दिग्विजय सिंह | फाइल फोटो
वह कांग्रेस के वरिष्ठतम नेताओं में से एक हैं। इसके बावजूद वह समय-समय पर खुद को और अपनी पार्टी को वैचारिक विवादों में उलझा देते हैं। इससे यही संकेत निकलता है कि कांग्रेस की अपनी वैचारिक खोज की यात्रा निरंतर जारी है। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य सभा सदस्य (उनका कार्यकाल इस वर्ष के अंत में समाप्त हो रहा है) दिग्विजय सिंह ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के केंद्रीय नियंत्रण और पुरस्कृत करने के ढांचे की जो तारीफ की है उसने कांग्रेस में एक बार फिर हलचल पैदा की है।
उन्होंने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर पोस्ट की जिसमें युवा नरेंद्र मोदी भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के चरणों में बैठे हुए हैं। सिंह ने लिखा कि यह तस्वीर बहुत प्रभावशाली है और भाजपा-आरएसएस जमीनी कार्यकर्ताओं को संगठन के भीतर मुख्यमंत्री तथा प्रधानमंत्री जैसे वरिष्ठ पद तक पहुंचने का अवसर देते हैं। उनकी एक अन्य पोस्ट जिसे भाजपा समर्थकों ने उद्धृत किया उसमें कहा जा रहा है कि उन्होंने सीधे पार्टी नेता राहुल गांधी को संबोधित करते हुए लिखा, ‘जिस तरह ईसीआईएसवीईईपी (चुनाव आयोग के एक कार्यक्रम) को सुधारों की जरूरत है उसी प्रकार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भी… हमें अधिक व्यावहारिक और विकेंद्रीकृत प्रणाली की जरूरत है।’
पार्टी के कुछ सदस्यों का कहना है कि वास्तव में दिग्विजय सिंह का सवाल यह है कि आखिर कांग्रेस, भाजपा जैसी क्यों नहीं बन सकती? वर्ष2018 के मध्य प्रदेश विधान सभा चुनावों के पहले उन्होंने पैदल नर्मदा परिक्रमा शुरू की थी। 2023 के विधान सभा चुनाव के पहले उन्होंने भगवा धारण कर दतिया की पीतांबर पीठ में पूजा अर्चना की। इसके पहले वह 35 किलोमीटर लंबी कांवड़ यात्रा में शामिल हुए जो जबलपुर के ग्वारीघाट से शुरू हुई और कैलाश धाम तक चली। यात्रा में एक लाख से अधिक लोग शामिल हुए और दिग्विजय सिंह को नंगे पैर चलते देखा गया। उन्होंने कुछ देर कांवड़ भी उठाई।
ये वही दिग्विजय सिंह हैं जिन्होंने 2010 में कांग्रेस के बुराड़ी अधिवेशन में भाजपा और आरएसएस जैसी ‘फासीवादी ताकतों’ पर जमकर हमला बोला था। उन्होंने कहा था, ‘आरएसएस अपनी राष्ट्रवादी विचारधारा की ओट में मुसलमानों को उसी तरह निशाना बना रहा है जिस तरह 1930 के दशक में नाज़ियों ने यहूदियों को बनाया था।’ उन्होंने कहा था कि आरएसएस नई पीढ़ी के मन में मुस्लिम विरोध वाली नफरत के बीज बो रहा है और यह सबसे बड़ा खतरा है।
उन्होंने आरोप लगाया था कि आरएसएस अपने कार्यकर्ताओं को अफसरशाही और सेना में भी प्रवेश दिला रहा है। उन्होंने यह प्रश्न भी किया था कि ‘आखिर क्यों मालेगांव, मक्का मस्जिद, समझौता एक्सप्रेस जैसे तमाम धमाकों में शामिल सभी लोगों का संबंध आरएसएस से ही था?’ इस प्रकार उन्होंने हिंदू आतंकवाद पर प्रभावी ढंग से बहस आरंभ कर दी थी।
अपनी मजबूरियों और विरोधाभासों के बीच कांग्रेस ने इस समस्या को सलीके से दफना दिया। अकादमिक जगत के लोग और विशेषज्ञ इसे नर्म हिंदुत्व कहते हैं। पार्टी में अनुष्ठान वाले हिंदुत्व के पैरोकार भी रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कमलापति त्रिपाठी बहुत मुखरता से हिंदुत्व के प्रतीक चिह्न धारण करते थे। कांग्रेस के मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में मध्य प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून पारित किया गया। इसका नाम था मध्य प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 1968। इससे पहले यानी 1954 में ही कांग्रेस की राज्य सरकार ने नियोगी समिति का गठन किया था ताकि धर्मांतरण और मिशनरी गतिविधियों की जांच की जा सके। ये उदाहरण बताते हैं कि कांग्रेस में हिंदुत्व की विचारधारा मौजूद थी।
यह कांग्रेस की उस वैचारिकी की पृष्ठभूमि है जिससे दिग्विजय सिंह निकले हैं। परंतु वह एक छिपे हुए हिंदुत्ववादी या कट्टर आरएसएस विरोधी नेता भर नहीं है। 1993 से 2003 तक यानी काफी साल पहले वह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। अर्जुन सिंह के शिष्य के रूप में शुरुआत करने वाले सिंह ने उस समय कई प्रशासनिक सुधार किए जो उन पर ही भारी पड़ गए। उन्होंने 73वें संविधान संशोधन का लाभ उठाते हुए विकेंद्रीकरण और पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत किया, जिससे जिला पंचायतों के सरपंचों को स्वायत्तता और शक्ति मिली। लेकिन इससे विधायक स्वयं को शक्तिहीन महसूस करने लगे और उनकी ही पार्टी के विधायक उन पर सवाल उठाने लगे।
मध्य प्रदेश की सड़क अधोसंरचना अच्छी नहीं थी। यद्यपि सिंह ने सड़कों के लिए बजटीय प्रावधान किए, लेकिन इसका केवल एक छोटा हिस्सा वास्तविक रखरखाव पर खर्च हुआ, जबकि अधिकांश हिस्सा राज्य-स्वामित्व वाली सड़क विकास निगम के कर्मचारियों के वेतन पर चला गया। वर्ष 2000 में मध्य प्रदेश के विभाजन और छत्तीसगढ़ के गठन के बाद, 32 फीसदी बिजली उत्पादन क्षमता छत्तीसगढ़ में चली गई। मध्य प्रदेश के पास दो विकल्प थे: जल्दी से विद्युत उत्पादन बढ़ाना और छत्तीसगढ़ से बिजली खरीदना। लेकिन इस बीच, राज्य कुछ समय के लिए 50 फीसदी बिजली की कमी से जूझता रहा। किसानों और अन्य उपभोक्ता वर्गों को मुफ्त बिजली देने का वादा करने के बाद, सिंह को नाराज उपभोक्ताओं के गुस्से का सामना करना पड़ा। आश्चर्य नहीं कि 2003 में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।
अपनी सोच में सिंह ने केवल अपने कई पूर्ववर्तियों की नकल की है, जिसके कारण विद्वान ‘नर्म हिंदुत्व’ की उस अवधारणा पर सवाल उठाते हैं जो संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता को सीधे तौर पर निशाना बनाए बिना उसे कमजोर करती है। एक प्रशासक के रूप में उनके पास बताने के लिए कई आधी-अधूरी सफलताएं हैं। लेकिन कांग्रेस के इतिहास में वे हमेशा केवल एक ‘भड़काने वाले एजेंट’ से कहीं अधिक रहेंगे।