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चीन से FDI लाने से पहले कुछ विचार जरूरी, व्यापार संतुलन जितना लगता है उतना आसान नहीं

यह कहा जा रहा है कि भारत में चीन के निवेश से व्यापार संतुलन बेहतर होगा मगर यह जितना आसान लगता है उतना है नहीं। बता रही हैं अमिता बत्रा

Last Updated- September 05, 2024 | 9:24 PM IST
Strong fundamentals, major investments to propel India's FDI in 2026

वर्ष 2023-24 की आर्थिक समीक्षा में चीन से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को बढ़ावा देने का सुझाव दिया गया है। इस पर बहस भी हो रही है परंतु हमें निम्न बातों पर भी विचार करना चाहिए। पहली बात, वैश्विक स्तर पर एफडीआई निवेश में विकसित अर्थव्यवस्थाओं की भारी भरकम हिस्सेदारी है। इनमें अमेरिका और जापान सबसे आगे हैं। विदेश में निवेश करने वाली शीर्ष 100 बहुराष्ट्रीय कंपनियों (एमएनसी) में 80 प्रतिशत यूरोप, अमेरिका और जापान से हैं। चीन से एफडीआई निवेश बढ़ रहा है और पिछले कुछ वर्षों के दौरान महत्त्वपूर्ण खनिज, वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था पर निर्भर विनिर्माण खंडों जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स, मोटर वाहन और हरित ऊर्जा में निवेश तेजी से बढ़ा है।

चीन में उत्पादन आवश्यकता से अधिक होने और आर्थिक सुस्ती के हालात बनने के बाद वहां से बाहर होने वाले निवेश की दशा-दिशा भू-राजनीतिक कारणों, निर्यात बाजारों में ऊंचे शुल्क से बचने पर ध्यान और टिकाऊ आपूर्ति व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए महत्त्वपूर्ण संसाधनों के इंतजाम आदि पर निर्भर करती है। चीन की कंपनियों से होने वाले निवेश का एक बड़ा हिस्सा दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को जाता है। चीन बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) में शामिल देशों में भी बुनियादी ढांचा तैयार करने में मदद कर रहा है।

दूसरी बात, चीन से इतर दूसरे देशों में निवेश करने की बहुराष्ट्रीय कंपनियों की रणनीति (चाइना प्लस 1) में फिट बैठना भारत के लिए आसान नहीं हो रहा है। उसे अन्य तेजी से उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं से प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ रहा है। ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन में उत्पादन क्षमता बरकरार रखने या इसमें और इजाफा करने के साथ अतिरिक्त वैकल्पिक निवेश के स्थानों की खोज भी कर रही हैं। चीन में संयंत्र स्थानीय बड़े बाजार में मांग पूरी करते हैं वहीं, अतिरिक्त उत्पादन संयंत्र वैश्विक आर्थिक, जलवायु एवं राजनीतिक घटनाओं से उत्पन्न हालात से तत्काल निपटने के लिए तत्काल काम आते हैं। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि जीवीसी टिकाऊ रहे।

वैश्विक मूल्य श्रृंखला (जीवीसी) में विविधता लाने के मामले में वियतनाम, थाईलैंड और मलेशिया जैसे आसियान देश भारत से आगे निकल गए हैं। मध्य अमेरिका (खासकर मेक्सिको), उत्तर अमेरिका और मध्य एशिया की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाएं चीन की बहुराष्ट्रीय कंपनियों (चीन की कंपनियां भी शामिल) के लिए निवेश के आकर्षक वैकल्पिक स्थान के रूप में उभरे हैं।

तीसरी बात, जीवीसी में विविधता लाने के लिए चल रही प्रतिस्पर्द्धा और एफडीआई के संदर्भ में कई महत्त्वपूर्ण अंतर देखने को मिलते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए भारत में घरेलू बाजार के बड़े आकार और व्यापार पर घटती लागत जैसी खूबियों को तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है।

भारत में मध्यम वर्ग की तादाद अधिक जरूर है मगर यह उपभोग के मामले में पीछे चल रहा है और विभिन्न उत्पाद श्रेणियों में इसकी प्रति व्यक्ति व्यय क्षमता न केवल चीन बल्कि थाईलैंड और वियतनाम जैसे कुछ एशियाई बाजारों की तुलना में कमजोर साबित हो रही है। जहां तक व्यापार लागत की बात है तो यह परिवहन एवं लॉजिस्टिक खर्च और ऊंचे शुल्क एवं गैर-शुल्क बाधाओं सहित सीमा पर जिंसों की आवाजाही में पेश आने वाली रुकावटों से संबंधित है।

पिछले तीन दशकों में वैश्विक स्तर पर औसत शुल्क कम होकर 0 से 5 प्रतिशत के बीच रह गया है। बहुपक्षीय सहयोग और तरजीही व्यापार समझौतों से यह संभव हो पाया है। उदाहरण के लिए आसियान अर्थव्यवस्थाओं ने 1993 के शुरू से ही साझा प्रभावी तरजीही शुल्क योजना के माध्यम से अपने शुल्क कम करने शुरू कर दिए थे।

2020 तक आसियान अब लगभग शुल्क मुक्त क्षेत्र बन गया और आसियान ट्रेड इन गुड्स एग्रीमेंट में लगभग 99 प्रतिशत उत्पाद पूरी तरह शुल्क मुक्त हो गए हैं। इसकी तुलना में पिछले कुछ वर्षों के दौरान विनिर्माण क्षेत्र में औसत सर्वाधिक तरजीही देश (एमएफएन) शुल्कों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हुई है। कुछ उत्पाद श्रेणियों में शुल्कों में हाल में हुई कमी की गई है।

भारत के विनिर्माण क्षेत्र के शुल्कों को दूसरे तेजी से उभरते बाजारों (ईएमई) के अनुरूप करने के लिए अन्य श्रेणियों में भी शुल्कों में कमी की जानी चाहिए। आसियान ने चीन के साथ मुक्त-व्यापार समझौता (एफटीए) भी कर रखे हैं। आसियान के सभी देश और चीन क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसेप) के भी सदस्य हैं।

इसका लाभ यह है कि साझा नियामकीय मानदंड, मूल स्थान के नियम-कायदे और सक्षम सीमा शुल्क निपटान प्रणाली सभी व्यापार पर लागत कम कर देते हैं। इससे ये देश एफडीआई के लिए आकर्षक (दुनिया और चीन दोनों के लिए) बन जाते हैं। भारत ने भी एफटीए करने की मुहिम तेज की है मगर इसमें तेजी लाकर इनका दायरा और बढ़ाने की जरूरत है।

लॉजिस्टिक के मामले में भी भारत ने प्रगति की है और इसमें सभी मोर्चों पर इसका प्रदर्शन सुधरा है, मगर एक ठोस सीमा शुल्क निपटान प्रणाली के मामले में यह वियतनाम, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देशों से यह अब भी पीछे चल रहा है। अगर कोई बाजार बड़ा है मगर उसने शुल्क अधिक रखे हैं तो जो एफडीआई आएंगे उनकी गुणवत्ता बेहतर नहीं होगी और अधिक फायदा नहीं मिलेगा। भारत को निर्यात पर विशेष ध्यान देते हुए अपनी व्यापार एवं औद्योगिक नीतियों को उदार बनाने की जरूरत है, ठीक उसी तरह जैसे पूर्वी एवं दक्षिण-पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं ने किया है।

चौथी बात, किसी जीवीसी व्यवस्था में निवेश और व्यापार के बीच अभिन्न संबंध होता है। यह सोचना सही नहीं है कि चीन से एफडीआई आने से वहां से आयात कम हो जाएगा या इसमें कमी आ सकेगी। व्यावहारिक सिद्धांत और हाल के व्यापार के रुझान दर्शाते हैं कि जीवीसी के पुनर्गठन की जारी प्रक्रिया और चीन की विकास रणनीति एक बार फिर आंतरिक आर्थिक गतिविधियों पर केंद्रित होने से यह (चीन) मध्यवर्ती वस्तुओं का सबसे बड़ा निर्यातक एवं आयातक है और ‘दुनिया की फैक्टरी’ कहलाता है।

चीन से नए एफडीआई पाने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में चीन से मध्यवर्ती वस्तुओं का आयात पिछले तीन दशकों के दौरान लगभग तीन गुना हो गया है। वियतनाम, मलेशिया और मेक्सिको बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए जीवीसी में विविधता लाने के महत्त्वपूर्ण वैकल्पिक निवेश स्थान बन गए हैं। ये देश चीन से निवेश पाने वाले सबसे बड़े देशों में शुमार हैं। ऐसा पाया गया है कि इन देशों ने चीन के साथ अधिक नजदीकी आपूर्ति व्यवस्था संबंध विकसित कर लिए हैं और इसका नतीजा यह हुआ है कि विनिर्माण में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं के लिए चीन पर इनकी निर्भरता बढ़ गई है।

पांचवीं बात, यह मान लेना काफी सरल है कि चीन से भारत में एफडीआई आने से अमेरिका को निर्यात बढ़ाने में मदद मिलेगी। इस वर्ष के शुरू में अमेरिका ने मलेशिया, कंबोडिया, वियतनाम और थाईलैंड से सोलर पैनलों के आयात पर शुल्क बढ़ा दिया था। अमेरिका ने यह निर्णय तब लिया था जब अमेरिकी उत्पादकों ने आरोप लगाया था कि व्यापार पाबंदियों से बचने के लिए आसियान देशों में जाकर उत्पादन करने वाली कंपनियां काफी कम मूल्य वर्द्धन के साथ इन सोलर पैनलों का निर्यात कर रही हैं।

भारत के लिए यह स्थिति अलग नहीं हो सकती क्योंकि जीवीसी एकीकरण के माध्यम से घरेलू स्तर पर मूल्य वर्द्धन एक समय बाद ही बढ़ता है और तभी होता है जब घरेलू शोध एवं विकास एवं संबंधित ढांचे में निवेश साथ-साथ जारी रहता है। लिहाजा, इस संदर्भ में यह उपयोगी रहेगा कि जीवीसी में मजबूत भूमिका निभाने वाली विकसित अर्थव्यवस्थाओं की कंपनियों (लीड फर्म) के लिए अनुबंध पर काम करने वाली चीन की विनिर्माताओं को जीवीसी में भाग लेने की अनुमति देने पर एक स्पष्ट नजरिया तैयार किया जाए। इससे यह समझने में भी मदद मिलेगी कि चीन में अनुबंध पर काम करने वाली कंपनियां एक समय बाद मूल उपकरण विनिर्माता किस तरह बन पाईं।

इन सभी बातों पर विचार करते हुए भारत की एफडीआई नीति की समीक्षा का ध्यान तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं से मिलने वाली प्रतिस्पर्द्धा की पहचान करने पर होना चाहिए। इसके साथ ही एक अधिक उदार व्यापार नीति भी तैयार की जानी चाहिए और जीवीसी में व्यापार-निवेश के बीच आपसी संबंध की बेहतर समझ रखने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। जीवीसी की प्रमुखता वाले वैश्विक व्यापार संदर्भ में विकसित कंपनियों की लीड फर्मों में चीन का स्थान एवं उसकी प्रगति से जुड़े पहलुओं को समझना भी जरूरी है।

(लेखिका सीएसईपी में वरिष्ठ फेलो और जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में प्राध्यापक (अवकाश पर) हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published - September 5, 2024 | 9:04 PM IST

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