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वैश्विक दबंगई के बीच भारत की नई कूटनीति: क्या मध्यम शक्तियां रोक पाएंगी अमेरिका का मनमाना रवैया?

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वैश्विक कानून व्यवस्था को दोबारा स्थापित करने के लिए भारत को व्यापार समझौतों से आगे बढ़कर मझोली शक्तियों का अनौपचारिक गठबंधन तैयार करना चाहिए

Last Updated- March 24, 2026 | 10:41 PM IST
Donald Trump
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप | फाइल फोटो

अल्पावधि और मध्यम अवधि में भारत की सबसे बड़ी आर्थिक और कूटनीतिक चुनौती है वैश्विक भू-राजनीतिक व्यवस्था में इस समय आ रहा बदलाव। इसकी शुरुआत अमेरिका में एक ऐसी सरकार के आगमन से हुई जो अनैतिक है, लेनदेन में यकीन करती है और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में विधि के शासन तथा बहुपक्षीयता की इज्जत नहीं करती।

अमेरिका-इजरायल तथा ईरान के बीच छिड़ी जंग ने इसे और गहरा कर दिया है। इस युद्ध को संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अंतर्गत किसी भी लिहाज से उचित नहीं ठहराया जा सकता है। यह पहला मौका नहीं है जब अमेरिका ने इस प्रकार काम किया है। लेकिन अपने पूर्ववर्तियों के उलट डॉनल्ड ट्रंप ने इसके लिए संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी लेने की को​शिश भी नहीं की और अपने साझेदारों के साथ भी किसी भी तरह की पूर्व चर्चा करने की जरूरत नहीं समझी। 

भारत के सामने मध्यम अवधि में भू-राजनीति से जुड़ी मुख्य चुनौती यह होगी कि अमेरिका एक अहंकारी वैश्विक शक्ति या अधिक सटीक रूप से कहें तो वैश्विक दबंग बनने की ओर बढ़ रहा है। यह भारत-अमेरिका संबंधों में उस स्थिर सुधार से दुखद गिरावट है, जिसकी शुरुआत राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2008 में परमाणु समझौते के साथ की थी। भारत अब अमेरिका के साथ संबंधों के निरंतर मजबूत होने पर भरोसा नहीं कर सकता। वास्तव में, उसे अचानक गिरावट के जोखिम को स्वीकार करने के लिए तैयार रहना होगा। इस गिरावट की वजह ट्रंप हो सकते हैं और केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी दोस्ती ही इसे कुछ हद तक रोक सकती है। 

दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्ति से उत्पन्न यह चुनौती भारत के उन गांवों की याद दिलाती है जहां एक ही जमींदार परिवार, जिसके पास बहुत सारी जमीन होती थी, उसका दबदबा रहता था। स्वीकृत जजमानी व्यवस्था आम तौर पर सामाजिक स्थिरता सुनिश्चित करती थी, लेकिन कभी-कभी उस दबदबे वाले परिवार का मुखिया अपनी शक्ति का अत्यधिक प्रदर्शन करता था। इससे संगठित प्रतिरोध पैदा होता था, मुख्यतः गांव के मध्यवर्गीय परिवारों से। यही हमें वैश्विक भू-राजनीतिक व्यवस्था में चाहिए, और भारत को शांति से आगे बढ़कर यही करना होगा। 

मझोली ताकतों के बीच संपर्क बढ़ने के संकेत नजर आ रहे हैं। भारत द्वारा हाल ही में ब्रिटेन, यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ और ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते उसके उदाहरण हैं। यूरोपीय संघ के साथ बातचीत पूरी हो चुकी है और दक्षिण अमेरिका के मर्कोसुर समूह के साथ बातचीत जारी है। ये समझौते भारत की अमेरिका पर और शायद चीन पर निर्भरता को भी कम करेंगे।

भारत को व्यापक एवं प्रगतिशील प्रशांत पार साझेदारी समझौते यानी सीपीटीपीपी में शामिल करने की मांग काफी समय से लंबित है। यह 12 ऐसे देशों का एक समूह है जिनकी विश्व अर्थव्यवस्था में करीब 15 फीसदी हिस्सेदारी है। इसमें कोई महाशक्ति शामिल नहीं है। लेकिन ब्रिटेन, जापान, मेक्सिको, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसी कई मझोली ताकतें इसका हिस्सा हैं।

कुछ अन्य मझोली शक्तियां भी जुड़ने पर विचार कर रही हैं। यह भारत के भी विचाराधीन है। इसके कुछ हिस्से, विशेषकर कृषि से संबंधित प्रावधान, स्वीकारना भारत के लिए चुनौती होगी। लेकिन व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो अमेरिका और संभावित रूप से चीन जैसी अत्यधिक दबंग शक्तियों का मुकाबला करने के लिए भारत को सीपीटीपीपी के लिए आवश्यक समझौते स्वीकार करने होंगे। मध्यम शक्ति वाले देशों के साथ भारत के आर्थिक संबंधों का सुदृढ़ीकरण, संबंधित कूटनीतिक सहयोग को मजबूत करने का आधार बनेगा।

ये नए व्यापार समझौते इस लिहाज से भी महत्त्वपूर्ण हैं कि भारत को अमेरिका द्वारा उत्पन्न व्यापार नीति की अनिश्चितता से निपटने के लिए कदम उठाने हैं। वर्ष 2000 के बाद, सूचना प्रौद्योगिकी सेवाएं निर्यात वृद्धि की प्रमुख चालक थीं, जिनका हिस्सा आज बढ़कर 225 अरब डॉलर हो गया है और इनसे लगभग 80 लाख कुशल कर्मियों को रोजगार मिला है। इस निर्यात वृद्धि में सुस्ती और संबंधित रोजगार वृद्धि में गिरावट (जो 2010 से 2015 के बीच प्रति वर्ष 8 फीसदी थी और अब आधे से भी कम रह गई है) केवल ट्रंप की व्यापार नीतियों के कारण नहीं है, बल्कि सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की प्रकृति में बदलाव के कारण है, जिसमें आर्टिफिशल इंटेलिजेंस यानी एआई सेवाओं का तीव्र विकास और विस्तार शामिल है।

लंबी अवधि में भारत का घरेलू स्तर पर एआई को मजबूती से बढ़ावा देना वर्तमान सुस्ती को सुधार सकता है। लेकिन अल्प और मध्यम अवधि में, भारत को अपने निर्यात आय को उचित स्तर पर बनाए रखने के लिए विनिर्मित उत्पादों के निर्यात पर अधिक निर्भर रहना होगा। मध्यम आय वाले देशों के साथ किए गए व्यापार समझौते इस वस्तु-निर्यात को बढ़ावा देंगे। इससे भी अधिक, यह उन राज्यों में आ​र्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने का आधार बनेगा जिनकी दर राष्ट्रीय औसत से नीचे हैं लेकिन जिनमें विनिर्माण संयंत्रों के लिए मेहनतकश श्रमिक उपलब्ध कराने की क्षमता है। 

इससे भी अधिक कठिन प्रश्न यह है कि भारत, अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले से मची उथलपुथल से कैसे निपट सकता है। पश्चिम एशिया की जंग का तात्कालिक असर तेल और गैस कीमतों में तेज उछाल के रूप में नजर आ रहा है। इसके अलावा खाड़ी से इनके आवागमन पर असर पड़ रहा है और वहां से भारत भेजे जाने वाले धन में कमी आई है। यह राशि करीब 50 अरब डॉलर होती है। अगर यह जंग लंबी चली तो इसके और गंभीर परिणाम होंगे। 

भारत, चीन और अन्य एशियाई देश सबसे अधिक प्रभावित होंगे क्योंकि वे खाड़ी से आने वाले तेल और गैस पर बहुत अधिक निर्भर हैं। अगर लड़ाई लंबी चली तो भारत के 2047 तक विकसित देश बनने की संभावना पर बहुत असर होगा। भारत को क्या करना चाहिए इसका जवाब इस पर निर्भर है कि जंग कब तक चलेगी? अगर अमेरिका कुछ सप्ताह में युद्ध से पीछे हटता है तो इसका आर्थिक असर कम हो सकता है क्योंकि तब इजरायल भी पीछे हट सकता है। परंतु फिलहाल इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है।

जरूरी यह है कि युद्ध खाड़ी क्षेत्र से बाहर न फैले और लंबे समय तक न खिंचे। यही वह जगह है जहां मध्यम शक्ति वाले देशों का समूह, जिनका राजनीतिक और सैन्य प्रभाव नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता, भूमिका निभा सकता है। यदि वे अपनी महत्त्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति का उपयोग करके अमेरिका और अन्य बड़ी सैन्य शक्तियों के साथ अंतरराष्ट्रीय कानून व्यवस्था के महत्त्व को स्थापित कर सकें, तो वे लंबे युद्ध के जोखिम को कम करने में मदद कर सकते हैं। 

सभी मध्यम शक्तियों को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए अवैध हमले की निंदा करने के लिए राजी करना आसान नहीं होगा, हालांकि अमेरिका के यूरोपीय सहयोगी भी इस कार्रवाई का समर्थन करने में स्पष्ट रूप से सतर्क हैं। फिर भी, उन्हें विस्तार के पैमाने को सीमित करने और एक तटस्थ, युद्ध-नियंत्रक शक्ति बनने के लिए अपने प्रभाव का उपयोग करने के लिए मनाना संभव हो सकता है।

इसी कारण दुनिया को मध्यम स्तर की शक्तियों की प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता है। मेरी आशा है कि भारत, जो शांति के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है और दुनिया में एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक और सैन्य शक्ति है, नेतृत्व कर सकेगा। उसे मध्यम शक्तियों के साथ किए गए अनेक व्यापार समझौतों से आगे बढ़कर एक अनौपचारिक शांति-निर्माण गठबंधन को बढ़ावा देना चाहिए और इन प्रभावशाली देशों के बीच वैश्विक कानून व्यवस्था को पुनः स्थापित करना चाहिए।

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First Published - March 24, 2026 | 10:37 PM IST

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