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राष्ट्र की बात: मणिपुर, पूर्वोत्तर और दिल्ली की सरकार

Last Updated- June 05, 2023 | 12:43 AM IST
Amit Shah

पूर्वोत्तर के एक छोटे से राज्य में आप तीन चीजें कभी नहीं करेंगे: स्थानीय नेताओं को कमजोर करना, बांटने और राज करने की नीति अपनाना और जातीय पहचानों का घालमेल करना।

मणिपुर के मौजूदा संकट से जुड़ी सबसे अहम घटना यह है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्वयं वहां जाकर माहौल को नियंत्रित करने का प्रयास किया। वह दिल्ली से दूर स्थित किसी राज्य का फटाफट किया हुआ दौरा नहीं था कि वह वहां पहुंचे, मीडिया से बात की, राज्य सरकार और अधिकारियों के साथ दो बैठकें कीं, कुछ प्रतिनिधिमंडलों से भेंट की और रात में घर लौट आए। वह वहां चार दिन तक रुके।

शायद यह पहला अवसर है जब किसी गृहमंत्री ने किसी संकटग्रस्त राज्य की राजधानी में इतना अधिक वक्त बिताया हो। यह इस बात की अहम सार्वजनिक स्वीकृति है कि केंद्र सरकार इस दूरदराज इलाके की चिंताओं को शीर्ष प्राथमिकता दे रही है। ऐसे में यह अच्छी बात है कि गृहमंत्री ने मणिपुर में इतना अधिक समय और राजनीतिक पूंजी लगाई।

मणिपुर में बिताए समय की बदौलत वह चुनावी राजनीति से परे इस जटिल राज्य की हकीकतों को समझ पाए होंगे। सन 1970 के दशक में इस इलाके का पुनर्गठन किए जाने को पांच दशक बीत चुके हैं और इस दौरान एक रुझान निरंतर देखने को मिला है: केंद्र में चाहे जिस दल की सरकार रही हो, उसने अपनी या अपने वफादारों की सरकार बनवाने के लिए स्थानीय शक्तिशाली कुलीनों को अपने साथ मिलाया है।

अपने समय में कांग्रेस ने ऐसा किया और 1977 में सत्ता में आई जनता पार्टी ने भी अपेक्षाकृत कम समय में यही करने का प्रयास किया। जाहिर है भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भी यहां नया कुछ नहीं किया। तमाम अन्य क्षेत्रों की तरह यहां भी भाजपा बड़े पैमाने पर काम करना चाहती है। अगर आपकी पार्टी या उसका कोई छोटा सहयोगी दल पूर्वोत्तर पर राज करे तो इससे उत्साह बढ़ता है। इंदिरा या राजीव के युग में भी ऐसा कम ही हुआ। उदाहरण के लिए त्रिपुरा में वाम दलों ने लगातार इंदिरा गांधी की कांग्रेस को पराजित किया।

उनके बेटे राजीव ने एक अलग राह पकड़ी और मिजो अलगाववादियों तथा असम आंदोलन के नेताओं के साथ शांति समझौते किए और फिर चुनावों के बाद उन्हें शक्ति सौंपी। अब उस क्षेत्र का राजनीतिक मानचित्र एकदम अलग नजर आता है। इस समय इस क्षेत्र में भाजपा जिस तरह छायी हुई है, वैसा कोई उदाहरण अतीत में नहीं मिलता।

इससे समस्याएं भी जुड़ी हैं जिनका अहसास शाह को अपनी यात्रा के दौरान हुआ होगा। अगर उन्होंने इंफाल यात्रा के दौरान स्थानीय समाचार पत्र पढ़े होंगे तो स्थानीय अंग्रेजी समाचार पत्र ‘द संगाई एक्सप्रेस’ का 2 जून का अंक भी पढ़ा होगा। देश के आम चलन के अनुसार ही अखबार में पूरे पन्ने का सरकारी विज्ञापन भी आया था।

विज्ञापन में ‘अमित शाह जी की शांति स्थापना की कोशिशों’ की सराहना की गई थी। सबसे ऊपर मृतकों के परिवारों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शोक संदेश था और उसके बाद 29 मई से 1 जून तक की अमित शाह की यात्रा के दौरान हालात सामान्य करने के लिए उठाए गए कदम गिनाए गए थे। जबकि अखबार के संपादकीय में एकदम विपरीत बात कही गई थी। मैं संपादकीय की कुछ पंक्तियां दोहराता हूं जो बताती हैं कि हमारे मीडिया से हाल के दिनों में किस प्रकार का साहस नदारद है। शुरुआती पंक्तियों में कहा गया है, ‘करीब एक महीने का वक्त बीत गया है और ऐसा कोई संकेत नहीं है जिससे अंदाजा लगे कि मणिपुर सुधार की दिशा में है।’ अखबार आगे कहता है कि इंफाल-

दीमापुर राजमार्ग पर अभी भी बंदूकधारियों का राज है और वे निजी वाहनों की जांच कर रहे हैं कि कहीं उनमें कोई ‘दुश्मन’ (मैतेई) तो सवार नहीं है। संपादकीय जातीय पूर्वग्रह वाला नहीं है। वह दिल से निकली एक निष्पक्ष हताश आवाज है। वह जहां मैतेइयों को निशाना बनाए जाने और उनके जनजातीय जिलों से पलायन की बात करता है, वहीं वह यह भी दर्ज करता है कि कैसे कुकी समुदाय के लोगों को हिंसात्मक ढंग से इंफाल घाटी से बाहर किया गया।

अखबार कहता है कि इंफाल तथा अन्य घाटी आधारित जिलों के मुख्यालय लगभग कुकी लोगों से मुक्त हो चुके हैं और इस त्रासद हकीकत के बाद भी दोनों पक्षों ने अपना रुख नरम नहीं किया है। अगर सत्ता में नौ वर्षों के दौरान मणिपुर भाजपा के लिए आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है तो इसका संबंध जटिल राजनीति और जनांकिकी से भी है। खासकर असम के अलावा पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों से जिन पर दिल्ली से शासन करना कभी आसान रहा ही नहीं।

बल्कि वर्ष बीतने के साथ ही उन पर शिलॉन्ग (व्यापक असम की मूल राजधानी) या अब गुवाहाटी से भी शासन करना असंभव साबित हुआ है। हर राज्य का अपना सोच, अपनी राजनीति और जनांकिकीय है। एक पार्टी, एक नारा, एक विचार, एक नेतृत्व वहां काम नहीं करता। कम से कम वैसे नहीं जैसे कि मध्य प्रदेश, गुजरात या असम में करेगा।

जनजातीय कुलीन वर्ग हमेशा दिल्ली के दखल से नाराज रहा है। अब उन्हें हिमंत विश्व शर्मा के रूप में एक क्षेत्रीय नेता से भी निपटना है। वे सार्वजनिक रूप से ऐसा नहीं कहेंगे लेकिन अगर वे आप पर भरोसा करके बात करें तो वे आपको याद दिलाएंगे कि उनकी अलग राज्य की मांग की एक बड़ी वजह थी असम के नियंत्रण से बाहर निकलना। अब भाजपा ने उन्हें वापस उसी स्थिति में ला दिया है।

आप इस तथ्य पर ध्यान दे सकते हैं कि भाजपा के एक नेता जो मणिपुर में सक्रिय नजर नहीं आ रहे हैं तो वह विश्व शर्मा ही हैं। हालांकि उन्हें इस क्षेत्र का नेता माना जाता है और वह औपचारिक तौर पर पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन के नेतृत्वकर्ता भी हैं। यह इस क्षेत्र के सभी मुख्यमंत्रियों का समूह है फिर चाहे वे किसी भी दल के हों।

पूर्वोत्तर के छोटे राज्य मुख्य भूमि के राजनीतिक, प्रशासनिक या खुफिया एजेंसी के नेताओं को तवज्जो नहीं देते हैं और इसकी कई वजह हैं।
पहली है स्वायत्त मानसिकता। शायद दशकों की दूरी और पहचान की विशिष्टता ने इसे जटिल बना दिया हो। यही कारण है कि वहां इतने विद्रोह होते हैं और कुछ तो अभी भी चालू हैं।

इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण यानी नैशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड का नेतृत्व और अधिकांश सदस्य तांगखुल जनजाति के सदस्यों के पास है जिन्होंने मोदी सरकार को शांति समझौते के लिए नौ साल से प्रतीक्षारत रखा है। इसके नेता टी मुइवा भी तांगखुल हैं। यह जनजाति न केवल नगालैंड बल्कि मणिपुर में भी रहती है और इसकी आबादी छह लाख है। मणिपुर में वे किसी की ओर से नहीं लड़ रहे हैं। वे बस इस क्षेत्र की विविधता से निपटने की चुनौती बढ़ा रहे हैं, बल्कि एक कदम आगे बढ़कर कहूं तो क्षेत्र की सशस्त्र विविधता की चुनौती को।

अगर ये छह लाख लोग नई दिल्ली से किसी के आदेश की परवाह नहीं करते तो 10 लाख कुकी क्यों करेंगे? या फिर क्या पता कल मिजो भी ऐसा करें? इससे पता चलता है कि हम इस जटिल क्षेत्र की हकीकत को लेकर कितने अनजान हैं। यही वजह है कि अब तक राष्ट्रीय मीडिया यहां नहीं पहुंचा और जोरामथंगा के नेतृत्व वाले मिजो नैशनल फ्रंट की सरकार के भीतर बढ़ती दिक्कतों के बारे में कोई खबर सामने नहीं आई।

इस सरकार को इस वर्ष के अंत में चुनाव का सामना करना है। मिजो और कुकी जनजातियों की साझा जातीय पहचान है और अगर मणिपुर से निकला गुस्सा मिजोरम की सीमा में फैला तो भाजपा के साझेदार मिजो नैशनल फ्रंट की मुश्किल और बढ़ेगी।

पूर्वोत्तर के इन छोटे राज्यों में आप तीन काम कभी नहीं करना चाहेंगे। पहला, लोगों से कभी यह नहीं कहेंगे कि उनका मुख्यमंत्री नाम का है और वास्तविक बॉस कहीं और रहता है। दूसरा, बहुमत को अपने पक्ष में करने के लिए एक जनजाति को दूसरी जनजाति से न भिड़ाएंगे और तीसरा, कभी भी अलग-अलग जातीय, भाषाई या सांस्कृतिक पहचानों को एक राष्ट्रीय पहचान में शामिल करने की कोशिश नहीं करेंगे। बीते दशकों में अलगाववाद कम हुआ है। इन राज्यों में शांति स्थापित हुई और भारतीय राष्ट्रवाद की भावना तक पनपी है। इस प्रक्रिया को तेज करने की कोई भी कोशिश उलटी पड़ सकती है।

चूंकि अभी हमारा ध्यान मणिपुर पर है इसलिए बस यह याद रखें कि भारत के विचार के लिए मणिपुर कितना अहम है। पहली बार ‘स्वतंत्र’ भारत का झंडा मणिपुर में ही आगे बढ़ती राष्ट्रवादी सेना ने फहराया था। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने 14 अप्रैल, 1944 को इंफाल से 45 किलोमीटर दूर ऐसा किया था। तब इसे दिल्ली का दरवाजा माना जाता था। आज मणिपुर दिल्ली की ओर देख रहा है- बेहतर समझ और सहानुभूति के लिए।

First Published - June 5, 2023 | 12:43 AM IST

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