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दिल्ली हवाई अड्डे की घटना से आगे: बढ़ता यात्री असंतोष और भारत की विमानन प्रणाली पर दबाव

भारत का विमानन क्षेत्र पहले से कहीं अधिक लोगों को यात्रा करा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- January 02, 2026 | 9:35 PM IST

दिल्ली हवाई अड्डे पर एयर इंडिया एक्सप्रेस के ड्यूटी से बाहर पायलट द्वारा एक यात्री पर कथित हमले की घटना को किसी व्यक्ति के खराब आचरण का एक अलग मामला मानकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। इसे विमानन प्रणाली में बढ़ते परिचालन और मानव पर दबाव के संकेत के रूप में देखना बेहतर होगा। वर्ष 2021 से पिछले साल अक्टूबर तक, 36,500 से अधिक यात्री शिकायतें दर्ज की गईं। हालांकि कर्मचारियों के व्यवहार से जुड़ी घटनाएं बहुत कम हैं, लेकिन वे अक्सर उड़ान में व्यवधान, देरी या रद्द होने और कनेक्टिंग फ्लाइट छूटने जैसी स्थितियों में सामने आती हैं। भारत का विमानन क्षेत्र पहले से कहीं अधिक लोगों को यात्रा करा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है।

नागर विमानन महानिदेशालय के हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि ट्रैफिक की तुलना में यात्रियों की शिकायतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, यहां तक कि उन महीनों में भी जब यात्रियों की संख्या कम होती है, ऐसी शिकायतें आती हैं। उदाहरण के लिए, अक्टूबर 2025 में यात्री शिकायत दर प्रति 10,000 पर 1.1 थी, जबकि मई में यह 0.68 थी। इससे पता चलता है कि असंतोष अब केवल भीड़ या चरम मांग का परिणाम नहीं है। बल्कि, यह बताता है कि व्यवधान होने पर उसका प्रबंधन कैसे किया जाता है।

उड़ान में व्यवधान, धन वापसी और सामान को लेकर ही ज्यादातर शिकायतें होती हैं। मौसमी दबाव से इस प्रणाली की कमियां सबसे स्पष्ट रूप उजागर हो जाती हैं। मॉनसून और सर्दियों के महीनों में खराब मौसम के कारण उड़ानें रद्द होने की संख्या बढ़ जाती है, लेकिन आमतौर पर आकस्मिक देरी या पहले हुए व्यवधानों के कारण आगे होने वाली देरी से ही यात्रियों को गुजरना पड़ता है।

औपचारिक रूप से तो ‘कर्मचारी व्यवहार’ के रूप में वर्गीकृत शिकायतें कुल शिकायतों का एक छोटा हिस्सा हैं, लेकिन व्यवधान के समय में अक्सर ये बढ़ जाती हैं। पायलट, केबिन क्रू और ग्राउंड स्टाफ सहित फ्रंटलाइन स्टाफ पर समय का अत्यधिक दबाव होता है, उन पर कड़ी निगरानी रखी जाती है और उनके पास सीमित आजादी होती है। वे अक्सर प्रणालीगत विफलता और यात्रियों के गुस्से के बीच अंतिम कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। हाल के वर्षों में अधिकांश श्रेणियों में एयरलाइन रोजगार में वृद्धि के बावजूद यह तनाव बढ़ा है। हालांकि, कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि का अर्थ यह नहीं है कि काम आसान हो गया है।

यात्रियों की अधिक संख्या, सख्त कार्यक्रम और उत्पादकता की मांग का मतलब है कि अधिक लोगों को एक ऐसी प्रणाली से गुजरना पड़ रहा है, जिससे गड़बड़ी होने पर सुधार की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है। हाल के नियामकीय परिवर्तन भी इस विरोधाभास को रेखांकित करते हैं। फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशंस (एफडीटीएल) के नए नियमों में पायलटों और केबिन क्रू के लिए अधिक उदार ड्यूटी रोस्टर और विश्राम अवधि अनिवार्य हैं।

सुरक्षा में सुधार और थकान को कम करने के लिए डिजाइन किए गए ये नियम आवश्यक और लंबे समय से प्रतीक्षित हैं। लेकिन इनके लागू होने से पहले ही यह उजागर हो गया है कि एयरलाइन संचालन कितना नाजुक हो गया है। उड़ानों को रद्द करना पड़ रहा है क्योंकि एयरलाइंस शेड्यूल और क्रू की उपलब्धता को समायोजित कर रही हैं। यह इस बात की याद दिलाता है कि निवेश और योजना के बिना सुरक्षा, विश्वसनीयता और क्षमता को एक साथ अधिकतम स्तर तक नहीं बढ़ाया जा सकता।

इसके अलावा, उड़ान रद्द होने, उसमें देरी होने और बोर्डिंग न हो पाने की स्थिति में एयरलाइंस को यात्रियों को सुविधाएं और हर्जाना देना होता है, जिसमें काफी लागत आती है। उदाहरण के लिए, अकेले अक्टूबर में ही सभी घरेलू एयरलाइंस ने मिलकर सुविधा व हर्जाने पर लगभग 2.51 करोड़ रुपये खर्च किए।

शिकायतों के लगभग पूर्ण निपटान की दर केवल एक पहलू को ही बताती है। शिकायत के निपटान का मतलब यह नहीं है कि उसके कारणों को ठीक कर दिया गया है। हर्जाना तात्कालिक आक्रोश को शांत करता है, लेकिन इससे व्यवस्थागत कमजोरियों को दूर करने में कुछ खास मदद नहीं मिलती। जैसे-जैसे भारत का विमानन बाजार बढ़ता जा रहा है, एयरलाइंस को अनुभव प्रबंधन पर भी ध्यान देना चाहिए। इसका मतलब है सेवा की गुणवत्ता, काम करने की स्थिति और मजबूत परिचालन क्षमता को मूलभूत आधारभूत संरचना के रूप में मानना।

First Published : January 2, 2026 | 9:30 PM IST