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टेस्ट में भारत की गिरती बादशाहत: भारतीय क्रिकेट में रेंगने की चर्चा का दौर

भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच हुई टेस्ट श्रृंखला का एक निर्णायक सच यह है कि भारत का रेड बॉल यानी टेस्ट क्रिकेट में पतन हुआ है। जहां एक विदेशी टीम ने हमें घुटनों पर ला दिया

Last Updated- November 30, 2025 | 9:10 PM IST
Indian Cricket Team
भारतीय क्रिकेट टीम

हिंदी टीवी समाचार चैनलों पर जिस तरह की कल्पनाशील और रंगीन सुर्खियां जारी की जाती हैं, उसे देखते हुए मुझे आश्चर्य हो रहा है कि अब तक किसी ने दक्षिण अफ्रीका द्वारा भारत को हराए जाने को ‘बौने का बदला’ नहीं कहा। मानव विकास के इस चरण में, बौना शब्द का प्रयोग भी बेहद अनुचित है। बौना हिंदी/पंजाबी में एक और अधिक अपमानजनक शब्द है, जिसका उपयोग किसी छोटे कद वाले व्यक्ति के लिए किया जाता है।

जसप्रीत बुमराह ने दक्षिण अफ्रीका के कप्तान टेंबा बावुमा को यही कहकर पुकारा था। महज पांच फुट चार इंच कद के बावुमा दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट टीम में शानदार बदलाव लाए हैं। बुमराह मैच के दौरान विकेटकीपर ऋषभ पंत से एलबीडल्यू की एक अपील को लेकर बात कर रहे थे। पंत ने कहा, ‘यह शॉर्ट (छोटा) भी तो है’। बुमराह ने इसके बाद बौना शब्द का प्रयोग किया और एक ऐसी गाली दे दी जो कई भाषाओं में आम बोलचाल में है।

प्रतिस्पर्धी क्रिकेट में गालियां आम हैं और उनसे किसी को दिक्कत भी नहीं होती। महिला क्रिकेट भी इस मामले में पीछे नहीं है। परंतु स्टंप माइक्रोफोन और सोशल मीडिया के जमाने में गाली के साथ बौना बोलने के बाद आप बच नहीं सकते। बावुमा क्रिकेट के दिग्गज खिलाड़ी हैं। पांच फुट चार इंच की ऊंचाई उनके क्रिकेटिंग कद को परिभाषित नहीं करती। ठीक वैसे ही जैसे सुनील गावसकर या एक इंच लंबे सचिन तेंडुलकर या गुंडप्पा विश्वनाथ को नहीं करती थी। दक्षिण अफ्रीका के लिए तो बावुमा भी उनकी तरह लिटल मास्टर हैं। वह उस देश की क्रिकेट टीम के पहले काले कप्तान हैं जो नस्ली विभाजन से निपट रहा है। वह विभाजन जो रग्बी से लेकर क्रिकेट तक तमाम खेलों में मौजूद रहा है।

बावुमा ने पहले टेस्ट की दक्षिण अफ्रीका की दूसरी पारी में कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए 55 रन बनाए, जो उस टेस्ट में दोनों टीमों की ओर से सर्वोच्च स्कोर था। इस पारी ने उनकी टीम की जीत की नींव रखी। इसके बाद भारत को अपने ही घर में सबसे बड़े अंतर यानी 408 रनों से करारी हार और अपमान झेलना पड़ा, जिससे श्रृंखला 2-0 से दक्षिण अफ्रीका के हक में समाप्त हुई। इस तरह ‘बौना’ ने, यदि ऐसा कहा जाए, बदला ले लिया।

दक्षिण अफ्रीका ने पहला टेस्ट बमुश्किल आठ सत्रों में अपने नाम कर लिया। हमने देखा कि मैच समाप्त होने पर बुमराह बावुमा से गर्मजोशी से बातचीत करते नजर आए। उनके चेहरे पर बधाई का भाव था और शायद पश्चाताप का भी। गुवाहाटी में चौथे दिन के अंत तक, जब पूछा गया कि उन्होंने भारत को इतनी देर तक मैदान में क्यों रखा बजाय पहले घोषणा करने के, तो दक्षिण अफ्रीका के कोच शुक्री कॉनराड ने कहा, ‘हम चाहते थे कि वे रेंगे।’ संभव है कि उन्हें संदर्भ पता था। वे भारत को उनके ही अंदाज में क्रिकेट के तौर-तरीके सिखा रहे थे। चोट के बदले चोट।

रेंगने (ग्रवल)का संदर्भ 1976 में जाता है जब वेस्टइंडीज की टीम इंगलैंड आई और मेजबान कप्तान टोनी ग्रेग ने श्रृंखला से पहले कहा था कि वह वेस्टइंडीज की टीम को रेंगने पर विवश करना चाहते हैं।

नस्लवाद किसी से छिपा नहीं रहा, और इसलिए भी कि ग्रेग दक्षिण अफ्रीका में जन्मे थे और वह नस्लभेद युग का शिखर समय था। इस बात ने वेस्टइंडीज की टीम को नाराज और एकजुट किया। उन्होंने इंगलैंड को उसके ही घर में 3-0 से पराजित किया। हालांकि उस समय वेस्ट इंडीज की टीम में क्लाइव लॉयड, गॉर्डन ग्रीनिज, विवियन रिचर्ड्स, माइकल होल्डिंग, ऐंडी रॉबर्ट्स, वैनबर्न होल्डर, वेन डैनियल और अन्य जैसे महान खिलाड़ी थे। गुवाहाटी में मैच के बाद हुए संवाददाता सम्मेलन में बावुमा से ‘रेंगने’ वाली टिप्पणी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि कोच की उम्र तकरीबन 60 साल है और वह उनके शब्दों के बारे में सोचेंगे। उन्होंने यह भी कहा, ‘लेकिन इस श्रृंखला में कुछ (भारतीय) खिलाड़ी भी हद पार करते नजर आए हैं।’

यह पहला मौका नहीं है जब बावुमा का मजाक उड़ाया गया है। इंटरनेट पर 2023 में उनकी कही एक बात तुरंत तैरने लगी, ‘मुझे जिंदगी में कई नामों से बुलाया गया है। कुछ नाम दुख देते हैं लेकिन मुझे जिंदगी में जिस नाम से सबसे अधिक बुलाया गया, वह है टेंबा। मेरी दादी ने मुझे टेंबा नाम दिया था क्योंकि इसका अर्थ है उम्मीद। अपने समुदाय के ​लिए उम्मीद। अपने देश के लिए उम्मीद।’

हालांकि ये शब्द श्रृंखला को परिभाषित नहीं करते। श्रृंखला की वास्तविक परिभाषा है भारतीय टेस्ट क्रिकेट का विनाशकारी पतन, जहां एक विदेशी टीम ने पूरी श्रृंखला पर कब्जा कर लिया। भारतीय जेन-जी और यहां तक कि मिलेनियल्स को भी याद नहीं कि भारतीय टेस्ट क्रिकेट कभी ऐसी स्थिति में रहा हो। 2008 से 2025 के बीच खेले गए 88 घरेलू टेस्ट मैचों में भारत ने शानदार 59 जीत दर्ज की थीं। भारत दो बार विश्व टेस्ट चैंपियनशिप (डब्ल्यूटीसी) के फाइनल तक पहुंचा और शास्त्री-द्रविड़ युग में लंबे समय तक टेस्ट रैंकिंग में शीर्ष पर बनाए रखा।

इन 17 साल में भारत अपनी जमीन पर केवल 10 टेस्ट हारा। इनमें से आधे यानी पांच बीती दो श्रृंखलाओं में न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध मिली हार हैं। हम देश में मिलने वाली बढ़त गंवा चुके हैं और विडंबना है कि हमारी टीम अब विदेश में अधिक बेहतर खेल रही है बजाय कि देश के।

हमारी मौजूदा टीम न तो बेहतर स्पिन गेंदबाजी कर पा रही है, न ही स्पिन के विरुद्ध अच्छी बल्लेबाजी। दूसरा, टीम प्रबंधन में बदलाव के बाद हरफनमौला खिलाड़ी विशेषज्ञों पर तरजीह पा रहे हैं। 2001 से ही भारत का घरेलू फॉर्मूला साधारण रहा है। एक आक्रामक विकेट कीपर, दो तेज गेंदबाज और तीन विशेषज्ञ स्पिन गेंदबाज। अगर इनमें से कुछ अच्छी बल्लेबाजी भी कर लें तो बेहतर।

समय के साथ उम्र और थकान ने पुराने स्पिनरों पर असर डाला। फिर यह अजीब मूर्खतापूर्ण विचार आया कि वॉशिंगटन सुंदर को बल्लेबाजी करने वाले ऑफ-स्पिनर के रूप में खिलाया जाए, जिसने ईडन गार्डन्स की दो-दिवसीय पिच पर केवल एक ओवर फेंका और गुवाहाटी में एक विकेट लिया और 48 रन बनाए। कितनी हास्यास्पद बात है कि उनको नंबर तीन पर उतारा गया। वह स्थान जो हाल ही में शुभमन गिल, चेतेश्वर पुजारा और राहुल द्रविड़ का रहा है और फिर गुवाहाटी में उन्हें नंबर आठ पर धकेल दिया गया। नीतीश रेड्डी को भी बल्लेबाजी हरफनमौला के रूप में खिलाया गया। उन्होंने भी गुवाहाटी में दो पारियों में 10 ओवर फेंके और इतने ही रन बनाए।

यह हठधर्मिता है। भारतीय चयनकर्ताओं को, आत्मसंतुष्ट अजीत अगरकर के नेतृत्व में, घरेलू क्रिकेट पर नजर रखनी चाहिए थी ताकि कुछ स्पिन प्रतिभा सामने आए। मुझे यकीन है कि रणजी में आधा दर्जन खिलाड़ी होंगे जो आज सुंदर या जाडेजा से बेहतर गेंदबाजी कर सकते हैं। बल्लेबाजों को घरेलू क्रिकेट खेलने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए था और स्पिन खेलने का अभ्यास कराया जाना चाहिए था। दक्षिण अफ्रीका भी पाकिस्तान में ड्रॉ हुई श्रृंखला के बाद अच्छी तरह तैयार होकर आया।

बड़ी समस्या यह है कि बीसीसीआई का ध्यान टेस्ट क्रिकेट पर नहीं है। प्रशंसक ही उसका ग्राहक है और टेस्ट क्रिकेट खेल का सबसे शुद्ध तथा सबसे मूल्यवान रूप है। इंगलैंड और ऑस्ट्रेलिया श्रृंखला के दर्शक आंकड़ों पर नजर डालिए। इसे क्रिकेट और पार्टी राजनीति को भूलकर परिस्थितियों के अनुसार सही विकल्प चुनने की नीति पर लौटना होगा। यदि खेल के अलग-अलग प्रारूपों के लिए अलग कप्तान हो सकते हैं, तो अलग कोच भी खोजे जा सकते हैं।

गौतम गंभीर क्रिकेट की नई पीढ़ी से आते हैं, जिसका सबसे आक्रामक रूप उनके पश्चिमी दिल्ली में मिलता है, जो विराट कोहली की कर्मभूमि भी है। यह ’क्या उखाड़ लेगा’ स्कूल ऑफ क्रिकेट है। फिलहाल, उन्होंने केवल भारतीय टेस्ट क्रिकेट की गिल्लियां उखाड़ दी हैं। उन्हें चयन समिति के साथ जाना चाहिए। उन्होंने उस स्टार सिस्टम को नष्ट करने के लिए एक बड़े अभियान की शुरुआत की जिसे वह नापसंद करते थे। भारत का रेड बॉल वर्चस्व एक आकस्मिक क्षति बन गया है। क्या उन्हें परवाह है? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अब उन्हें जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। यह डब्ल्यूटीसी चक्र ऑस्ट्रेलिया के भारत में पांच टेस्ट खेलने के साथ समाप्त होता है। तब तक  बीसीसीआई घर में हार स्वीकार करने को लेकर सहज न हो जाए।

First Published - November 30, 2025 | 8:59 PM IST

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