लिए नियामकीय ढांचा सरल, कुशल और स्व-निष्पादित होना चाहिए। यह लगातार निगरानी पर केंद्रित न होकर कीमत से जुड़े पहलुओं और संरचनात्मक नियंत्रणों पर अधिक निर्भर होना चाहिए।
शराब के सुरक्षित और जिम्मेदारी के साथ उपभोग के लिए सरकार के पास उपलब्ध जरूरी उपाय दो श्रेणियों में आते हैं। पहला गैर-मूल्य विनियमन और दूसरा कराधान। गैर-मूल्य विनियमन का उद्देश्य उपभोग के संदर्भ और पहुंच को नियंत्रित करना है। इनमें उपभोग के लिए सख्ती से न्यूनतम आयु निर्धारित करना और कमजोर आबादी एवं संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों की रक्षा के लिए कठोर, सामुदायिक-भागीदारी वाली स्थानीय नीतियों को लागू करना शामिल है।
हालांकि, कराधान (आबकारी शुल्क) ऐसा पहलू है जहां स्थिति अधिक जटिल हो जाती है। भारत में शराब को विनियमित करने और कर लगाने की शक्ति सीधे तौर पर राज्यों के पास है।
देश के सभी राज्यों में आबकारी शुल्क राजस्व के एक प्रमुख स्रोत के रूप में उभरा है खासकर माल एवं सेवा कर (जीएसटी) की शुरुआत के बाद। राज्यों के अपने कुल कर राजस्व में इसकी हिस्सेदारी अब शराब पर प्रतिबंध वाले राज्यों में नगण्य स्तर से लेकर 30-35 फीसदी (पुदुच्चेरी) तक है और कई बड़े राज्यों में यह 15 से 25 फीसदी के दायरे में है।
आर्थिक आंकड़ों के लिहाज से आबकारी शुल्क संग्रह शराब पर प्रतिबंध लगाने वाले राज्यों में शून्य के करीब है मगर राजस्व के लिए इस पर निर्भर राज्यों जैसे छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में यह सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के लगभग 1.5 से 2 फीसदी तक पहुंच जाता है। अधिकांश दूसरे राज्यों के जीएसडीपी में इसकी हिस्सेदारी 0.5 फीसदी से 1.2 फीसदी के बीच है।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पिछले 7-8 वर्षों में जीएसडीपी में शराब से अर्जित राजस्व की हिस्सेदारी बढ़ी है। इसका कारण यह है कि जीएसटी की शुरुआत ने राज्यों के लिए उपलब्ध स्वतंत्र कर साधनों की संख्या में काफी कमी की जिसके परिणामस्वरूप राजस्व बनाए रखने के लिए गैर-जीएसटी स्रोतों, विशेष रूप से शराब आबकारी शुल्क पर निर्भरता बढ़ती गई।
यह स्थिति बुनियादी रूप से नीतिगत स्तर पर टकराव पैदा करती है। यानी सामाजिक दुष्प्रभाव कम करने के साथ ही कर राजस्व अधिक से अधिक बढ़ाने का वित्तीय दबाव। इस टकराव का सैद्धांतिक उत्तर अधिकतम राजस्व अर्जित करने के बजाय इसे एक संतुलित स्तर तक रखने की तरफ कदम बढ़ाना है। संतुलित राजस्व का अर्थ है कर की दर बजट घाटा पूरा करने के लिए नहीं बल्कि एक विशिष्ट सार्वजनिक नीतिगत परिणाम हासिल करने के लिए निर्धारित करना ताकि समाज को दुष्प्रभावों से बचाया जा सके।
सैद्धांतिक रूप से इसका ठोस समाधान पिगौवियन सिद्धांत को लागू करने में निहित दिख रहा है। इस सिद्धांत के मुताबिक आबकारी शुल्क को शराब के सेवन से समाज पर होने वाले दुष्प्रभावों के अनुमानित आर्थिक मूल्य के अनुरूप निर्धारित किया जाता है। अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च व्यवहार दर्शाते हैं कि यह सिद्धांत लागू करने का सबसे प्रभावी तरीका पेय पदार्थ में अल्कोहल की मात्रा के अनुपात में आबकारी शुल्क निर्धारित करना है।
यह तरीका पेय पदार्थों या उनकी श्रेणी की कीमत के आधार पर भ्रामक और मनमाना कराधान रोकता है और सामाजिक नुकसान के स्रोत यानी एथनॉल पर निशाना साधता है। एल्कोहल की अधिक मात्रा वाले पेय पदार्थ पर कम मात्रा वाले पेय पदार्थों (जैसे बीयर) के अनुपात में अधिक कर लगाया जाता है। इससे एक स्पष्ट संकेत जाता है और उपभोक्ताओं का झुकाव कम एल्कोहल वाले पेय की तरफ बढ़ता है।
मगर उपलब्ध प्रमाणों से स्पष्ट हो जाता है कि भारत की वर्तमान आबकारी शुल्क कराधान संरचना बिल्कुल इसके उलट है जिसमें एथनॉल की प्रति यूनिट मात्रा के हिसाब से एल्कोहल की अधिक मात्रा वाले शराब की तुलना में कम एल्कोहल वाले वाले पेय पदार्थों पर अधिक कर लगाया जाता है।
औसतन देखें तो बीयर पर व्हिस्की की तुलना में प्रति यूनिट एथनॉल पर 30 से 70 फीसदी अधिक कर लगाया जाता है जिससे इस तर्क को बल मिलता है कि भारत का वर्तमान शराब कराधान ढांचा तर्कसंगत नहीं है। इसके बजाय यह संरचनात्मक रूप से कम एल्कोहल वाले पेय पदार्थों पर अधिक कर लगाता है जबकि तुलनात्मक रूप से अधिक एल्कोहल वाले पेय के साथ नरमी के साथ पेश आता है।
कराधान उपायों के बाद अनुपालन आसान बनाने और उपभोक्ता सुरक्षा में सुधार के लिए नियामक ढांचा सुव्यवस्थित किया जाना चाहिए। मादक पेय पदार्थों की सुरक्षा एवं मानक पहले से ही भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के अधिकार क्षेत्र में हैं। राज्य सरकारों को अपने उत्पादन नियमों को स्थापित एफएसएसएआई मानकों के अनुरूप करना चाहिए। यह अनुरूपण संयुक्त क्रियान्वयन तंत्रों की अनुमति देगा जिससे उद्योग पर अनुपालन बोझ काफी कम हो जाएगा। शराब कारोबार को वर्तमान में राज्य के कई विभागों और केंद्रीय निकायों से दोहरे और अक्सर विरोधाभासी निर्देशों का पालन करना पड़ता है।
लिहाजा नए नियामक और कराधान ढांचे में पांच पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए:
1. कर संरचना पूरी तरह पेय पदार्थों में एल्कोहल की मात्रा पर आधारित होनी चाहिए
2. सुरक्षा और गुणवत्ता के लिए एफएसएसएआई मानकों के साथ पूर्ण तालमेल हो
3. स्थानीय मानदंडों (शैक्षिक/धार्मिक स्थलों से दूर) और पीने की न्यूनतम आयु से जुड़े नियमों को सख्ती से लागू किया जाए
4. कुशल उत्पादन एवं वितरण निर्धारित करने की बाजार को अनुमति देने के लिए अन्य सभी मनमाने प्रतिबंधों को आसान बनाना और समाप्त करना चाहिए
5. सरकार को अधिकतम राजस्व हासिल करने वाली इकाई की भूमिका से पीछे हट कर सार्वजनिक स्वास्थ्य के नियामक और संरक्षक के रूप में अपनी उपयुक्त भूमिका पर ही विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करना चाहिए
राजस्व के लिए लालायित, दंडात्मक नियामक व्यवस्था को इष्टतम एवं स्पष्ट लक्षित नियमन पर आधारित एक सैद्धांतिक ढांचे में परिवर्तन कर राज्य अपने प्रतिस्पर्द्धी सार्वजनिक हितों को बेहतर ढंग से प्रबंधित कर सकते हैं।
(लेखक आइजक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी में मानद वरिष्ठ फेलो और पूर्व अफसरशाह हैं)