देश में 16वें वित्त आयोग ने ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों के लिए आवंटन बढ़ाकर लगभग 8 लाख करोड़ रुपये करने का बिल्कुल सही कदम उठाया है जिसका वितरण पांच वर्षों के दौरान किया जाएगा। इसमें से 41 फीसदी राशि विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों के लिए निर्धारित की गई है। इसके अलावा, वित्त आयोग ने इन अनुदानों पर कुछ शर्तें भी जोड़ी हैं जिनमें प्रमुख शर्तें राज्य वित्त आयोगों की स्थापना, स्थानीय निकायों के लेखा परीक्षा को समय पर पूरा करना और निर्वाचित स्थानीय निकायों के गठन से जुड़ी हैं। ये शर्तें आवश्यक और सही हैं जो संबंधित संस्थाओं को मजबूत करने में मदद करेंगी।
इसके साथ ही केंद्रीय बजट में शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के लिए 1 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है जिसका उपयोग अगले पांच वर्षों में शहरी चुनौतियों को हल करने के लिए किया जाएगा। हालांकि इसके लिए भी शर्तें हैं, मसलन इस आवंटन का 25 फीसदी तब ही जारी किया जाएगा जब राज्य सरकार समान राशि का योगदान करेगी और बाकी राशि, बाजार से बॉन्ड, ऋण, सार्वजनिक-निजी साझेदारी आदि के रूप में जुटाई जाएगी। ऐसे में बजट का उद्देश्य केवल फंड प्रवाह बढ़ाना ही नहीं बल्कि बाजार संस्थाओं को भी मजबूत करना है।
मेरे विचार से ये दोनों उपाय उन संस्थाओं में महत्त्वपूर्ण रूप से सुधार लाएंगे जो शहरी स्थानीय निकायों के संचालन और उनके लिए फंड प्रवाह से जुड़े हैं। ये उपाय फंड प्रवाह को सुगम जरूर बनाते हैं लेकिन ये भारत के शहरों के व्यापक रूप से खराब प्रदर्शन का कारण बने शहरी प्रशासनिक समस्या का हल नहीं करते। ऐसे में हमें एक और पहल की आवश्यकता है जो उस बुनियादी समस्या को ठीक करे जो भारत के अधिकांश शहरों की समस्याओं की जड़ है।
अब, पहले इस पर विचार करते हैं कि आखिर क्या कारण है कि कई ग्रामीण क्षेत्र वास्तव में शहरी क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत होना नहीं चाहते हैं? कुछ लोगों का मानना है कि यह उच्च करों के डर के कारण है। हालांकि भारत में संपत्ति कर बहुत कम होते हैं ऐसे में यह एक बुनियादी कारण नहीं हो सकता। कुछ लोग मानते हैं कि इससे क्षेत्रीय नियमन लागू होगा जो बड़े भूमि मालिकों के लिए हानिकारक हो सकता है लेकिन यह भी तर्क सही नहीं है क्योंकि शहरी क्षेत्र में बदलाव आने से बुनियादी ढांचे में भी सुधार होता है और जमीन की कीमतें बढ़ जाती हैं जिससे भूमि मालिकों को बड़ा लाभ मिलता है।
एक मुख्य कारण यह भी है कि ग्रामीण सरकारों पर नेताओं का नियंत्रण होता है लेकिन शहरी सरकारी प्रशासन में शक्तियां अफसरशाहों के पास होती हैं। ऐसे में एक ग्रामीण क्षेत्र के शहरी क्षेत्र में बदलने पर एक ग्रामीण नेता को प्रभावी रूप से अपनी शक्तियां राज्य सरकार के नियंत्रण वाली अफसरशाही व्यवस्था को सौंपनी होती है।
कई रिपोर्टों और अध्ययनों ने इस मुद्दे को कुछ इस तरह पहचाना है: स्थानीय निर्वाचित अधिकारी (जैसे महापौर या मेयर) जो चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से जनता के प्रति जिम्मेदार होते हैं वास्तव में उनके पास बहुत कम शक्तियां होती हैं। वहीं, दूसरी ओर शहर के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी (सीईओ) के पास अधिक शक्तियां होती हैं और वह प्रशासन को नियंत्रित करता है और प्रभावी रूप से राज्य सरकार को रिपोर्ट करता है।
इस तरह जो लोग शहर के नागरिकों के प्रति जिम्मेदार होते हैं (नगरपालिका के पार्षद और महापौर), उन्हें अफसरशाही के माध्यम से काम कराना पड़ता है जो वास्तव में शहर के लोगों के प्रति उतने जिम्मेदार नहीं होते बल्कि राज्य सरकार के प्रति अधिक जवाबदेह होते हैं। इस तरह की जवाबदेही और अधिकार के बीच असमानता वास्तव में प्रशासनिक विफलताओं का कारण बनती है। इससे शहरी सरकारों का पूंजी प्रवाह भी प्रभावित होता है जिससे शहरों के संसाधनों और क्षमताओं में कमी आती है।
लेकिन एक और तथ्य पर भी ध्यान देना होगा। हमारी संस्थागत व्यवस्था में ऐसा कुछ भी नहीं है जो राज्य सरकार को नगर परिषद के राजनीतिक प्रमुख को अधिक अधिकार देने से रोकता हो। लेकिन आजादी के 75 से अधिक वर्षों में किसी भी राज्य सरकार ने नगर स्तर के नेताओं को वास्तविक शक्तियां नहीं सौंपी हैं।
दूसरे शब्दों में कहें तो जहां एक ओर नागरिक समाज और अकादमिक जगत के लोगों के बीच इस बात पर सहमति है कि स्थानीय स्तर के नेताओं को अधिक अधिकार मिलने चाहिए वहीं दूसरी ओर अफसरशाही और राजनीतिक वर्ग के बीच एक अनकही आपसी सहमति भी दिखाई देती है कि भारत के शहरों पर नियंत्रण, राज्य सरकार द्वारा नियुक्त अफसरशाहों के माध्यम से ही होना चाहिए।
लेकिन सभी यह मानते हैं कि मौजूदा व्यवस्था वास्तव में शहरी प्रशासन और संसाधनों के प्रबंधन में कई प्रकार की असफलताओं की स्थिति बना रही है। यही कारण है कि इन समस्याओं को सुधारने के लिए केंद्र सरकार और वित्त आयोग को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में यह तनाव कैसे दूर किया जा सकता है? उदाहरण के लिए, केंद्र सरकार एक सशर्त योजना के माध्यम से स्थानीय नेताओं को अधिक अधिकार दे सकती है।
इस योजना के तहत पहला कदम यह हो सकता है कि शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की नियुक्ति और हटाने का अधिकार मेयर को दिया जाए। इसके साथ-साथ कुछ सहायक सुधार भी आवश्यक होंगे जैसे कि रिपोर्टिंग की कुछ व्यवस्थाओं में बदलाव करना।
बेशक, अफसरशाही में शायद ही कोई इन सुधारों से सहमत होगा क्योंकि कार्यरत अधिकारी आमतौर पर राज्य या राष्ट्रीय मुख्यालय को रिपोर्ट करना पसंद करते हैं, जहां से वास्तव में उनके करियर की प्रगति तय होती है। इस व्यवस्था को और बेहतर बनाने के लिए एक विकल्प यह भी है कि सरकार, शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पदों को अफसरशाही से बाहर के पेशेवर प्रबंधकों के लिए भी खोल सकती है।
हालांकि इस बात का अंदाजा किसी को नहीं है शायद कोई सुधारवादी सरकार भविष्य में शहरों को दूसरे देशों से भी योग्य सिटी सीईओ नियुक्त करने की अनुमति दे दे। हालांकि, ऐसे कदम भले ही कार्यकुशलता बढ़ाएं लेकिन इससे अफसरशाही व्यवस्था में नाराजगी हो सकती है और इसका विरोध भी संभव सकता है।
इसके अलावा कई मुख्यमंत्री भी इससे खुश नहीं होंगे क्योंकि इससे शहरों पर उनका नियंत्रण कम होकर स्थानीय नेताओं के पास चला जाएगा। इसी कारण भारत के लिए वह व्यवस्था अपनाना कठिन हो सकता है जिसे दुनिया के कई देशों में अपनाया गया है यानी सशक्त मेयर मॉडल। यह मॉडल भारत में लागू होना मुश्किल है क्योंकि सत्ता के मौजूदा केंद्रों को इससे बहुत कुछ खोना पड़ सकता है।
ऐसे में भारत के लिए एक अधिक व्यावहारिक समाधान जवाबदेह सीईओ मॉडल हो सकता है। इसके लिए तीन महत्त्वपूर्ण पहलुओं की आवश्यकता होगी। पहला, शहरों के प्रदर्शन की हर साल व्यापक और निष्पक्ष निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए। दूसरा, इन मानकों के आधार पर सिटी सीईओ के लिए स्पष्ट और अच्छी तरह परिभाषित मुख्य जिम्मेदारी क्षेत्र (केआरए) तय किए जाएं और उनके साथ पुरस्कार या प्रोत्साहन की एक तय प्रणाली भी हो। तीसरा, सीईओ के नेतृत्व वाली शहर प्रशासन व्यवस्था को कई स्तरों पर जवाबदेह बनाया जाए मसलन मोहल्ला स्तर पर नागरिक समाज, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन और बाजार संघों के प्रति, वार्ड स्तर पर पार्षदों के प्रति और शहर स्तर पर नगर परिषद के प्रति जवाबदेही तय हो।
कुछ देशों जैसे चीन में, शहरों का नेतृत्व अफसरशाह ही करते हैं। लेकिन उन देशों के उलट भारत में शहर के सीईओ की कामयाबी या विफलता का आकलन करने और उसके आधार पर पुरस्कार या दंड देने की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। साथ ही, शहर के लोगों के प्रति उनकी जवाबदेही भी स्पष्ट रूप से तय नहीं है।
यदि ऐसी निगरानी व्यवस्था बनाई जाए तो अफसरशाह-सीईओ का उद्देश्य केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं रहेगा बल्कि शहर की अर्थव्यवस्था, रोजगार, बुनियादी सेवाओं, सुरक्षा, सार्वजनिक परिवहन और सार्वजनिक स्थानों में सुधार लाना भी होगा। नागरिक समाज की प्रतिक्रिया, स्पष्ट मापदंडों और उपयुक्त प्रोत्साहन प्रणाली का यह संयोजन मौजूदा व्यवस्था की तुलना में बेहतर शहरी शासन सुनिश्चित कर सकता है। इससे फंड का बेहतर उपयोग होगा, नीतियों पर बेहतर प्रतिक्रिया मिलेगी और संसाधनों के आवंटन के बेहतर परिणाम सामने आएंगे।
(लेखक सीएसईपी रिसर्च फाउंडेशन के प्रमुख हैं। ये उनके निजी विचार हैं)