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WTO पर अमेरिका की नई आपत्तियां: सुधार की कोशिश या बहुपक्षवाद को कमजोर करने की रणनीति?

अमेरिका द्वारा डब्ल्यूटीओ को ज्ञापन देकर संस्था के संचालन और संभावित सुधारों से संबंधित चिंताओं का विवरण प्रस्तुत करना अप्रत्याशित भी है और स्वागतयोग्य भी

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- December 29, 2025 | 10:48 PM IST

राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के अधीन अमेरिका की संघीय सरकार का बहुपक्षीय मामलों के प्रति रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाना मुश्किल है। इस बात की संभावना कहीं अधिक है कि वह समझौतों से बाहर निकल जाए, उन्हें नुकसानदेह घोषित करके रद्द कर दे और वैश्विक शासन को लेकर सब कुछ नष्ट कर देने का नजरिया अपनाए। खुद राष्ट्रपति का लंबे समय से यह मानना रहा है कि व्यापारिक व्यवस्थाएं खासतौर पर गलत तरीके से बनाई गई हैं और वे अमेरिका के हितों के विरुद्ध बनी हैं।

ऐसे में अमेरिका द्वारा विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ को ज्ञापन देकर संस्था के संचालन और संभावित सुधारों से संबंधित चिंताओं का विवरण प्रस्तुत करना अप्रत्याशित भी है और स्वागतयोग्य भी। उसने 2024 और 2025 के लिए डब्ल्यूटीओ का अपना बकाया भी चुका दिया है। इससे संकेत मिलता है कि ट्रंप प्रशासन भी कुछ हद तक यह उम्मीद करता है कि इस संस्था को बचाया जा सकता है। यह ध्यान देने योग्य है कि डब्ल्यूटीओ को कमजोर करना केवल रिपब्लिकन की प्राथमिकता नहीं है।

जो बाइडन के पिछले प्रशासन ने भी न केवल भुगतान में देरी की, बल्कि संगठन की अपील इकाई के संचालन पर भी लगातार वीटो लगाया, जिसके बिना विवाद निपटान के मामले में यह संस्था निष्प्रभावी हो जाती है। जब डब्ल्यूटीओ ने यह निर्णय दिया कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में इस्पात और अन्य वस्तुओं के आयात पर लगाए गए प्रतिबंध अवैध थे, तो बाइडन प्रशासन ने यह घोषित किया कि वह इस निर्णय को स्वीकार या पालन नहीं करेगा।

अमेरिका के ज्ञापन से यह खुलासा होता है कि वह किन-किन तरीकों से मानता है कि डब्ल्यूटीओ ठीक से काम नहीं कर रहा है। इनमें से कुछ शिकायतें व्यापक रूप से साझा की जाती हैं। उदाहरण के लिए, इसने अर्थव्यवस्थाओं द्वारा स्वयं को ‘विकासशील’ घोषित करने और इस प्रकार ‘विशेष और भिन्न व्यवहार’ पाने की पात्रता को एक समस्या के रूप में चिह्नित किया है। पिछले वर्ष चीन ने कहा था कि वह विकासशील देश के विशेषाधिकारों को छोड़ देगा। लेकिन अमेरिका और कई उभरती अर्थव्यवस्थाएं मानती हैं कि चीन ने इन विशेषाधिकारों को बहुत लंबे समय तक बनाए रखा, जिससे प्रणाली की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा।

अमेरिका चाहता है कि आगे से ये विशेषाधिकार केवल सबसे कम विकसित अर्थव्यवस्थाओं तक सीमित रहें। उसने अवैध निर्यात सब्सिडी की अधिक पारदर्शी ढंग से जांच की मांग भी की है। चीन के साथ यह दिक्कत लगातार चल रही है। इसके कई व्यापारिक साझेदारों का मानना है कि पूंजी, बिजली और पानी के लिए छिपी हुई सब्सिडी डब्ल्यूटीओ के नियमों का उल्लंघन करती हैं लेकिन चीनी प्रणाली की अपारदर्शिता के कारण कोई जवाबदेही लागू नहीं होती। अमेरिका उचित ही इस पर सवाल उठाता है।

दोनों मुद्दे, और अन्य भी, ऐसी चिंताएं हैं जिनमें बाकी दुनिया शायद बातचीत के लिए तैयार होती। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अमेरिका मानता है कि ऐसे बदलावों के लिए व्यापक गठबंधन बनाना आवश्यक नहीं है, बल्कि शासन संरचना को अकेले ही बदलने की कोशिश करना चाहिए। दूसरी ओर, अमेरिका की कुछ अतिरिक्त शिकायतें भी हैं जिनके इर्द-गिर्द उसे गठबंधन बनाने में कठिनाई हो सकती है। इनमें से एक है सबसे तरजीही देश की अवधारणा पर हमला, जो बहुपक्षीय व्यापार समझौतों की नींव है।

द्विपक्षीय रूप से इस तरह बातचीत करने के बजाय कि कुछ देशों को लाभ मिले और अन्य को नुकसान, तरजीही मुल्क मानक का अर्थ है कि जब किसी देश के व्यापार नियम बदलते हैं तो उस दर्जे वाले सभी व्यापारिक साझेदार स्वतः लाभान्वित होते हैं। इस मानक को छोड़ना अराजकता पैदा करेगा लेकिन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को सबसे कम नुकसान होगा, यही कारण है कि अमेरिका ने इसे कमजोर किया है।

भारत को इसके विरुद्ध दलील रखनी चाहिए। साथ ही शुल्क लगाने के लिए ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ को एक कारण के तौर पर इस्तेमाल करके इसका बेवजह बड़े पैमाने पर विस्तार करने का भी। लेकिन भारत को यह भी स्वीकार करना होगा कि अमेरिका की कुछ मांगें, मसलन बहुपक्षीय समझौतों की मान्यता व्यापक रूप से लोकप्रिय होंगी। भारत ने डब्ल्यूटीओ में अपने वीटो का अत्यधिक उपयोग किया है, और बहुपक्षवाद का बढ़ना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।

First Published : December 29, 2025 | 10:43 PM IST