जीत के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस व केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के साथ अन्य भाजपा नेता कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए
महाराष्ट्र में 29 नगर निगमों के हालिया चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि मुंबई महानगरीय क्षेत्र (एमएमआर) में लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के बुनियादी ढांचा संबंधी कार्य चल रहे हैं। नौ नगर निगमों को कवर करते हुए एमएमआर भारत के सबसे शहरीकृत क्षेत्रों में शामिल है।
पिछले सप्ताह घोषित चुनाव नतीजों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर देश के सबसे अमीर नगर निकाय बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) का चुनाव जीत लिया। उसने उद्धव और राज ठाकरे को शिकस्त दी। ठाकरे बंधु करीब दो दशक तक अलग रहने के बाद मराठी मतदाताओं को एकजुट करने के लिए एक साथ आए थे। मगर अब 29 नगर निगमों में से 23 में भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति की बहुमत है।
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि केंद्र में सत्ताधारी पार्टी को बीएमसी की कमान मिलने से उन्हें बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर निर्णय लेने और निष्पादन को रफ्तार देने में मदद मिलेगी। साथ ही परियोजनाओं के लिए नियामकीय मंजूरियां हासिल करने में भी तेजी दिख सकती है।
मुंबई विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर और पुणे इंटरनैशनल सेंटर में वरिष्ठ फेलो अभय पेठे ने कहा, ‘राष्ट्रीय आय में शहरी क्षेत्रों का योगदान करीब 65 फीसदी पर है। एमएमआरडीए और बीएमसी दोनों के कमिश्नर आम तौर पर मुख्यमंत्री के पसंदीदा व्यक्ति होते हैं। जब बीएमसी और राज्य में अलग-अलग पार्टी की सत्ता होती है तो अफसरशाही की स्वाभाविक प्रतिक्रिया रुकने और टालमटोल करने की हो जाती है। ऐसे में बड़ी परियोजनाएं स्थगित होने से लागत बढ़ जाती है। मगर अब केंद्र, राज्य और बीएमसी पर एक ही पार्टी का नियंत्रण होने से सरकार मुंबई महानगरीय क्षेत्र में मेगा परियोजनाओं के लिए बहुपक्षीय एजेंसियों से रकम जुटाने के लिए बेहतर तरीके से बातचीत कर सकेगी।’
मगर पेठे ने उन चुनौतियों की ओर इशारा किया जो आगे आने वाली हैं। उन्होंने आगाह किया कि मुंबई में रियल एस्टेट की ऊंची कीमतें निवेशकों को बाहर कर रही हैं।
पेठे ने कहा, ‘किसी भी शहर को रहने योग्य होना चाहिए और आजीविका का ध्यान रखना चाहिए। नौकरियां इतनी आसानी से नहीं मिलेंगी, खास तौर पर एआई के जमाने में। ऐसे में कौशल को बढ़ावा देने और स्टार्टअप को प्रोत्साहित करने पर ध्यान देना जरूरी है। स्थानीय निकाय का काम बुनियादी ढांचे का निर्माण करना और निवेश आकर्षित करना है ताकि वृद्धि चक्र शुरू हो सके।
राज्य सरकारी अधिकारियों के एक सूत्र ने बताया कि बीएमसी की कमान नई सरकार के पास आने से कई परियोजनाओं को गति मिलेगी। झुग्गी बस्ती पुनर्वास प्राधिकरण (एसआरए) के जरिये जीआईएस मैपिंग, सर्वेक्षण एवं झुग्गी बस्तियों का पुनर्विकास, कई सुरंग परियोजनाएं और नई इमारतों के लिए एआई आधारित मंजूरियों की तैयारी चल रही है। मगर एक सूत्र ने कहा कि राज्य सरकार और निगम की कमान एक ही पार्टी के पास होने से निर्णय लेने में आसानी होगी और अधिक परामर्श की जरूरत नहीं होगी।
पुणे के गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स ऐंड इकॉनमी में सहायक प्रोफेसर केदार नाइक का कहना है कि भाजपा और उसके सहयोगियों को विभिन्न आर्थिक स्तर के मतदाताओं की आकांक्षाओं को पूरा करना होगा।
उन्होंने कहा, ‘मतदान पैटर्न से पता चलता है कि भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को सभी आर्थिक तबकों- मध्य वर्ग, शहरी गरीब और अभिजात वर्ग- की मांगों पर ध्यान देना होगा। मध्य वर्ग के लिए उसे सड़कों के विस्तार, सौंदर्यीकरण और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर ध्यान देना होगा। शहरी गरीबों के लिए उसे आवास, झुग्गी पुनर्वास और कल्याण सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। केंद्र सरकार की कुछ योजनाएं इसमें मदद कर सकती हैं। जहां तक अभिजात वर्ग का सवाल है तो भूमि एवं कारोबारी मंजूरियों में तेजी लानी होगी और एफएसआई (फ्लोर स्पेस इंडेक्स) को उदार बनाने पर काम करना होगा।’
उन्होंने कहा, ‘नगर निगमों के पास केंद्रीय कारोबारी जिलों में विरासत वाली पर्याप्त भूमि है। इसे भुनाने की जरूरत है ताकि शहरी बुनियादी ढांचे में बेहतर निवेश किया जा सके। म्युनिसिपल बॉन्ड के जरिये ऐसा किया जा सकता है।’
हालांकि विपक्ष ने सत्ताधारी पार्टी के ‘विफल ट्रैक-रिकॉर्ड’ की ओर इशारा करते हुए कहा कि जब तक जमीनी स्तर पर काम न हो जाए तब तक वादे खोखले ही रहते हैं।
मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एवं एमएलसी भाई जगताप ने कहा, ‘राज्य के वित्तीय प्रबंधन के बारे में उनका ट्रैक रिकॉर्ड देख लीजिए। लाडकी बहन योजना में उन्हें 1,000 खाते और जोड़ने थे। उसका क्या हुआ? अब वे केवाईसी मांग रहे हैं और 12,00,000 से अधिक लाभार्थी इस योजना से बाहर हैं।’ उन्होंने कहा, ‘धारावी (झुग्गी पुनर्विकास), बांद्रा रिक्लेमेशन प्रोजेक्ट एक उद्योगपति को सौंप दी गई है। अब अंधाधुंध निजीकरण होगा।’
लाडकी बहन योजना 2024 में विधान सभा चुनावों से पहले भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन द्वारा शुरू की गई थी। इसके तहत पात्र महिला लाभार्थियों को 1,500 रुपये की मासिक सहायता प्रदान की जाती है। राज्य सरकार ने इस राशि को बढ़ाकर 2,100 करने का वादा किया था।
महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव भाऊसाहेब अजाबे ने कहा, ‘लाडकी बहन सरकारी खजाने पर बोझ बनती जा रही है। सरकार ने वंचित वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाओं और शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति में कटौती की है। पूरे हो चुके कार्यों के लिए ठेकेदारों का करीब 80,000 करोड़ रुपये का बकाया है।’
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई के पूर्व संकाय सदस्य (बुनियादी ढांचा एवं वित्त) संजीव चांदोलकर ने लाडकी बहन जैसी योजनाओं पर चिंता जताते हुए कहा, ‘आय सृजित करने वाली गतिविधियों के लिए दीर्घकालिक योजनाओं की आवश्यकता होती है। लाडकी बहन जैसी अल्पकालिक योजनाएं टिकाऊ नहीं हैं। इस योजना पर लगभग 48,000 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इससे महाराष्ट्र सरकार का कर्ज बढ़ रहा है, जो अब लगभग 10 लाख करोड़ रुपये हो चुका है। राज्य के बजट का लगभग 20 से 25 फीसदी हिस्सा ब्याज के भुगतान पर ही खर्च होता है।’
मुख्यमंत्री फडणवीस ने नगर निगम चुनाव प्रचार के दौरान मेट्रो के विस्तार की घोषणा की थी। साथ ही उन्होंने कहा था कि राज्य सरकार ने लोकल ट्रेनों को वातानुकूलित बनाने के लिए 238 डिब्बों की मांग की है।
मगर चांदोलकर ने आगाह किया, ‘सवाल यह है कि ये सेवाएं किस कीमत पर प्रदान की जा रही हैं। सार्वजनिक बुनियादी ढांचे की सार्वजनिकता ही महत्त्वपूर्ण है। मुंबई मेट्रो के तीसरे चरण में कुछ जगहों पर आने-जाने का टिकट करीब 100 रुपये का है। क्या यह एक ऐसे शहर के लिए अधिक नहीं है जहां बड़े पैमाने पर मजदूर और अनिश्चितताओं से घिरे विशाल अनौपचारिक क्षेत्र के लोग रहते हैं?’
कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) का गुट विपक्षी गठबंधन में सबसे कमजोर कड़ी के रूप में उभरा है। उनके अनुसार, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना और कांग्रेस विपक्षी गठबंधन के दो मजबूत स्तंभ हैं, मगर आशंका इस बात की थी कि पवार के नेतृत्व वाला गुट आखिरकार अजित पवार के गुट के साथ न चला जाए। पुणे और पिंपरी-चिंचवड नगर निगमों के चुनावों के लिए पवार के दोनों गुटों ने हाथ मिलाया था।