ईरान संकट के बीच तेल के बढ़ते दाम ने भारतीय अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। मौजूदा हालात के बीच तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और देश की अर्थव्यवस्था को गंभीर एवं दूरगामी परिणामों से बचाने के उपाय तत्काल सोचने की जरूरत आन पड़ी है। तेल की ऊंची कीमतों से आपूर्ति के मोर्चे पर व्यवधान उत्पन्न होता है जिससे आर्थिक वृद्धि और और मुद्रास्फीति दोनों की चाल एक दूसरे के उलट हो जाती है। इससे कंपनियों की आय कम होती है और निवेश बाहर जाने लगता है। इसका नतीजा यह होता है कि देश के बढ़ते चालू खाते का घाटा नियंत्रित नहीं हो पाता है और रुपया कमजोर होने लगता है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए तेल की खपत कम करना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
भारत के तेल आयात (मात्रा के हिसाब से) में कमी आ रही है। वर्ष 2005-06 से 2009-10 के दौरान 10.8 फीसदी सालाना औसत वृद्धि दर की तुलना में कच्चे तेल के आयात में 2020-21 से 2024-25 के दौरान महज 1.9 फीसदी की वृद्धि हुई। शुद्ध तेल आयात 2005-06 से 2009-10 के दौरान औसतन 8.3 फीसदी सालाना दर से बढ़ा मगर 2020-21 से 2024-25 की अवधि में यह दर कम होकर 2.6 फीसदी रह गई।
भारत की तेल पर निर्भरता भी घट रही है जो ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाने और इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) और स्वच्छ ईंधन की ओर रुख करके तेल पर निर्भरता कम करने के प्रयासों को दर्शाती है। सरकार जैव ईंधन के बढ़ते उपयोग को और बढ़ावा दे रही है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रतिशत के रूप में भारत का शुद्ध तेल आयात वर्ष 2005-10 के दौरान 4.4 फीसदी से घट कर वर्ष 2020-25 के दौरान 3.0 फीसदी रह गया।
यह अनुमान लगाया गया है कि भारत का शुद्ध तेल आयात वर्ष 2024-25 में जीडीपी के 2.9 फीसदी से घट कर 2029-30 में 1.9 फीसदी और 2039-40 तक और घट कर 1.0 फीसदी हो जाएगा। हालांकि, अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ने के कारण शुद्ध तेल आयात बढ़ सकता है जो वर्ष 2024-25 के 22.9 करोड़ टन से बढ़कर वर्ष 2039-40 तक अनुमानित 34.0 करोड़ टन हो जाएगा। इस तरह, जीडीपी के सापेक्ष तेल आयात का बोझ भले ही कम हो जाए मगर अगले 15 वर्षों में तेल पर भारत की भौतिक निर्भरता बढ़ती रहेगी। यह स्थिति ऊर्जा सुरक्षा के लिए टिकाऊ और रणनीतिक समाधानों की आवश्यकता पर जोर देती है।
सबसे पहले तो तेल की मांग काफी हद तक कम करना और इसके आयात पर निर्भरता घटाना बेहद जरूरी है। परिवहन क्षेत्र (जो तेल का काफी इस्तेमाल करता है) में बदलाव की गति काफी धीमी बनी हुई है। भारत में इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) अपनाने की दर और इसका मौजूदा स्वरूप निराशाजनक रहा है।
वर्ष 2024 में सभी सड़क परिवहन वाहनों में इन वाहनों की हिस्सेदारी केवल 8.8 फीसदी थी जिनमें से अधिकांश दोपहिया वाहन (6.1 फीसदी), तिपहिया वाहन (2.1 फीसदी) और यात्री कारें (0.4 फीसदी) थीं। इसके विपरीत, चीन में सड़क परिवहन वाहनों में ईवी की हिस्सेदारी 40 फीसदी थी जिनमें यात्री कारों की हिस्सेदारी 24 फीसदी और दोपहिया और तिपहिया वाहनों की हिस्सेदारी 16 फीसदी थी।
मुख्य बात यह है कि भारत में ईवी को अपनाना अब तक कम चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों तक ही सीमित रहा है, यहां तक कि यात्री कारों की हिस्सेदारी भी बहुत कम है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि अंतर-शहरी यात्री कारों और बस एवं ट्रक जैसे भारी वाणिज्यिक वाहनों के लिए चार्जिंग ढांचा नाकाफी है।
वैश्विक स्तर पर हर 6 से 20 ईवी वाहनों के लिए एक सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन का होना जरूरी समझा जाता है जबकि भारत में प्रत्येक 135 ईवी के लिए एक चार्जिंग स्टेशन है। ईवी वाहन तेजी से अपनाने और यात्री कारों एवं भारी वाणिज्यिक वाहनों की ओर रुझान बढ़ाने के लिए उपयुक्त स्थानों पर मध्यम और तीव्र चार्जिंग बुनियादी ढांचे का विस्तार करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
कृषि और औद्योगिक तापन (इंडस्ट्रियल हीटिंग) जैसे अन्य क्षेत्र भी हैं जहां तेल का इस्तेमाल कम किया जा सकता है मगर यह एक एक धीमी प्रक्रिया होगी। कुल मिलाकर जब तक दक्षता में सुधार और तेल की मांग कम नहीं हो जाती तब तक हालात जस के तस बने रहेंगे।
दूसरी बात, अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं को तेल की कीमतों में तेजी से लगने वाले अचानक झटकों से बचाने के लिए भारत को भविष्य में होने वाली बढ़ोतरी से पहले कीमतें स्थिर करने के लिए अंतरराष्ट्रीय डेरिवेटिव बाजारों में हेजिंग के सक्रिय विकल्पों का पता लगाना चाहिए। तेल विपणन कंपनियां अब शोधन मार्जिन से जुड़े जोखिम कम करने के उपाय करती हैं और सरकार आपूर्ति सुरक्षा के लिए सालाना अवधि अनुबंधों का उपयोग करती है मगर एक अधिक व्यापक संप्रभु दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इस संदर्भ में, मेक्सिको के केंद्रीकृत हेजिंग कार्यक्रम (विश्व की सबसे बड़ी संप्रभु तेल डेरिवेटिव योजना) का अध्ययन करना फायदेमंद होगा ।
वर्ष 2001 से मेक्सिको अपने तेल निर्यात राजस्व के लिए न्यूनतम मूल्य निर्धारित करने के लिए हर साल पुट ऑप्शन खरीदता आ रहा है ताकि संघीय बजट को कीमतों में अचानक आने वाली कमी से बचाया जा सके। एक बड़े आयातक के रूप में भारत को विपरीत जोखिम का सामना करना पड़ता है और वह भविष्य के आयात खर्चों पर एक सीमा निर्धारित करने के लिए कॉल ऑप्शन खरीदने पर विचार कर सकता है। इसका मकसद कीमतों में अचानक बढ़ोतरी की आशंका होने पर अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखना होगा।
हेजिंग सहित भविष्य के झटकों से बचाव के किसी भी तरीके में कुछ लागत आती है और अगर कीमतें बाद में तेजी से गिरती हैं तो यह राजनीतिक रूप से विवादास्पद हो सकता है। मगर हेजिंग कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव के खिलाफ बीमा का काम करती है जिसका प्राथमिक उद्देश्य लाभ को प्रभावित करने वाले जोखिमों को सीमित करना है। हेजिंग पर आने वाली लागत खुदरा कीमतों के माध्यम से वसूल की जा सकती है।
कुल मिलाकर कहा जाए तो वर्ष 1970 के दशक की शुरुआत से तेल संकट बार-बार आते रहे हैं। यह जरूर है कि इनकी आवृत्ति अलग-अलग रही है। आयात पर अत्यधिक निर्भरता को देखते हुए तेल संकट से भारत की अर्थव्यवस्था के लिए कई प्रकार के जोखिम खड़े हो जाते हैं।
लिहाजा, तेल का इस्तेमाल कम करने के प्रयासों में तेजी लाना बेहद जरूरी है। यह आयात पर निर्भरता कम करने और स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल कर जलवायु परिवर्तन रोकने से जुड़े लक्ष्यों को आगे बढ़ाने का सबसे टिकाऊ तरीका है। चूंकि, निकट भविष्य में भारत की आयात पर निर्भरता काफी अधिक बनी रहेगी इसलिए जोखिम कम करने के लिए दीर्घकालिक हेजिंग रणनीति तलाशना अत्यंत आवश्यक है।
(लेखक सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस, नई दिल्ली में सीनियर फेलो हैं। ये उनके निजी विचार हैं)