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तेल की आग से बढ़ेगी महंगाई! निवेशक किन सेक्टर्स से रहें दूर, कहां बन रहा मौका?

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अगर तेल की कीमत 10 डॉलर बढ़ती है तो चालू खाते का घाटा (CAD) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 0.35 से 0.5 फीसदी तक बढ़ सकता है।

Last Updated- March 09, 2026 | 4:37 PM IST
crude economy
Representational Image

प​श्चिम ए​​शिया में जारी युद्ध के चलते कच्चे तेल की कीमतें रविवार को 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गईं। तीन साल में ऐसा पहली बार हुआ, जब कीमतों ने यह लेवल पार किया है। तेल कीमतों में लगी आग पर काबू नहीं पाया गया, तो इसकी आंच आने वाले दिनों में महंगाई, ब्याज दर, रुपये की चाल, चालू खाता घाटा जैसे प्रमुख आ​र्थिक इंडिकेटर्स तक पहुंच सकती है। हालांकि, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि क्रूड की कीमतों में बढ़ोतरी का महंगाई पर असर अभी बहुत ज्यादा होने का अनुमान नहीं है, क्योंकि देश की महंगाई दर निचले लेवल के पास है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि तेल को लेकर बदलते सेंटीमेंट के बीच निवेशकों को आगे किस तरह की स्ट्रैटेजी अपनानी चाहिए। कहां सतर्क रहने की जरूरत है और कहां तेल की महंगाई मौका लेकर आई है।

ब्रोकरेज फर्म एक्सिस सिक्योरिटीज ने अपनी ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, कच्चा तेल एक अहम ग्लोबल इकॉनमिक फैक्टर बनकर उभरा है, इसलिए निवेशकों के लिए इसके असर को समझना जरूरी है। इससे आर्थिक स्थिति, अलग-अलग क्षेत्रों की कमाई और निवेश रणनीति पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

Also Read: तेल महंगा, शेयर सस्ते! RIL, ONGC और BPCL जैसे शेयरों में कैसे करें ट्रेड?

तेल की आंच से भड़केगी महंगाई, बढ़ेगा घाटा!

रिपोर्ट का कहना है कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। एनर्जी इम्पोर्ट देश के कुल व्यापार बिल का बड़ा हिस्सा है। अनुमान के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल करीब 1.5 से 2 अरब डॉलर तक बढ़ जाता है। अगर तेल की कीमत 10 डॉलर बढ़ती है तो चालू खाते का घाटा (CAD) सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 0.35 से 0.5 फीसदी तक बढ़ सकता है। वहीं कच्चे तेल की कीमत में 10 फीसदी बढ़ोतरी से महंगाई करीब 0.20 फीसदी तक बढ़ सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत सीधे फ्यूल की कीमतों पर असर डालती हैं। साथ ही इसका असर ट्रांसपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और फूड सप्लाई चेन पर भी पड़ता है। तेल महंगा होने से उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे तेजी से महंगाई बढ़ सकती है। लगातार ऊंची तेल कीमतें होने पर रिजर्व बैंक (RBI) के लिए ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो सकता है।

दूसरी ओर, कच्चे तेल का आयात डॉलर में होता है। तेल महंगा होने पर तेल कंपनियों को ज्यादा डॉलर की जरूरत होती है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है। इससे फॉरेक्स रिजर्व पर दबाव पड़ सकता है और व्यापार घाटा बढ़ने से रुपये में कमजोरी आ सकती है।

इससे पहले, 2008, 2013 और 2022 में तेल की कीमतें 100 से 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। इस दौरान भारत में महंगाई बढ़ी, रुपया कमजोर हुआ और राजकोषीय व चालू खाते का घाटा बढ़ गया था। ऐसे हालात से निपटने के लिए सरकार ने फ्यूल पर सब्सिडी, एक्साइज ड्यूटी में कटौती, सख्त मौद्रिक नीति और रियायती कच्चे तेल के आयात जैसे कदम उठाए थे।

किन सेक्टर्स पर क्या होगा असर?

एविएशन पेंट, सीमेंट, केमिकल पर निगेटिव असर (अंडरवेट)

ए​क्सिस सिक्युरिटीज की रिपोर्ट के मुताबिक, तेल की कीमत बढ़ने से कई उद्योगों की लागत बढ़ जाती है। एविएशन सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित होता है क्योंकि एयरलाइन कंपनियों की कुल लागत का करीब 30 से 40 फीसदी हिस्सा फ्यूल पर खर्च होता है। इससे कंपनियों का मुनाफा घट सकता है और टिकट की कीमतें बढ़ सकती हैं।

वहीं, पेंट कंपनियों पर भी असर पड़ता है क्योंकि इनके कई कच्चे माल पेट्रोलियम से बनते हैं। इससे लागत बढ़ती है और मुनाफा कम हो सकता है। रसायन और प्लास्टिक उद्योगों को भी कच्चे माल की लागत बढ़ने से दबाव झेलना पड़ता है। टायर कंपनियों की लागत भी बढ़ती है क्योंकि उत्पादन में पेट्रोलियम से बने पदार्थों का उपयोग होता है। लॉजिस्टिक्स और परिवहन कंपनियों को डीजल महंगा होने से ज्यादा खर्च करना पड़ता है। इससे माल ढुलाई की लागत बढ़ती है और मुनाफे पर असर पड़ता है। इसके अलावा, सीमेंट उद्योग पर भी दबाव पड़ता है क्योंकि इसमें पेटकोक जैसे फ्यूल का ज्यादा इस्तेमाल होता है।

तेल कंपनियों पर सीमित असर (वेट)

रिपोर्ट के मुताबिक, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों जैसे इंडियन ऑयल (IOC), BPCL और HPCL पर असर काफी हद तक सरकार की कीमत तय करने की नीति पर निर्भर करता है। अगर रिटेल फ्यूल कीमतों को सीमित रखा जाता है, तो इन कंपनियों के मुनाफे पर दबाव आ सकता है। लेकिन अगर कीमतों में बढ़ोतरी का बोझ उपभोक्ताओं पर डाला जाता है तो कंपनियों का मुनाफा स्थिर रह सकता है।

अपस्ट्रीम कंपनियों को फायदा (ओवरवेट)

रिपोर्ट बताती है कि तेल खोज और उत्पादन करने वाली अपस्ट्रीम कंपनियों जैसे ओएनजीसी और ऑयल इंडिया को तेल की कीमत बढ़ने से सीधा फायदा होता है क्योंकि प्रति बैरल उनकी कमाई बढ़ जाती है।
इसके अलावा, कुछ जटिल रिफाइनरी को भी बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान बेहतर रिफाइनिंग मार्जिन मिल सकता है। ऊर्जा से जुड़े लॉजिस्टिक्स, ट्रेडिंग और शिपिंग कंपनियों की गतिविधियां भी ऐसे समय में बढ़ सकती हैं।

निवेशक कैसे बनाएं स्ट्रैटेजी?

ए​क्सिस सिक्युरिटीज का कहना है कि निवेशक अपस्ट्रीम कंपनियां, एनर्जी इंफ्रा कंपनियां, कुछ रिफाइनरी कंपनियां, और रक्षा व इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टर्स में निवेश बढ़ा सकते हैं।

इसके अलावा, एविएशन, पेंट कंपनियां, टायर कंपनियां, रसायन उद्योग, और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टरों में निवेश कम रख सकते हैं। वहीं, बैंकिंग, आईटी सेवाएं, स्वास्थ्य सेवा, मजबूत ब्रांड और कीमत बढ़ाने की क्षमता वाली उपभोक्ता कंपनियां में संतुलित निवेश की स्ट्रैटेजी अपना सकते हैं।

ब्रोकरेज का कहना है कि निवेश स्ट्रैटेजी को लेकर निवेशकों को कुछ इंडिकेटर्स पर नजर रखने की जरूरत है। इनमें कच्चे तेल की ब्रेंट कीमत, डॉलर-रुपया एक्सचेंज रेट, भारत का चालू खाते का घाटा, महंगाई का रुझान, आरबीआई की मौद्रिक नीति और सरकार की फ्यूल प्राइस पर पॉलिसी शामिल है।

 

(डिस्क्लेमर: यहां निवेश संबंधी स्ट्रैटेजी की सलाह ब्रोकरेज हाउस ने दी है। शेयर बाजार में निवेश जो​खिमों के अधीन है। निवेश संबंधी कोई भी फैसला करने से पहले अपने एडवाइजर से परामर्श कर लें।)

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First Published - March 9, 2026 | 4:34 PM IST

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