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मणिपुर और म्यांमार सीमा पर राजनीतिक आंच की ताप: पूर्वोत्तर के लिए द्विदलीय भागीदारी जरूरी

भारत-म्यांमार सीमा पर बाड़बंदी, म्यांमार चुनाव और मणिपुर राष्ट्रपति शासन ने पूर्वोत्तर की राजनीति को नया मोड़ दिया और कुकी-मैतेई विवाद को और गहरा बना दिया।

Last Updated- August 22, 2025 | 11:11 PM IST
प्रतीकात्मक तस्वीर

देश में विपक्ष द्वारा उठाए गए चुनाव संबंधी गड़बड़ियों के मुद्दे के बीच अगस्त महीने में दो महत्त्वपूर्ण घटनाएं हुईं, जिन पर किसी का ध्यान नहीं गया। पहली, 1 अगस्त को पड़ोसी देश म्यांमार की सेना ने फरवरी 2021 से लगाए गए आपातकाल को खत्म दिया ताकि वहां दिसंबर में चुनाव हो सकें। दूसरी घटना 5 अगस्त को हुई जब भारतीय संसद ने मणिपुर में राष्ट्रपति शासन को छह महीने के लिए और बढ़ा दिया। ये दोनों घटनाएं वैसे तो एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं लेकिन अगर इन दोनों घटनाओं और बांग्लादेश में अगले साल फरवरी में होने वाले चुनाव को मिलाकर देखें तो ये घटनाक्रम, भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की राजनीति पर गहरा असर डालेंगे।

यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि म्यांमार में भयानक गृहयुद्ध चल रहा है। वहां की सेना का सीमावर्ती इलाकों, खासकर म्यांमार-चीन की सीमा से लगे शान राज्य और मणिपुर तथा मिजोरम की सीमा से लगे चिन राज्य पर बहुत कम नियंत्रण है। सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस (सीएसईपी) ने हाल ही में एक शोध अध्ययन प्रकाशित किया है जिसमें दक्षिण एशिया में चीन की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भूमिका के बारे में शोधार्थी अमारा थीहा ने एक संपादित खंड में इस बात का जिक्र किया है कि चीन, शान राज्य (और वास्तव में म्यांमार के कई अन्य हिस्सों में) की राजनीति में बेहद सक्रिय है। वास्तव में चीन की यह रणनीति बिल्कुल सामान्य है। दरअसल चीन, म्यांमार को आर्थिक और सैन्य मदद देकर, अप्रत्यक्ष रूप से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर दबाव बनाता है जिसके कारण भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति और अधिक जटिल हो जाती है।

म्यांमार की राजनीति का असर मिजोरम, नागालैंड और खासकर मणिपुर में देखने को मिलता है। पिछले साल नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के 100 दिन पूरा होने के मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि मणिपुर में जनजातीय तनाव की समस्या की जड़ में म्यांमार से हो रही घुसपैठ है। ऐसे में भारत और म्यांमार के बीच सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए 1968 से लागू ‘मुक्त आवागमन व्यवस्था’ (एफएमआर) को खत्म कर दिया गया था। साथ ही 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा में से 30 किलोमीटर में बाड़ लगाई गई थी ताकि म्यांमार की सीमा से लोग अवैध रूप से भारत में न आ सकें। इसकी संभावना कम ही दिखती है कि पूरी सीमा पर दिसंबर 2025 तक बाड़ लग जाए जब म्यांमार में चुनाव होने हैं। ऐसा अनुमान है कि बाड़ लगाने में 10 साल लग सकते हैं।

पूर्वोत्तर के कुछ अलगाववादी समूहों के शिविर और प्रशिक्षण केंद्र म्यांमार के उत्तरी सागाइंग क्षेत्र में हैं और ये समूह इस बाड़ से नाखुश हैं। मणिपुर से सटे दक्षिणी क्षेत्र में, कुछ संगठनों को प्रतिरोध समूहों के खिलाफ जुंटा द्वारा प्रभावी रूप से इस्तेमाल किया गया है। म्यांमार में ज्यादातर विरोधी समूह चुनावों का बहिष्कार कर रहे हैं, क्योंकि वे इसे महज एक दिखावा मानते हैं। इस वजह से भारतीय सीमा के पास एक समानांतर प्रशासन चलता रहेगा जो भारत और म्यांमार दोनों के लिए खतरा है।

वैसे मणिपुर में हिंसा में भारी कमी आई है और यह विशेषतौर पर राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद हुआ है लेकिन हिंदू मैतेई आबादी और कुकी-जो जनजाति समुदायों के बीच तनाव अब भी बरकरार है। मणिपुर में कुकी-जो और मैतेई समुदायों के बीच की लड़ाई म्यांमार के जातीय विभाजन जैसी है। कुकी-जो समुदाय के लोगों के रिश्तेदार और परिवारों के संबंध के तार म्यांमार से भी जुड़े हैं इसलिए वे सीमा पर बाड़ लगाने का विरोध करते हैं क्योंकि इससे आवाजाही रुक जाती है।

इस साल मई में बाड़ का विरोध कर रहे म्यांमार के विद्रोही समूहों और भारतीय सुरक्षा बलों के बीच गोलीबारी हुई, जिसमें 10 विद्रोही मारे गए। सेना ने बताया कि इस गोलीबारी के बाद उनके पास से सात एके-47 राइफल, एक आरपीजी लॉन्चर, एक एम4 राइफल और अन्य खतरनाक हथियार मिले। ये वास्तव में गंभीर किस्म के हथियार हैं। म्यांमार की सरकार कमजोर होने पर इस तरह की घटनाएं बढ़ सकती हैं, खासतौर पर अगर मणिपुर के कुकी-जो लोग खुद को भारत से अधिक अपने म्यांमार वाले रिश्तेदारों के करीब महसूस करने लगें।

मणिपुर एक ऐसा राज्य है जहां सबसे अधिक बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया है। मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच मतभेद नए नहीं हैं। ये मतभेद अक्सर सामने आते हैं और इन्हें राजनीतिक तौर पर देखा जाता है। इस साल जून में, इम्फाल में उस वक्त गोलीबारी हुई जब राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने एक मैतेई समूह, अरामबाई तेंगगोल के कुछ सदस्यों को गिरफ्तार किया। इसके तुरंत बाद, उस क्षेत्र के लोगों ने पुलिस स्टेशन को घेर लिया और उनकी रिहाई की मांग की। उस क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राज्य सभा सांसद भी विरोध जताने के लिए तुरंत राजभवन गए।

पूर्वोत्तर के इस हिस्से में होने वाली इतनी सारी घटनाओं को देखते हुए और अधिक राजनीतिक भागीदारी की जरूरत है जो अनिवार्य रूप से द्विपक्षीय हो। वर्ष 2025 का शेष समय और वर्ष 2026, इस क्षेत्र के लिए एक महत्त्वपूर्ण समय हो सकता है।

First Published - August 22, 2025 | 10:43 PM IST

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