भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने ‘सांता क्लॉज’ बनकर भारत में समय से पहले ही क्रिसमस की सौगात दे दी है। अगस्त और अक्टूबर में यथास्थिति बनाए रखने के बाद आरबीआई ने शुक्रवार को रीपो दर 25 आधार अंक घटा कर इसे 5.25 फीसदी कर दी। भारतीय केंद्रीय बैंक की दर-निर्धारण संस्था छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने इस कैलेंडर वर्ष यानी 2025 के लिए निर्धारित अंतिम नीति बैठक में रीपो दर में कटौती का फैसला सर्वसम्मति से लिया। हालांकि, नीतिगत रुख में कोई बदलाव नहीं किया गया है और इसे ‘तटस्थ’ छोड़ दिया गया है।
आरबीआई ने बैंकिंग प्रणाली में नकदी की उपलब्धता का पूरा ध्यान रखा है। केंद्रीय बैंक लगभग 1 लाख करोड़ रुपये उपलब्ध कराने के लिए खुले बाजार परिचालन (ओएमओ) के माध्यम से सरकारी बॉन्ड खरीदेगा। आरबीआई प्रणाली में दीर्घकालिक नकदी डालने के लिए दिसंबर में तीन साल की अवधि के लिए 5 अरब डॉलर का डॉलर-रुपया विनिमय (स्वैप) भी आयोजित करेगा। इसका मतलब है कि इस महीने लगभग 1.45 लाख करोड़ रुपये की नकदी उपलब्ध कराई जाएगी। बाजार इससे ज्यादा की उम्मीद भी नहीं कर रहा होगा। शुक्रवार को सेंसेक्स 0.52 फीसदी उछला और 10 वर्ष के सरकार बॉन्ड पर यील्ड गुरुवार को दर्ज 6.51 फीसदी से 2 आधार अंक फिसलकर 6.49 फीसदी रह गई। रुपया एक पैसा कमजोर होकर 89.99 प्रति डॉलर पर बंद हुआ।
इस मौद्रिक नीति समीक्षा में रीपो दर में कटौती की दो वजह रही है। पहली तो यह कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति 0.25 फीसदी के साथ दशक के निचले स्तर पर आई गई। दूसरी वजह यह कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वास्तविक वृद्धि दर 8.2 फीसदी हो गई। ये दोनों आंकड़े आम सहमति से जताए अनुमान से भी आगे निकल गए। गवर्नर मल्होत्रा के शब्दों में यह एक ‘वास्तविक गोल्डीलॉक्स पीरियड’ (अर्थव्यवस्था के लिए आदर्श स्थिति) है। बतौर गवर्नर मल्होत्रा के लगभग पिछले एक साल के कार्यकाल में इस साल फरवरी और दिसंबर के बीच नीतिगत दर में 125 आधार अंक की कटौती हो चुकी है। वर्ष 2019 के बाद से यह नीतिगत दरों में सर्वाधिक तेजी से की गई कटौती है। फरवरी और अक्टूबर 2019 के बीच आरबीआई ने रीपो दर 6.5 फीसदी से घटाकर 5.15 फीसदी कर दी थी यानी पांच चरण में 135 आधार अंक की कटौती गई गई थी।
संयोग से पिछली बार जब अप्रैल 2010 में रीपो दर 5.25 फीसदी थी तो मुद्रास्फीति 9.9 फीसदी (मार्च 2010) थी और वित्त वर्ष 2010-11 (वित्त वर्ष 2011) में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.4 फीसदी रही थी। उस समय आरबीआई थोक मूल्य (डब्ल्यूपीआई) आधारित मुद्रास्फीति को केंद्र में रखकर निर्णय लेता था। अप्रैल 2014 में डब्ल्यूपीआई की जगह सीपीआई ने ले ली।
वित्त वर्ष 2026 के लिए सीपीआई आधारित मुद्रास्फीति अब 2 फीसदी रहने का अनुमान है जो अक्टूबर के अनुमान 2.67 फीसदी से कम है। यह चौथा मौका है जब आरबीआई ने अपने मुद्रास्फीति अनुमान को कम किया है। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में खुदरा मुद्रास्फीति 3.9 फीसदी और दूसरी तिमाही में 4 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया है और जोखिम भी संतुलित ही दिख रहा है। अक्टूबर में आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में मुद्रास्फीति के 4.5 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था। आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 7.3 फीसदी रखा है जो अक्टूबर में जताए अनुमान 6.8 फीसदी से अधिक है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 6.7 फीसदी और दूसरी तिमाही में 6.8 फीसदी रहने का अनुमान है।
एमपीसी ने रीपो दर में इसलिए कटौती की है क्योंकि आर्थिक वृद्धि- मुद्रास्फीति की चाल संतुलित दिख रही है खासकर समग्र (हेडलाइन) और मुख्य (कोर) दोनों मुद्रास्फीति के मोर्चे पर हालात उत्साहजनक लग रहे हैं। यह स्थिति आर्थिक वृद्धि दर को सहारा देने के लिए नीतिगत गुंजाइश बना रही है। अब सवाल यह है कि क्या आगे और कटौती होगी? एमपीसी से मिले संकेत निश्चित रूप से नरम हैं मगर तस्वीर साफ नहीं दिख रही है। अगर वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही में मुद्रास्फीति बढ़कर 4 प्रतिशत हो जाती है तो आगे दर में कटौती की गुंजाइश सीमित है क्योंकि 5.25 प्रतिशत रीपो दर के साथ वास्तविक दर 1.25 प्रतिशत रहेगी।
अगर मुद्रास्फीति आरबीआई के अनुमान से कम रहती है और आर्थिक वृद्धि की राह में व्यापार से जुड़ी बाधाएं और भू-राजनीतिक चुनौतियां खड़ी होती हैं तो यह आश्चर्य की बात नहीं होगी कि नीतिगत दर में 25 आधार की एक और कटौती हो जाए। सितंबर तिमाही में 8.2 फीसदी की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर शायद आगे बरकरार नहीं रहे क्योंकि आरबीआई को अगले वित्त वर्ष की पहली छमाही में यह 7 फीसदी से कम दिखाई दे रही है। पहले ऐसा बहुत कम हुआ है जब आरबीआई ने रुपये पर भीषण दबाव के बीच नीतिगत दर में कमी की है। रुपया पिछले सप्ताह के शुरू में डॉलर की तुलना में 90 का स्तर पार कर गया। ऐसा लगता है कि आरबीआई रुपये के इस स्तर को स्वीकार कर रहा है जो आर्थिक बुनियादी बातों के अनुरूप है। बेशक विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव की स्थिति में वह हालात संभालने के लिए आगे आएगा।
जो भी हो, नीतिगत दर में कमी कर्जधारकों के लिए एक अच्छी बात है। खासकर खुदरा और छोटे एवं मध्यम उद्यमों को राहत मिलेगी क्योंकि इस तरह के ऋण रीपो दर या ट्रेजरी बिल यील्ड जैसे बाहरी मानक से जुड़े होते हैं। मगर बैंकों को यह चुनौतीपूर्ण लगेगा। उनका शुद्ध ब्याज मार्जिन (मोटे तौर पर जमाकर्ताओं को ब्याज भुगतान और ऋण पर अर्जित ब्याज के बीच का अंतर) और दबाव में होगा। ऋण पर ब्याज घट जाएगा मगर अधिकांश बैंक अपनी जमा दर कम करने की स्थिति में नहीं हैं। उन्हें मुनाफा बनाए रखने के लिए अपनी देनदारी की रणनीति पर मंथन करने की आवश्यकता होगी। इसे घुमाकर कहें तो उन्हें अपनी कारोबारी रणनीति पर ध्यान देने की जरूरत है।
(लेखक जन स्मॉल फाइनेंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं।)