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क्या फिर लौट रहा है 1939 जैसा दौर? दूसरे विश्व युद्ध और वर्तमान तेल संकट की डराने वाली समानताएं

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दुनिया एक बार फिर विश्व युद्ध जैसे हालात और भीषण तेल संकट के मुहाने पर है। होर्मुज स्ट्रेट की बंदी भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी है

Last Updated- March 09, 2026 | 9:47 PM IST
crude oil
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

द्वितीय विश्व युद्ध और वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति के बीच कुछ समानताएं स्पष्ट हैं। द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत अलग-अलग क्षेत्रीय संघर्ष से हुई जो अंतत: एक विशाल वैश्विक संघर्ष में तब्दील हो गए। इतिहासकार द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत सितंबर 1939 से मानते हैं, जब जर्मनी (और सोवियत संघ) ने पोलैंड पर आक्रमण किया तथा ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इसके बाद जर्मनी ने 1941 के मध्य में सोवियत संघ पर आक्रमण किया। जापान (और जर्मनी) ने दिसंबर 1941 में अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी, और यहीं से यह विश्व युद्ध में परिवर्तित हो गया। 

सितंबर 1939 तक चीन और जापान ऐसे संघर्ष में उलझे हुए थे, जिसमें दस लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी थी। जर्मनी ने ऑस्ट्रिया और चेकोस्लोवाकिया पर कब्जा कर लिया था। जापान और रूस मंगोलिया में युद्ध छेड़ चुके थे। स्पेन का गृहयुद्ध (1936-39) जर्मनी के सहयोगी जनरल फ्रैंको ने जीत लिया था। इटली ने अब के इथियोपिया, इरिट्रिया, सोमालिया और लीबिया पर आक्रमण कर दिया था। सोवियत संघ ने एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया पर कब्जा कर लिया और फिनलैंड के एक बड़े हिस्से पर भी अपना अधिकार जमा लिया। 

पिछले महीने यूक्रेन युद्ध को चार साल पूरे हो गए। अक्टूबर 2023 में शुरू हुआ गाजा आक्रमण अभी जारी है। भारत और पाकिस्तान के बीच संक्षिप्त टकराव हुआ। पाकिस्तान अब अफगानिस्तान से लड़ रहा है। अमेरिका ने वेनेजुएला के तट पर नौकाएं डुबो दीं और वहां के राष्ट्रपति को गिरफ्तार कर लिया। ईरान पर हमले और उसके अमेरिका के कई सहयोगी देशों पर जवाबी हमलों ने खाड़ी क्षेत्र को जंग के मैदान में बदल दिया है।

तब भी और अब भी, ऊर्जा तक पहुंच रणनीतिक सोच को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में से एक थी। जापान ने 1941 में अमेरिका पर हमला किया क्योंकि उसने तेल की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था, और जापान अमेरिकी प्रशांत बेड़े को नष्ट किए बिना इंडोनेशिया और मलाया से तेल प्राप्त नहीं कर सकता था। जर्मनी ने 1941 में सोवियत संघ पर आक्रमण किया, जिसका एक कारण उसके तेल क्षेत्रों पर कब्जा करना था। ब्रिटेन और सोवियत संघ ने संयुक्त रूप से ईरान पर आक्रमण किया ताकि जर्मनी ईरान के तेल पर कब्जा न कर सके, और इसी कारण से ब्रिटेन और जर्मनी ने उत्तरी अफ्रीका में युद्ध लड़ा।

होर्मुज स्ट्रेट फिलहाल जहाजों के आवागमन के लिए बंद है, जिससे वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का 20 फीसदी हिस्सा अवरुद्ध हो गया है। कतर ने अप्रत्याशित परिस्थितियों का हवाला देते हुए एलएनजी उत्पादन बंद कर दिया है। टैंकर किराये की दरें अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। बीमा कंपनियों ने शिपिंग प्रीमियम बढ़ा दिए हैं।

ब्रेंट क्रूड वायदा 6 मार्च को 85 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जो 28 फरवरी को 60 डॉलर था। एलएनजी की कीमतें 28 फरवरी के 11 डॉलर प्रति एमएम बीटीयू (मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट) से बढ़कर 6 मार्च तक 24 डॉलर हो गईं, जबकि गैस टैंकर चार्टर दरों में 600 फीसदी से अधिक की वृद्धि हुई। 

भारत के लिए गैस और कच्चे तेल का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से होकर आता है। अमेरिका ने भारत को अगले 30 दिन के लिए रूसी कच्चे तेल के आयात की अनुमति दे दी है, लेकिन यह अस्थायी व्यवस्था है। तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी द्वारा 9 फरवरी को राज्य सभा में दिए गए बयान के अनुसार, भारत का आपातकालीन पेट्रोलियम भंडार 74 दिन तक चल सकता है। अन्य आकलन के अनुसार, आपातकालीन पेट्रोलियम भंडार 25 से 50 दिन तक चल सकता है।

तेल और गैस आवश्यक वस्तुएं हैं। इनकी मांग अपेक्षाकृत स्थिर रहती है। आपूर्ति में थोड़ी सी भी कमी से कीमतों में भारी उछाल आ सकती है।  20 फीसदी की आपूर्ति कमी को मामूली नहीं कहा जा सकता। एक अनिश्चितता यह है कि कुछ पता नहीं कि संघर्ष कितने समय तक चलेगा। होर्मुज स्ट्रेट के एक सप्ताह तक बंद रहने और ईरान में उत्पादन ठप होने से वार्षिक तेल उत्पादन का स्तर 2 फीसदी तक कम हो गया है। साथ ही, सऊदी अरब में कच्चे तेल की अतिरिक्त क्षमता का भी उपयोग नहीं किया जा सकता क्योंकि इसे होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरना पड़ता है।

युद्धविराम नहीं हुआ तो हर हफ्ते होर्मुज स्ट्रेट के बंद रहने से वैश्विक आपूर्ति में लगभग 0.5 फीसदी की और कमी आएगी। वैश्विक आपूर्ति-मांग का विश्लेषण करने वाले विश्लेषकों का कहना है कि अगर यह टकराव पांच- छह सप्ताह से अधिक चलता है, तो भंडार कम होने के कारण कीमतें तेजी से बढ़ेंगी। कुछ मॉडलों के अनुसार, छह सप्ताह से अधिक समय बीतने पर गैस की कीमत 40 डॉलर प्रति एमएम बीटीयू तक और ब्रेंट क्रूड की कीमत 220 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर जा सकती है। 

भारत में ईंधन की कीमतें ब्रेंट क्रूड से जुड़ी हुई हैं। पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों की समीक्षा तेल विपणन कंपनियों द्वारा प्रतिदिन की जा सकती है। एपीएम (प्रशासित मूल्य निर्धारण तंत्र) गैस और एनडब्ल्यूजी (नए कुओं से निकलने वाली गैस) की कीमतों की समीक्षा हर छह महीने में की जाती है। यदि अप्रैल में गैस कीमत समीक्षा के समय होर्मुज स्ट्रेट बंद रहता है, तो कीमतों को फिर से निर्धारित करना एक बड़ी समस्या होगी।

खुदरा कीमतों में अचानक वृद्धि से अर्थव्यवस्था मंदी की ओर जा सकती है। लेकिन खुदरा कीमतों को नियंत्रित करने का मतलब है सब्सिडी का भारी बोझ। उर्वरक सब्सिडी में भी वृद्धि होगी। पूरी अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। भारत ने हर तेल संकट (1973, 1979, 1991) में मंदी का सामना किया है और इस बार स्थिति अलग होने का कोई स्पष्ट कारण नहीं दिखता। 1 मार्च से पहले किए गए सभी बजट अनुमानों और व्यापार संतुलन अनुमानों की अब गहन समीक्षा की जाएगी, भले ही द्वितीय विश्व युद्ध से समानताएं अधिक स्पष्ट न हों।

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First Published - March 9, 2026 | 9:47 PM IST

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