पूर्वी यूरोप में व्याप्त संकट की खबरों के तेज प्रसार के बीच दुनिया भर के बाजारों में अस्थिरता का माहौल है। पहले एशिया और उसके बाद यूरोप के शेयर बाजारों में तेज गिरावट देखने को मिली। इसके पश्चात जैसे ही रूस के एक जनरल ने कहा कि यूक्रेन की सीमा से कुछ सैनिक हटाये जाएंगे, बाजारों ने तेजी से वापसी भी की। रूस और उसके दक्षिण पड़ोसी (जो कभी सोवियत संघ का सदस्य था और अभी भी आर्थिक सांस्कृतिक रूप से रूस से जुड़ा हुआ है) के बीच तनाव बढऩे से, मुद्रास्फीति के कारण पहले से परेशान शेयर बाजारों की हालत और खस्ता हो गई। रूस और यूक्रेन के बीच तनाव के कारण भारत में अस्थिरता सूचकांक 20 फीसदी बढ़ा और सप्ताह के आरंभ में शेयरों में तीन फीसदी की गिरावट आई।
जीवाश्म ईंधन इस संकट की वजहों में से भी एक है और संकट का असर भी इस पर पड़ेगा। रूस प्राकृतिक गैस का बड़ा निर्यातक है, खासतौर पर वह पश्चिमी यूरोप को गैस निर्यात करता है। रूस ने कभी इस बात को नहीं छिपाया कि वह गैस आपूर्ति पर अपने नियंत्रण का इस्तेमाल यूरोपीय देशों को सहयोग के लिए विवश करने के वास्ते करता है। यूरोपीय संघ, यूक्रेन की संप्रभुता की रक्षा करने के लिए प्रभावी और एकजुट मोर्चा बनाने में नाकाम रहा। जर्मनी के नए चांसलर ओलाफ शॉल्ज ने यूक्रेन की राजधानी कीव का दौरा किया जहां उन्होंने समर्थन पर बल दिया लेकिन हथियारों की बिक्री का वादा नहीं किया। फ्रांसीसी राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों ने रूस की नाटकीय यात्रा की लेकिन रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के साथ पांच घंटे लंबी वार्ता के बाद भी यह नहीं पता चला कि कोई प्रगति हुई अथवा नहीं। इस बीच अमेरिका ने भी पूरी तरह रचनात्मक भूमिका नहीं निभाई। उसने बार-बार दोहराया कि युद्ध होना तय है तथा उसने कीव में अपना दूतावास खाली करा दिया। इस बात ने यूक्रेन को नाराज किया। ध्यान देने वाली बात यह है कि कीव में शॉल्ज ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के उस वादे का समर्थन नहीं किया कि अगर रूस यूक्रेन पर हमला करता है तो रूसी गैस को यूरोप ले जाने वाली नॉर्ड स्ट्रीम 2 पाइपलाइन कभी अस्तित्व में नहीं आएगी। मूल नॉर्ड स्ट्रीम परियोजना का नेतृत्व शॉल्ज के पहले जर्मन चांसलर बनने वाले अंतिम सोशल डेमोक्रेट गेरहार्ड शॉर्डर के पास है और उन्हें रूस की सरकारी ऊर्जा कंपनी गेजप्रॉम के बोर्ड में भी शामिल किया गया है।
परंतु वैश्विक बाजार यह मानते हैं कि यूक्रेन में रूस के किसी भी तरह आक्रमण की प्रतिक्रिया शेष विश्व तक उसकी वित्तीय और कारोबारी पहुंच को प्रभावित करेगी। उदाहरण के लिए वह स्विफ्ट नेटवर्क के जरिये होने वाले अंतर बैंक हस्तांतरण से अलग-थलग हो सकता है। परंतु वास्तविक चुनौती यह है कि रूस, जो दुनिया के जीवाश्म ईंधन आधारित उत्पादों मसलन नेफ्था और तेल आदि में बीस फीसदी हिस्सेदारी रखता है, वह भी वैश्विक ईंधन आपूर्ति शृंखला से कट सकता है। यदि ऐसा हुआ तो मुद्रास्फीति का दबाव और बढ़ेगा। कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल की ओर बढ़ रही है जो 2014 के बाद का उच्चतम स्तर है, हालांकि रूसी सैनिकों के आंशिक रूप से हटने की खबर के बाद यह घटकर 95 डॉलर प्रति बैरल तक आई। मांग पहले ही आपूर्ति से अधिक है और विश्व स्तर पर तेल के भंडार कम हो रहे हैं। यदि तेल कीमतें इसी स्तर पर रहीं तो वैश्विक मुद्रास्फीति आधा फीसदी तक बढ़ सकती है। भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों में महंगाई और बढ़ेगी। यह स्पष्ट होना चाहिए कि रूस यदि आक्रमण करता है तो विश्व अर्थव्यवस्था को इसकी बड़ी कीमत चुकानी होगी। संकट को टालने के कूटनीतिक प्रयास सफल होने चाहिए और रूसी नेतृत्व द्वारा शांति का मार्ग छोडऩे की भी उसे भारी कीमत चुकानी ही चाहिए।