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ओडिशा के एक छोटे से गांव में महिला किसानों के एक समूह ने बढ़ते तापमान को एक अवसर में तब्दील कर दिया। हर्षा ट्रस्ट द्वारा समर्थित मार्कोमा महिला किसान उत्पादक कंपनी (एफपीओ) ने स्थानीय सब्जी उत्पादकों की सहूलियत के लिए 5 टन ईकोजेन सौर-ऊर्जा से चलने वाला कोल्ड स्टोरेज संयंत्र स्थापित कर दिया। यह ट्रस्ट 460 से अधिक किसानों का एक समूह है। किसानों की जरूरतों के सावधानीपूर्वक आकलन के बाद साल 2018 में शुरू की गई इस पहल से फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान कम हुए हैं और उत्पादकता में सुधार हुआ है। साथ ही संगठित बाजार संपर्क के माध्यम से कीमतें स्थिर हुई हैं और पड़ोसी समुदायों में सौर तकनीक के बारे में जागरूकता बढ़ी है।
एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत में 30-40 फीसदी फल एवं सब्जियां उपभोक्ताओं तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाती हैं। परिवहन, भंडारण और प्रसंस्करण के दौरान यह सबसे अधिक होता है। इन तीनों प्रक्रियाओं के लिए निर्बाध बिजली की जरूरत होती है। इसके अभाव में खाद्य पदार्थ जल्दी खराब हो जाते हैं, किसान कम कीमतों पर कृषि उत्पाद बेचने के लिए विवश हो जाते हैं और उपज सड़ने पर उत्सर्जन बढ़ जाता है। मगर खाद्य वस्तुओं की हानि की चर्चा बुनियादी ढांचे और लॉजिस्टिक (परिवहन व्यवस्था) तक सिमट कर रह जाती है। इसमें उन ऊर्जा प्रणालियों की अनदेखी होती हैं जिनकी सख्त जरूरत है। बिजली के बिना कोल्ड स्टोरेज संयंत्र नहीं चल सकते, प्रसंस्करण केंद्र अव्यवस्थित बिजली आपूर्ति के भरोसे नहीं चल सकते, सुखाने जैसी सरल संरक्षण तकनीक की भी यांत्रिक उपकरणों पर निर्भरता बढ़ रही है। छोटे किसानों के लिए अविश्वसनीय ग्रिड या डीजल जेनरेटर पर निर्भरता प्रतिकूल परिणाम ला सकती है।
भारत में स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े बदलाव अक्सर सोलर पार्क, पवन ऊर्जा केंद्रों और बिजली से चलने वाले वाहनों के इर्द-गिर्द ही सीमित रहते हैं। मगर स्वच्छ ऊर्जा की सबसे अधिक परिवर्तनकारी क्षमता कृषि में निहित है जिस पर गंभीरता से विचार नहीं हो रहा है। पीएम-कुसुम, राष्ट्रीय सौर मिशन और पीएम सूर्य घर निःशुल्क बिजली योजना जैसी सरकारी योजनाओं ने पहले ही ग्रामीण भारत में नवीकरणीय ऊर्जा की पहुंच का विस्तार कर दिया है। अगर इन उपायों को रणनीतिक रूप से कृषि मूल्य श्रृंखलाओं के साथ जोड़ा जाए तो फसलों की कटाई के बाद होने वाले नुकसान का कारण बनने वाले बुनियादी ढांचे के अंतर को पाटने में मदद मिल सकती है।
विकेंद्रित नवीकरणीय ऊर्जा प्रणाली (डीआरई) डीजल पर निर्भरता कम कर सकती है, परिचालन लागत घटा सकती है और कोल्ड स्टोरेज और प्रसंस्करण इकाइयों को दूरदराज के क्षेत्रों में भी व्यावहारिक बना सकती है। हालांकि, नीति समन्वय सीमित है। कृषि और ऊर्जा अलग-अलग मंत्रालयों, वित्त पोषण चैनलों और क्रियान्वयन मार्गों के साथ अलग-अलग काम करते हैं। अगर नवीकरणीय ऊर्जा की मदद से फसलों को होने वाले नुकसान को प्रभावी ढंग से दूर करना है तो इन अंतरों को पाटना आवश्यक है।
रोजगार सृजन करने की डीआरई की रोजगार क्षमता भी बेहद अहम है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का अनुमान है कि भारत 37 लाख नए हरित रोजगार सृजन करने की क्षमता रखता है जिनमें अधिकांश नवीकरणीय ऊर्जा और इसके कृषि क्षेत्र से इसके संबंधों से जुड़े होंगे। विकेंद्रीकृत सौर बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए तकनीशियनों, इलेक्ट्रीशियन, लॉजिस्टिक स्टाफ और ऑपरेटर की आवश्यकता होती है। कोल्ड स्टोरेज चेन प्रबंधन और विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण अतिरिक्त स्थानीय रोजगार पैदा करते हैं। स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े बदलाव कृषि में तेजी से हो रही डिजिटल क्रांति से भी जुड़े हैं।
आईटीसी मार्स जैसे प्लेटफॉर्म आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित फसल सलाहकार, निदान और बाजार से जुड़ी जानकारी प्रदान करते हैं। मगर केवल डिजिटल उपकरण फसल कटाई के बाद उत्पन्न चुनौतियों का समाधान नहीं कर सकते हैं। किसानों को उपलब्ध कराई जाने वाली जानकारियों पर कदम बढ़ाने के लिए बुनियादी ऊर्जा ढांचे की आवश्यकता है यानी उपज संरक्षित करने के लिए कोल्ड स्टोरेज, मूल्य जोड़ने के लिए प्रसंस्करण इकाइयां और बाजार तक पहुंच के लिए लॉजिस्टिक तंत्र की दरकार है।
डिजिटल नवाचार किसानों को यह मार्गदर्शन कर सकता है कि फसल कब काटी जाए, नवीकरणीय ऊर्जा यह सुनिश्चित करती है कि फसल बर्बाद न हो। साथ में ये दो बदलाव (स्मार्ट सलाहकार और स्मार्ट ऊर्जा) ग्रामीण लचीलापन को मजबूत कर सकते हैं।
हालांकि, तकनीक कहानी का केवल एक पहलू है। पूरे भारत में ग्रामीण समुदाय उस चीज का उपयोग कर नवाचार करता है जिसे अक्सर ‘ जुगाड़’ बता कर खारिज कर दिया जाता है। ये जुगाड़ दरअसल स्थानीय ज्ञान में निहित तात्कालिक, कम लागत वाले समाधान होते हैं। किसानों ने स्थानीय सामग्रियों से सौर ड्रायर तैयार किए हैं, पुरानी रेफ्रिजरेटेड ट्रकों को मोबाइल कोल्ड स्टोरेज में बदल दिया है और सामुदायिक-संचालित प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित की हैं।
अक्सर नीतिगत चर्चा में सफलता को ‘एक स्तर से दूसरे स्तर तक ले जाने’ के संदर्भ में परिभाषित की जाती है। यह मान लिया जाता है कि राष्ट्रीय स्तर पर कोई सफलता दोहराई जा सकती है। मगर कृषि और ऊर्जा प्रणालियां स्वाभाविक रूप से स्थान-विशिष्ट हैं। जो विधि हिमाचल प्रदेश की पहाड़ियों में काम करती है वह तटीय ओडिशा में संभवतः काम नहीं कर सकती। स्थानीय रूप से अनुकूलित समाधानों को फलने-फूलने से भारत को अधिक लाभ मिल सकता है। डीआरई प्रणाली स्वाभाविक रूप से इस दृष्टिकोण के अनुकूल हैं। भारत धीरे-धीरे वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है जिसे देखते हुए खाद्य प्रणालियों के साथ नवीकरणीय ऊर्जा को जोड़ना एक राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए। पीएम-कुसुम जैसे कार्यक्रमों ने साबित किया है कि कैसे सौर ऊर्जा सिंचाई को ताकत देते हैं। इसी तरह के ऊर्जा संपर्क की जरूरत फसल कटाई के बाद की प्रणालियों जैसे कोल्ड स्टोरेज, ड्रायर और प्रसंस्करण केंद्रों के लिए हैं।
खासकर बागवानी फसलों के लिए जिनके खराब होने की आशंका अधिक होती है। वित्त पोषण और कौशल प्रमुख चुनौतियां बनी हुई हैं, खासकर उन किसान समूहों के लिए जो उच्च अग्रिम लागत का सामना कर रहे हैं। लक्षित ऋण, सार्वजनिक-निजी भागीदारी और पर्यावरण के अनुकूल काम करने के जरूरी ज्ञान और कौशल इस अंतर को पाटने में मदद कर सकते हैं।
(लेखिका क्रमशः विद्याशिल्प विश्वविद्यालय, बेंगलूरु और दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)