वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी दोनों इस समय अमेरिका की हिरासत में हैं | फोटो: X
वेनेजुएला पर हमले और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के अमेरिका की गिरफ्त में होने के बाद उत्पन्न भू-राजनीतिक संकट के कारण निकट भविष्य में वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें चढ़ सकती हैं। हालांकि वेनेजुएला के घटनाक्रम पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों एवं अधिकारियों का कहना है कि मौजूदा हालात से भारत के तेल आयात या समग्र व्यापार पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया,‘फिलहाल तो हमें कोई जोखिम नहीं दिख रहा है। वेनेजुएला को हमारा निर्यात वैसे भी सीमित है। वहां से मुख्य रूप से पेट्रोलियम का आयात होता था, जो अब धीरे-धीरे कम हो गया है।’
सरकार नियंत्रित एक तेल कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि लैटिन अमेरिकी देश पर अमेरिका के हमले के बाद शुरू हुई उथल-पुथल का व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा था कि अमेरिकी तेल कंपनियां वेनेजुएला के तेल क्षेत्रों में अरबों डॉलर का निवेश करेंगी। अधिकारी ने कहा,‘ट्रंप तेल एवं गैस उत्पादन के हिमायती रहे हैं और इन दोनों संसाधनों का वेनेजुएला में विशाल भंडार है। हालांकि, इस घटनाक्रम का भारत पर कोई खास असर नहीं होगा, क्योंकि हमारे कुल तेल आयात में वेनेजुएला की हिस्सेदारी बहुत कम है और पिछले कुछ वर्षों में अमेरिकी प्रतिबंधों और रूस से किफायती दाम पर तेल उपलब्ध होने से इसमें और कमी आ गई है।’
मगर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि काफी कुछ आने वाले समय में राजनीतिक घटनाक्रमों पर निर्भर करेगा। उसके बाद ही दीर्घकालिक प्रभावों का सही अंदाजा लगाया जा सकेगा। शनिवार को अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ऐलान किया कि उनका देश वेनेजुएला के तेल भंडार का फायदा उठाने पर विचार करेगा। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान भारत और वेनेजुएला के बीच कुल 1.8 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था, जबकि भारत का कुल व्यापार 1.16 लाख करोड़ डॉलर दर्ज किया गया था। भारत के कुल व्यापार में वेनेजुएला को 21.7 करोड़ डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात हुआ था जो वित्त वर्ष 2025 में देश से हुए कुल निर्यात का महज 0.05 प्रतिशत था। इस लैटिन अमेरिकी देश से कुल 1.65 अरब डॉलर मूल्य का आयात हुआ, जो भारत के कुल आयात का 0.23 प्रतिशत ही है।
भारत से वेनेजुएला को मुख्य रूप से दवा उत्पाद, सिरैमिक, कपास, प्लास्टिक, कार्बनिक रसायन, कागज आदि निर्यात किए जाते हैं, जबकि वेनेजुएला से भारत में होने वाले कुल आयात में पेट्रोलियम 63 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ सबसे ऊपर है। इसके अलावा वहां से सागौन, सीसा, जस्ता और तांबा स्क्रैप आयात किए जाते हैं। तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) की विदेश में परिचालन करने वाली इकाई ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (ओवीएल) के पास वर्तमान में वेनेजुएला की राष्ट्रीय तेल कंपनी पीडीवीएसए के साथ संयुक्त उद्यम में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी है। पीडीवीएसए पूर्वी वेनेजुएला में ओरिनोको हैवी ऑयल बेल्ट में सैन क्रिस्टोबल क्षेत्र का संचालन करती है।
वेनेजुएला में भारत की तेल और गैस हिस्सेदारी वहां ओरिनोको तेल क्षेत्र में स्थित काराबोबो-1 फील्ड तक भी फैली हुई है। ओवीएल के पास काराबोबो-1 में 11 प्रतिशत हिस्सेदारी है जबकि इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसी) और ऑयल इंडिया लिमिटेड के पास इसी में में 3.5 प्रतिशत हिस्सेदारी है। शेष हिस्सेदारी पीडीवीएसए और रेपसोल के पास है।
ओएनजीसी विदेश ने पिछले वित्त वर्ष (2024-25) में 72.65 लाख टन तेल और 1.02 करोड़ टन तेल समतुल्य तेल एवं गैस का उत्पादन किया जो भारत के घरेलू उत्पादन का लगभग क्रमशः 24 प्रतिशत और 16 प्रतिशत है।
व्यापार मंत्रालय के पूर्व अधिकारी एवं दिल्ली स्थित विचार संस्था ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि वेनेजुएला में उत्पन्न अशांति से भारत के लिए किसी भी भौतिक, आर्थिक या ऊर्जा से जुड़ी बड़ी परेशानी खड़ी होने की आशंका नहीं है। हालांकि उन्होंने कहा कि भारत 2000 और 2010 के दशक में वेनेजुएला के कच्चे तेल का प्रमुख खरीदार था और ओवीएल जैसी भारतीय कंपनियों की ओरिनोको बेल्ट में उत्पादन में हिस्सेदारी है लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण वर्ष 2019 से द्विपक्षीय जुड़ाव कम होता गया है।
श्रीवास्तव ने कहा कि इस वजह से भारत को तेल आयात में कटौती और द्वितीयक प्रतिबंधों से बचने के लिए वाणिज्यिक गतिविधियां कम करने पर विवश होना पड़ा। इसका नतीजा यह हुआ कि वेनेजुएला के साथ भारत का व्यापार अब कम हो गया है और यह लगातार घट भी रहा है।
श्रीवास्तव ने कहा, ‘ताकत के दम पर चल रही मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में आने वाले समय में कच्चे माल और ऊर्जा संसाधनों के लिए संघर्ष तेज हो सकता है। इस समय अंतरराष्ट्रीय संस्थान कमजोर हो गए हैं और चीन एवं रूस को छोड़कर अधिकांश प्रमुख देश अमेरिका के कदमों पर चुप्पी साधे हुए हैं। इसे देखते हुए भारत को सावधानी से कदम बढ़ाना चाहिए और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा करनी चाहिए।’
(साथ में एजेंसियां)