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जारी रहेगी बचत एशियाई देशों की बदौलत

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वैश्विक स्तर पर बचत की भरमार दिख रही है क्योंकि तेजी से उम्रदराज होने के बावजूद एशिया अभी भी विशुद्ध बचतकर्ता की भूमिका में है। इस विषय में जानकारी प्रदान कर रहे हैं नीलकंठ मिश्र

Last Updated- January 13, 2023 | 10:57 PM IST
Savings rate fell due to spending by families after the pandemic: RBI
इलस्ट्रेशन-बिनय सिन्हा

बीते दो महीनों के दौरान इस स्तंभ में हमने एशिया की आबादी की बढ़ती आयु के दो अहम प्रभावों पर चर्चा की है: एक तो यह कि 10 बड़ी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं (चीन, भारत, इंडोनेशिया, जापान, फिलिपींस, वियतनाम, थाईलैंड, कोरिया, मलेशिया और ताइवान) में जनांकीय बदलाव आर्थिक बदलाव की तुलना में अधिक तेजी से हो रहा है। दूसरा यह कि कामगारों की गुणवत्ता वहां तादाद को पीछे छोड़ने वाली है। आज हम एक तीसरे निहितार्थ पर चर्चा करेंगे और वह यह कि क्या एशिया दुनिया को पूंजी मुहैया कराता रहेगा?

चालू खाते के संतुलन की बात करें तो शीर्ष 10 देशों में भी काफी अंतर है। भारत और इंडोनेशिया जहां घाटे में हैं, वहीं उत्तर एशिया की अर्थव्यवस्थाएं अधिशेष की स्थिति में हैं। परंतु सभी देशों को मिलाकर देखें तो पिछले दशक में करीब 5 लाख करोड़ डॉलर का अधिशेष रहा। यानी उन देशों की जो भी खपत रही उससे अधिक उन्होंने उत्पन्न्न किया। इस बचत को वैश्विक परिसंपत्तियों में निवेश किया गया। एशिया के 10 बड़े देशों के पास 15 लाख करोड़ डॉलर की अंतरराष्ट्रीय परिसंपत्तियां हैं। इन अर्थव्यवस्थाओं ने विकसित देशों में खपत व्यय तथा कुछ विकासशील देशों में निवेश को गति दी है।

आशंका है कि आबादी की आयु बढ़ने के साथ ही शीर्ष 10 एशियाई देशों की आय में कमी आएगी। दलील एकदम साधारण है: अगर कम कामगार होंगे तो उत्पादन घटेगा लेकिन आबादी के कारण खपत बढ़ती जाएगी। जनसांख्यिकीविद प्रति श्रमिक उपभोक्ताओं की संख्या को निर्भरता अनुपात कहते हैं। बीते तीन दशकों में जापान को छोड़कर शीर्ष 10 एशियाई देशों में यह अनुपात घटा है लेकिन अब यह बढ़ेगा। उच्च अनुपात चालू खाते के संतुलन को अधिशेष से घाटे की स्थिति में ला सकता है। हालांकि यह चिंता अपरिपक्व है और कई मोर्चों पर यह अति साधारण है।

अगले एक दशक में केवल कोरिया, थाईलैंड और ताइवान में ही निर्भरता अनुपात तेजी से बढ़ेगा। चीन जैसे देशों में इसमें कहीं अधिक चिंतित करने वाला इजाफा होगा लेकिन वह बाद के दशक यानी 2030 से 2040 के बीच होगा। पहली बात तो यह कि चालू खाते के संतुलन की कारक समेकित मांग में न केवल घरेलू खपत शामिल होती है बल्कि निवेश भी शामिल होता है। निवेश की बात करें तो आबादी की वृद्धि कमजोर पड़ने पर अर्थव्यवस्था के तीनों हिस्सों आम परिवारों, निगमों और सरकार की आवश्यकता कम हो जाती है। बाद में यह नकारात्मक हो जाता है। अचल संपत्ति, घरेलू जरूरतों की विनिर्माण क्षमता और अधोसंरचना मसलन सड़क, पुल और रेलवे आदि में नए निवेश की आवश्यकता कम है।

बुजुर्ग लेकिन अमीर देशों में जब श्रम महंगा हो और पूंजी निवेश और अधिक आकर्षक हो जाए तब पूंजी निवेश अधिक आकर्षक हो जाता है लेकिन ऐसी अधिकांश आपूर्ति श्रृंखलाएं वैश्विक होती हैं तथा वहां निवेश की आवश्यकता वैश्विक मांग-आपूर्ति संतुलन से तय होती हैं। दूसरी बात, यहां तक कि आम बचत भी पेंशन की पर्याप्तता पर निर्भर है। उम्र बढ़ने के साथ आय में कमी के कारण खपत में भी कमी आती है। जो लोग 80 वर्ष की आयु तक जीते हैं वे अपनी आयु से आधे से भी कम समय तक कमाते हैं। वे कम से कम 20 वर्षों तक अपने माता-पिता पर निर्भर रहते हैं और सेवानिवृत्ति के बाद की उम्र में खपत बरकरार रखने के लिए उनके पास आय का जरिया होना बहुत आवश्यक है।

मानव इतिहास में अधिकांश समय तक सक्षम बच्चे ही मां-बाप की सेवानिवृत्ति योजना रहे। लेकिन बढ़ती वित्तीय सहजता के बीच अब कामगार अपने काम के वर्षों के दौरान भी बचत कर लेते हैं। व्यक्तियों या सरकारों या फिर दोनों को भविष्य के लिए बचत की जरूरत है। अपने नागरिकों की भविष्य की आवश्यकताओं को लेकर सचेत राज्य पेंशन योजनाओं के जरिये बचत को प्रोत्साहित करता है। कई देशों में यह राशि सेवानिवृत्ति के बाद ही मिलती है।

लेकिन कितना फंड पर्याप्त है? अध्ययन बताते हैं कि कर्मचारियों के औपचारिक वेतन में की जाने वाली मानक कटौती 10 बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों की जरूरतों से काफी कम होती है। भारत में कुछ राज्य सरकारें सरकारी कर्मचारियों के लिए विशिष्ट लाभ पेंशन का वादा कर रही हैं। इस तरह करदाताओं के धन को चुनिंदा लोगों की सेवानिवृत्त जीवन के लिए इस्तेमाल किया जाता है। कामगार वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक रूप से रोजगारशुदा है और वह सरकार द्वारा संचालित भविष्य निधि कार्यक्रमों का हिस्सा नहीं है।

चूंकि जीवन संभाव्यता में तेजी से सुधार हो रहा है, इसलिए यह भी समझदारी की बात है कि सेवानिवृत्त होने वाले लोग सतर्कता बरतें। दिलचस्प बात है कि अमेरिका में उम्रदराज लोगों में खपत कम होती है। वहां लोगों को बड़ी सरकारी वृद्धावस्था चिकित्सा बीमा योजनाओं का लाभ नहीं मिलता। ब्रिटेन में जहां लोगों को यह लाभ मिलता है वहां खपत में गिरावट नहीं आती।

ऐसे में अच्छी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपस्थिति में तथा बड़ी सरकारी पेंशन योजना की गैर मौजूदगी में उम्रदराज लोग अपनी खपत कम करते हैं ताकि बचत कर सकें। कई बार वे सेवानिवृत्ति से वर्षों पहले ऐसा करने लगते हैं। जापान और दक्षिण कोरिया में भारी पेंशन परिसंपत्तियां हैं। अन्य प्रमुख एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को अभी यह तैयार करनी है जिसके लिए भारी बचत की आवश्यकता है। जापान के जीपीआईएफ फंड में 1.5 लाख करोड़ डॉलर मूल्य की परिसंपत्तियां हैं जो जापान की कुल संपदा का 10 फीसदी हैं। इसका आधार हिस्सा विदेशी वित्तीय परिसंपत्तियों में लगा है। हकीकत तो यह है कि जापान की समेकित विदेशी परिसंपत्तियां इतनी अधिक हैं कि उनसे होने वाली आय सकल घरेलू उत्पाद के चार फीसदी से अधिक हैं। इससे जापान को चालू खाता अधिशेष बनाए रखने में मदद मिलती है।

ऐसे में व्यक्तिगत बचत हो या सरकार द्वारा जरूरी की गई बचत, हमें उम्मीद है कि एशिया में बचत बढ़ती रहेगी। हमारे सर्वेक्षण के मुताबिक भी अपर्याप्त पेंशन और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण भी आम परिवार सेवानिवृत्ति तथा आपात स्थिति के लिए बचत करते हैं।

बचत की प्रकृति भी मायने रखती है। अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण के दौर में अधिकांश बचत जमीन, अचल संपत्ति और सोने के रूप में होती है। कुछ पीढ़ी पहले तक ऐतिहासिक रूप से यही संपत्ति थी जो पीढि़यां एक दूसरे को हस्तांतरित करती थीं। एशिया के अधिकांश देशों में कृषि ही उत्पादक काम का सबसे प्रमुख स्वरूप था। समय के साथ यह बदल गया। आने वाले दशक में चीन, जापान और दक्षिण कोरिया में अचल संपत्ति की कीमतों को सबसे अधिक जोखिम हो सकता है।

ऐसे में केवल बचत के बढ़ने की संभावना नहीं है बल्कि वित्तीय परिसंपत्तियां और भी तेजी से बढ़ सकती हैं। कहा जा सकता है कि आगामी दशक में भी दुनिया को पूंजी मुहैया कराने वाले देशों के रूप में शीर्ष 10 एशियाई देशों की स्थिति पहले जैसी ही बनी रहेगी। वहां सुरक्षित परिसंपत्तियों की मांग में भी इजाफा जारी रह सकता है। हालांकि भूराजनीतिक बदलावों के बीच सुरक्षित परिसंपत्तियों की परिभाषा अवश्य बदल सकती है।

(लेखक एपैक स्ट्रैटजी, क्रेडिट सुइस के सह-प्रमुख हैं)

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First Published - January 13, 2023 | 10:57 PM IST

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