लेख

1985–95 क्यों आज भी भारत का सबसे निर्णायक दशक माना जाता है

आप सोच सकते हैं कि 1985-95 का दशक तो बहुत पहले समाप्त हो चुका है। परंतु यह सच नहीं है। उस दशक में उभरे मुद्दे अभी भी भारत में हो रहे विमर्श को आकार दे रहे हैं

Published by
शेखर गुप्ता   
Last Updated- January 04, 2026 | 10:47 PM IST

समाचार पत्रिका इंडिया टुडे 50 वर्ष की हो गई है। पत्रिका ने मुझसे 1985 से 1995 के दशक पर लिखने को कहा। यही वह समय था जब मैं वहां काम करता था। उसका परिणाम इस लेख के रूप में सामने आया।

एक युवा और उभरते गणराज्य में यकीनन विभिन्न दशकों के बीच इस बात की प्रतिस्पर्धा होगी कि उनमें से किसे सर्वाधिक निर्णायक माना जाए। इस कसौटी पर 1985-1995 का दशक सबसे अधिक ऐसी खबरों वाला रहा जो आज भी हमारे लोकतंत्र और बहसों पर हावी हैं। 

देश में और बाहर भी देखें तो कांग्रेस का अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद पराभव, पहले गठबंधन, बोफोर्स स्कैंडल, मंडल बनाम मंदिर, पंजाब और कश्मीर में अशांति, श्रीलंका और मालदीव में दो भारतीय सैन्य हस्तक्षेप, पाकिस्तान के साथ दोबार जंग जैसे हालात, चीन के साथ सुमदोरोंग चू में गतिरोध और उसके बाद तंग श्याओ फिंग के साथ रिश्तों में सुधार, जिया उल हक और राजीव गांधी की हत्या, इस्लामी जिहाद का वैश्वीकरण और कश्मीर में इसका प्रसार तथा भारतीय अर्थव्यवस्था का मुक्त होना। हालांकि दशक की शुरुआत कांग्रेस की 414 लोक सभा सीटों के साथ हुई थी लेकिन उन दस सालों में चार प्रधानमंत्री देश को मिले। क्या एक दशक के लिए यह काफी नहीं?

यह पूरी बात नहीं है। आर्थिक सुधारों के कारण जब भारत का वैश्विक कद बढ़ा तो इंडिया टुडे अपने पाठकों को दुनिया भर में ले गई। अफगान युद्ध से लेकर थ्यानअनमेन चौक तक और सोवियत संघ के पतन से लेकर पहले खाड़ी युद्ध तक। शीत युद्ध का अंत हो गया, रंगभेद का अंत हुआ, भारत और इजरायल दोस्त बने।

पीढ़ीगत बदलाव हों या अनंत बहसें। अलग-अलग दशकों की तुलना नहीं की जा सकती। स्वतंत्रता के बाद से भारत जिन आशंकाओं को पालता रहा, मसलन राजनीतिक अस्थिरता, सांप्रदायिक और जातीय विभाजन, स्थिरता देने वाले वंश का पतन, परमाणु और आतंकवादी खतरे, सबसे विश्वसनीय सहयोगी (सोवियत संघ) को खोना- ये सारी बातें इस दशक में सच साबित हुईं। यह सिक्के का एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि भारत ने कैसे प्रतिक्रिया दी। उसने गठबंधनों पर भरोसा करना सीखा, अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार किए, रणनीतिक रूप से पुनर्स्थापित हुआ और अपने मानव संसाधनों का लाभ उठाया। भारत कहीं अधिक मजबूत बनकर उभरा, और उसकी वैश्विक मौजूदगी लगातार बढ़ती गई।

इन वर्षों के दौरान इंडिया टुडे इस परिवर्तन के केंद्र में था और अक्सर अग्रिम पंक्ति में भी। इस दौर का पहला स्थायी सुधार राजीव गांधी का कंप्यूटरों को बढ़ावा देना था। भारतीय न्यूजरूम के लिए पहले कंप्यूटर के रूप में दो ऐपल डेस्कटॉप 1985 में आए। इन्हें एक अलग केबिन दिया गया, जबकि न्यूजरूम में जगह की भारी कमी थी। मुझे आज भी याद है कि मैंने इनमें से एक पर पहली स्टोरी 1985 में लिखी थी। वह मंडल आयोग से जुड़े शुरुआती विवाद पर थी और वह मुद्दा आज भी कायम है।

लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा और उसके बाद दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने ने तमाम राज्यों में सांप्रदायिक दंगे भड़का दिए। उसके बाद ही प्रमुख वाणिज्यिक इमारतों और उनके पास पड़ोस को निशाना बनाकर सिलसिलेवार बम धमाके किए गए। यह पहला मौका नहीं था जब देश में ऐसे बम धमाके हुए। लेकिन इससे पहले इतने बड़े पैमाने पर यह सब नहीं हुआ था न ही उन्हें इतनी सफाई से पाकिस्तान से जोड़ा जा सका था। उस समय ही आईएसआई का नाम सामने आया और वह तब से एक दुःस्वप्न बना हुआ है। गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम शारजाह क्रिकेट स्टेडियम में अपनी मजाकिया मौजूदगी से उभरकर भारत का दुश्मन नंबर एक हो गया और अब भी है।

राजीव गांधी द्वारा 1985 में मंडल आयोग की रिपोर्ट को नकारे जाने ने पिछड़ा वर्ग में एक किस्म की जागृति पैदा कर दी। इसके बाद शाह बानो फैसले को वापस लेने, सलमान रुश्दी की किताब द सैटेनिक वर्सेज पर प्रतिबंध, अयोध्या में मंदिर स्थल को खोलने के रूप में सांप्रदायिक प्रभाव वाली कई गलतियां की गईं। इसके बाद की राजनीति दो परस्पर विरोधी विचारों के बीच रही। क्या धर्म के नाम पर एकजुट लोगों को आप जाति के नाम पर बांट सकते हैं?

इनमें से जो जीतेगा वही देश पर शासन करेगा। मंडल यानी जाति पक्ष 1989 से 2014 तक प्रभावी रहा जब तक कि नरेंद्र मोदी ने इसे उलट नहीं दिया। अब मंदिर यानी हिंदुत्व का दौर है और यह कम से कम 25 वर्ष तो रहेगा ही। मुद्दा अभी भी मंदिर बनाम मस्जिद का है। बिहार में हमने हाल में ऐसा देखा और 2027 में उत्तर प्रदेश में ऐसा नजर आएगा। इस दशक में राष्ट्रीय राजनीति की पुनर्परिभाषा हमारे इतिहास में सबसे स्थायी रही है। यही बात राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर भी लागू होती है। सुधार-प्रेरित उछाल के पैंतीस साल बाद भी उदारीकरण को लेकर आशंकाएं और संदेह बने हुए हैं, भले ही हम अपनी सफलताओं का जश्न मना रहे हों।

एक संस्थान के रूप में इंडिया टुडे की ताकत यह रही है कि वह एक निष्पक्ष और अवसरों वाली योग्यता का संस्थान रहा। कठोर और कभी-कभी निर्मम लेकिन अगर आपके भीतर भूख, मेहनत, प्रतिभा और थोड़ी मोटी चमड़ी हो तो कोई भी और कुछ भी आप को रोक नहीं सकता था। मैं 1983 में पूर्वोत्तर को कवर करने के बाद पत्रिका में आया। मुझे चेतावनी दी गई कि यह एक ‘पांच सितारा न्यूजरूम’ है जहां हिंदी मीडियम टाइप लोगों का आकलन अत्यधिक कठोरता से होगा। लेकिन इंडिया टुडे ने खुद को विकसित किया। मेरी पहली आवरण कथा सुनील गावसकर पर थी। उस समय उन्होंने अपना 29वां शतक बनाकर डॉन ब्रैडमैन की बराबरी की थी। इससे पहले मैंने कभी खेल पर नहीं लिखा था। बस अरुण पुरी और सुमन दुबे (तब प्रबंध संपादक) को लगा था कि मैं यह करने के लिए बहुत अधिक उत्सुक हूं।

जुलाई 1988 तक इंडिया टुडे न्यूज रूम का नेतृत्व करने वाले टी एन नाइनन कहते हैं कि वह न्यूज रूम भारतीय पत्रकारिता की ‘ड्रीम टीम’ थी। इसका सबूत गूगल में है। उस दशक का मास्ट हेड आपको बता सकता है कि हम कितनी दूर तक पहुंचे। इंडिया टुडे ने रिपोर्टर- संपादक की अवधारणा को बढ़ावा दिया। वहां संपादक बनने के बाद भी कोई व्यक्ति दूसरे कामों के साथ रिपोर्टिंग जारी रख सकता था।

उसी दशक में इंडिया टुडे ने अपने पांच भाषाई संस्करण- हिंदी, तमिल, तेलुगू, मलयालम और गुजराती लॉन्च किए। 1991 के बाद से मुझे उनका नेतृत्व संभालने को कहा गया। मुझे यह काम अपनी बाकी जिम्मेदारियों के साथ करना था। कभी-कभी हम थक जाते थे और चाहते थे कि अरुण इसे स्वीकार करें। लेकिन वे नहीं करते। 1989 में सलमान रुश्दी के खिलाफ जारी फतवे पर 18 पन्नों की आवरण कथा को दुनिया भर से ‘फुटबॉल-टीम’ जैसी बाइलाइन के साथ दो रातों की नींद गंवाकर तैयार करने के बाद, मैं न्यूज डेस्क पर बैठा हुआ था। मैं संतोष से भरा हुआ अपने पैर झुला रहा था। तभी अरुण वहां से गुजरे।

तत्कालीन न्यूज कोऑर्डिनेटर संध्या मूलचंदानी ने कहा, ‘उसे इतना काम मत करने दो, अरुण, वह मर जाएगा। ‘सहानुभूति जताने के बजाय उन्होंने बस इतना कहा, ‘कड़ी मेहनत से कभी कोई नहीं मरा,’ और आगे बढ़ गए।

अब मैं उन तीन अहम सबकों की बात करूंगा जो मेरे साथ रह गए: हर कहानी का दूसरा पक्ष भी होता है। जब तक आपने उस पक्ष से जांच नहीं की है, कोई भी खबर प्रकाशित नहीं की जा सकती। और यदि कोई शिकायत करता है कि स्टोरी उनके प्रति गलत है, तो संपादक के रूप में आपकी स्वाभाविक स्थिति उनके पक्ष में होनी चाहिए जब तक कि आपके तथ्य सही साबित न हो जाएं।

जो कुछ भी मुफ्त या आसानी से मिलता है, उसमें बुराई छिपी होती है। बस ‘ना’ कह दीजिए।

और तीसरा, कार्यस्थल पर पहचान को लेकर संकोच न करें। लिंग, जातीयता, जाति, धर्म या किसी भी आधार पर कोई भेदभाव, उत्पीड़न, शोषण या पक्षपात नहीं होना चाहिए। इस दृष्टि से भी इंडिया टुडे संस्थागत रूप से दूरदर्शी था। यह सुधार और विकास से उत्पन्न प्रतिस्पर्धी समानता की नई मध्यमवर्गीय चेतना से आगे था।

मैं 1983 में पत्रिका से जुड़ा और मैंने 1995 में विदा ली, ठीक उसी समय जब दशक समाप्त हुआ। यदि दर्जनभर से अधिक इतिहास-निर्माण करने वाली खबरों-स्टोरी में से मैंने केवल एक यानी आर्थिक सुधार को छोड़कर बाकी सभी में हिस्सा लिया तो  अब मैं यही कहूंगा कि उस दशक में जिंदगी अच्छी गुजरी, खासकर अरस्तूवादी नजरिए से। 

First Published : January 4, 2026 | 10:46 PM IST