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चुनाव नतीजों के मुताबिक बदलाव की जरूरत

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देश में अधिक समावेशी वृद्धि मॉडल की आवश्यकता है। देश प्रगति कर रहा है लेकिन हमारा वृद्धि मॉडल टिकाऊ नहीं नजर आता है।

Last Updated- June 06, 2024 | 9:54 PM IST
Free food grains scheme will be heavy on the exchequer

आम चुनाव के नतीजों पर गौर करें तो देश के मतदाताओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं बल्कि समावेशी वृद्धि चाहते हैं। बता रहे हैं अजय छिब्बर

हालिया आम चुनाव से दो अहम संकेत निकले हैं: पहला, विभाजनकारी, ध्रुवीकरण की राजनीति कारगर नहीं है। इस बात का संकेत तो इसी बात से मिल गया कि भारतीय जनता पार्टी को अयोध्या (फैजाबाद) की सीट पर भी हार का सामना करना पड़ा जहां बाबरी मस्जिद विध्वंस स्थल पर राम मंदिर बनाया गया है।

दूसरा, देश में अधिक समावेशी वृद्धि मॉडल की आवश्यकता है। देश प्रगति कर रहा है लेकिन हमारा वृद्धि मॉडल टिकाऊ नहीं नजर आता है। कृषि और विनिर्माण क्षेत्र जूझ रहे हैं। सेवा क्षेत्र के कई हिस्से खासकर आईटी से संबद्ध हिस्से (ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स की बढ़ती तादाद के साथ) जरूर बेहतर काम कर रहे हैं।

बहरहाल, सीमित रोजगार की वजह से बड़ी तादाद में लोग कृषि क्षेत्र में फंसे हुए हैं और असमानता तथा ग्रामीण क्षेत्रों में निराशा बढ़ती जा रही है। देश की अर्थव्यवस्था को अरबपति राज कहा जा रहा है। अगर इन हालात में सुधार नहीं हुआ तो देश की बढ़ती युवा आबादी की बेरोजगारी और ग्रामीण संकट तथा बढ़ती असमानता भारी पड़ेगी। मैं तीन अहम सुधारों का सुझाव देता हूं।

पहला है कृषि सुधार। पिछले कार्यकाल में सरकार ने कृषि क्षेत्र की आय दोगुनी करने का वादा किया था लेकिन इसके लिए कोई स्पष्ट योजना नहीं थी। उसने नए कृषि कानून लाने का प्रयास किया लेकिन किसानों के तीक्ष्ण विरोध के बीच उन्हें वापस लेना पड़ा। इसके बजाय सरकार को किसानों के समक्ष भविष्य की एक स्पष्ट योजना पेश करनी चाहिए। शांता कुमार आयोग ने ऐसा एक विजन प्रस्तुत भी किया था लेकिन उसे अज्ञात वजहों से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

अब सरकार फंस गई है क्योंकि उसने पांच साल तक मुफ्त राशन का वादा किया है। अब वह भारतीय खाद्य निगम की सरकारी खरीद पर आधारित इस महंगी योजना को चालू रखने के लिए विवश है। इसके साथ न्यूनतम समर्थन मूल्य को भी जारी रखना होगा।

मेक्सिको और तुर्किये जैसे मध्यम आय वाले अन्य देशों की तरह भारत को भी समर्थन मूल्य तथा कच्चे माल जैसे कि उर्वरक, बिजली, कीटनाशक आदि पर सब्सिडी से दूरी बनानी चाहिए। इनकी वजह से कृषि क्षेत्र पांच दशक पहले के हालात में अटक गया है।

इसकी जगह सरकार को पीएम किसान में इजाफा करना चाहिए, हर प्रकार की सब्सिडी समाप्त करनी चाहिए और किसानों को अपने फसल मिश्रण में बदलाव के लिए स्वतंत्र करते हुए उन्हें अपनी जमीन का उत्पादक इस्तेमाल करने देना चाहिए।

भारत की खपत में इजाफे को देखते हुए फल और सब्जियों, तिलहन तथा दालों की और अधिक आवश्यकता है जबकि अनाज और गन्ने की कम। एमएसपी की व्यवस्था के कारण फसल का मिश्रण गैर किफायती और अनुत्पादक हो गया है। इसके चलते भूजल स्तर प्रभावित हो रहा है और जमीन की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है। सीएसडीएस-लोकनीति का एक सर्वेक्षण दिखाता है कि केवल 26 फीसदी किसान खेती का काम जारी रखना चाहते हैं और उनमें से भी अधिकांश ऊंची एमएसपी के बजाय सीधे अपने बैंक खाते में पैसे चाहते हैं।

दूसरा, भारत कारक बाजार सुधारों से भी बच नहीं सकता है। देश के श्रम कानूनों की बात करें तो जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था कि वे श्रमिक विरोधी हैं क्योंकि वे लोगों को काम पर रखने को हतोत्साहित करते हैं। हमारा फ्लोर एरिया अनुपात दुनिया में सबसे कम है और हम जमीन का किफायती इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं।

जटिल श्रम कानूनों से बचने के लिए कंपनियां पूंजी पर अधिक ध्यान देती हैं और अनुबंधित दैनिक श्रमिकों से काम लेती हैं। दुनिया में सबसे अधिक दैनिक मजदूर भारत में हैं। हमारे यहां ढेर सारी जमीन गैर किफायती छोटी जोत में फंसी है। अधोसंरचना सुधरी है लेकिन पेट्रोल और डीजल बहुत महंगा है, उत्पादकों को बिजली महंगी पड़ती है और हमारा रेल माल भाड़ा भी दुनिया में सबसे अधिक है।

इससे उत्पादन और वस्तुओं को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना मुश्किल होता है। ईंधन को अगा जीएसटी व्यवस्था के 28 फीसदी के उच्चतम स्लैब में लाया जाए तो अब की तुलना में इनकी कीमत में कमी आएगी। इससे हम चीन का मुकाबला कर पाएंगे जहां ईंधन हमसे 30 फीसदी सस्ता है।

विभिन्न उत्पादकों के लिए बिजली कीमतों की बात करें तो यह उन्हें 30 फीसदी महंगी पड़ती है और मालभाड़ा भी चीन से तीन गुना अधिक है। इन्हें कम करने से हमारा विनिर्माण अधिक प्रतिस्पर्धी होगा। कीमतों को इस प्रकार तार्किक बनाने से देश का विनिर्माण अधिक बेहतर बनेगा। सेवा क्षेत्र की भांति देश के जनांकिकीय लाभांश का भी फायदा उठाना होगा। इसके लिए हमें प्रतिस्पर्धी श्रम, गहन विनिर्माण और निर्यात पर जोर देना होगा।

तीसरा, चीन ने सन 1995 में अहम प्रशासनिक सुधार किए और अपनी सरकार का आधुनिकीकरण किया। मलेशिया ने भी सन 2000 के आसपास ऐसा ही किया। भारत में ऐसे सुधार नहीं हुए और हमारी अर्थव्यवस्था अभी भी 19वीं सदी की प्रशासनिक और विधिक व्यवस्था से संचालित है।

ई-सेवाएं और आधार ने कुछ सेवाओं और सब्सिडी की आपूर्ति में मदद की है लेकिन बुनियादी प्रशासनिक ढांचा दिक्कतदेह बना हुआ है। इसके निचले स्तर पर बहुत बड़ी तादाद में कर्मचारी हैं और जटिल नियमन और प्रक्रियाओं के साथ विवेकाधीन शक्तियां भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती हैं। इसमें बदलाव जरूरी है।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनैशनल के अनुसार भारत के नागरिकों ने साल 2021 में एशिया में सबसे अधिक रिश्वत दी। यहां रिश्वत का स्तर बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका से भी अधिक रहा। इसके साथ ही सरकारी संस्थानों को कमजोर करके राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ काम पर लगाना भी कारगर नहीं। न्याय का पहिया बहुत धीमा घूम रहा है। न्याय में देरी का अर्थ है न्याय का न होना।

स्थानीय स्तर पर काम का बंटवारा करने की आवश्यकता है। महापौरों को अधिकार संपन्न बनाए बिना स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सेवाओं की प्रभावी आपूर्ति नहीं की जा सकती है और शहरीकरण की स्थिति गड़बड़ बनी रहेगी। स्मार्ट सिटी कार्यक्रम इन समस्याओं का हल नहीं हैं। देश के शहर अधिकार संपन्न शासन से बेहतर बनेंगे।

16वें वित्त आयोग के माध्यम से अगर स्थानीय प्रशासन को संसाधन देने के मसले को हल किया जाए तो बेहतर होगा। शहरों में उच्च संपत्ति कर का प्रयोग भी मददगार हो सकता है जैसा कि चेन्नई में किया गया। बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के लिए शहरी सरकारों और गांव के सरपंचों को भी अधिक अधिकारों की आवश्यकता है।

गांधी जी ने उचित ही कहा था कि हमारा भविष्य इस बात पर निर्भर है कि हम आज क्या करते हैं। कुछ लोग कहेंगे ऐसे बड़े सुधार अगले पांच वर्षों में गठबंधन सरकार के कार्यकाल में संभव नहीं होंगे।

बहरहाल, अतीत बताता है कि हमने गठबंधन सरकारों के दौर में ही बड़े और साहसी सुधार किए हैं। भारत को बेरोजगारी, ग्रामीण संकट से निपटते हुए समावेशी वृद्धि की प्रक्रिया को अपनाना होगा ताकि रोजगार तैयार हो सकें। मतदाता भी संभवत: यही चाहते हैं।

(लेखक जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनैशनल इकनॉमिक पॉलिसी के प्रतिष्ठित विजिटिंग स्कॉलर हैं)

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First Published - June 6, 2024 | 9:35 PM IST

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