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रहने योग्य शहरों के लिए डिजाइन को नागरिक कौशल बनाना क्यों जरूरी है?

शहरों की बनावट से जुड़ी समस्या स्पष्ट नजर आ रही है और संबंधित संस्थागत तंत्र उनका व्यापक स्तर पर समाधान खोजने के मामले में बहुत विवश महसूस कर रहा है

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अमित कपूर   
Last Updated- December 30, 2025 | 9:54 PM IST

भारत के शहर तेजी से विकास कर रहे हैं और रोजमर्रा के जीवन में नए रूपों में अपनी उपस्थिति का एहसास करा रहे हैं। शहरी परिदृश्य असाधारण गति से तैयार हो रहा है मगर इसे आकार देने वाली संस्थाएं इसकी रफ्तार के साथ तालमेल बैठाने में मुश्किलों का सामना कर रही हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि लगभग हर महानगर में तनाव साफ नजर आ रहा है। शहरों की बनावट से जुड़ी समस्या स्पष्ट नजर आ रही है और संबंधित संस्थागत तंत्र उनका व्यापक स्तर पर समाधान खोजने के मामले में बहुत विवश महसूस कर रहा है।

लिहाजा शहरों के ढांचे बेहतर बनाने के लिए बेहतर डिजाइन या चुस्त दिशानिर्देशों से कहीं बेहतर करने की जरूरत है। इसके लिए खुद राज्य की डिजाइन क्षमता का निर्माण करने की आवश्यकता है ताकि अच्छे विचार उन प्रक्रियाओं एवं औपचारिकताओं से बाधित न हो जिनका उद्देश्य उन्हें मुकाम तक पहुंचाना है।

चुनौती तब और बढ़ जाती है जब कोई इस बात की पड़ताल करता है कि भारत के शहरी भविष्य का ढांचा तैयार करने की उम्मीद किससे लगाई जा रही है। कुछ वर्ष पहले ‘यूएन-हैबिटेट’ ने अनुमान लगाया था कि भारत में प्रति 1,00,000 लोगों पर केवल 0.23 शहरी योजनाकार हैं जबकि ब्रिटेन में प्रति 1,00,000 लोगों पर इनकी संख्या 38 हैं। यह आंकड़ा नाइजीरिया से भी कम हैं जहां यह अनुपात लगभग 1.4 है। टाउन ऐंड कंट्री प्लानिंग ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मिलाकर केवल 3,945 स्वीकृत शहरी योजनाकार के पद हैं। लगभग 8,000 शहरी केंद्रों वाले देश के लिए यह कमी चौंका देने वाली है।

नीति आयोग के 2021 के आकलन में पाया गया कि भारत के आधे से अधिक वैधानिक कस्बों में कोई मास्टर प्लान नहीं है और लगभग तीन-चौथाई जनगणना कस्बों का शहरीकरण किसी भी औपचारिक स्थानिक ढांचे के अभाव में हुआ है। शहरी योजनाकारों की अनुपस्थिति कहानी का केवल एक हिस्सा है। भारत की शहर बनाने वाली मशीनरी, बजट, खरीद, रखरखाव, विभागीय समन्वय इस तरह से तैयार किया गया है कि वे अक्सर शहरी रूपरेखा के इरादे को दरकिनार, कमजोर या पलट देते हैं। शहर जानते हैं कि क्या तैयार करना है, मगर कैसे तैयार करना है यह सवाल उन्हें पीछे धकेल देता है।

यही कारण है कि भारत में संरचनात्मक विफलताओं को विशुद्ध रूप से सौंदर्य या बुनियादी ढांचे की कमियों के रूप में नहीं समझा जा सकता है। एक खतरनाक चौराहा, एक अनुपयोगी फुटपाथ या पैदल चलने वालों के लिए मुश्किल हालात पैदा करने वाले मेट्रो स्टेशन शायद ही केवल एक खराब निर्णय का नतीजा होते हैं। ये उन प्रक्रियाओं का संचयी परिणाम हैं जिन्हें पहली जगह बनावट से जुड़ी सोच एकीकृत करने के लिए कभी नहीं बनाया गया था। लिहाजा भारत के शहरी स्वरूप को ठीक करने के लिए न केवल विशेषज्ञों के बीच बल्कि पूरे शासन तंत्र में संरचना संबंधी बुद्धिमत्ता बहाल करना आवश्यक है।

नागरिक अर्थ में डिजाइन या संरचना का मतलब अलंकरण नहीं है। यह निर्मित वातावरण और मानव व्यवहार, गतिशीलता और सुरक्षा, सार्वजनिक निवेश और सार्वजनिक अनुभव के बीच संरेखण या तालमेल से जुड़ा विषय है। रहने योग्य शहरों पर विश्व बैंक का अध्ययन इस पर बार-बार जोर देता है यानी बुनियादी ढांचा तभी सफल होता है जब इस सोच के इर्द-गिर्द इसकी बनावट तैयार की जाती है कि लोग वास्तव में इसका उपयोग कैसे करते हैं न कि अधिकारी किस तरह की कल्पना करते हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के डिजाइन ​थिंकिंग फ्रेमवर्क में उन सार्वजनिक प्रणालियों का जिक्र है जो निर्णय लेने से पहले सुनती हैं, उन्हें बढ़ाने से पहले समाधानों का परीक्षण करती हैं और नागरिकों को निष्क्रिय प्राप्तकर्ताओं के बजाय सह-निर्माताओं के रूप में देखती हैं।

भारत में इसी दृष्टिकोण की आवश्यकता है जहां नगर निकायों की दिनचर्या अभी भी 20वीं सदी के मध्य के तर्कों पर निर्भर करती हैं। बजटों को विभाग के आधार पर आवंटित किया जाता है न कि परिणाम के आधार पर। खरीद ढांचे सबसे कम लागत वाले ठेकेदार को जटिल सार्वजनिक-स्थान या परिवहन परियोजनाओं के लिए दिए जाते हैं जहां संरचना की गुणवत्ता दीर्घकालिक प्रदर्शन को निर्धारित करती है। ऐसी प्रणाली में संरचना का इरादा जमीन पर उतरने के साथ ही कमजोर हो जाता है। अप्रत्याशित रूप से संकरे नव निर्मित फुटपाथ, खुले बस स्टॉप और पैदल चलने वाले को पेश आने वाली परेशानी क्षमतागत विफलता के जीते-जागते उदाहरण हैं।

दैनिक परिचालन निर्णय लेने वाले लोग (इंजीनियर, वार्ड अधिकारी, ठेकेदार, खाता क्लर्क, यातायात पुलिस) शायद ही कभी स्थानिक सोच या उपयोगकर्ता-केंद्रित संरचना में प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं फिर भी वे किसी भी प्रशिक्षित वास्तुकार की जगह शहर को आकार देते रहते हैं। कुछ भारतीय शहर इस बदलाव के साथ प्रयोग करना शुरू कर रहे हैं भले ही असमान रूप से। उदाहरण के लिए चेन्नई के ‘कम्प्लीट स्ट्रीट्स’ कार्यक्रम मेंप्रशिक्षु सौंदर्यीकरण से आगे बढ़ते हुए इंजीनियरों को ट्रेनिंग देकर गलियों की संरचना के ढांचे अद्यतन किए जा रहे हैं और पैदल चलने वालों के व्यवहार पर नजर रख कर जमीनी अवलोकन के माध्यम से गलियारे संचालित किए जा रहे हैं।

इसी तरह, पुणे की गली संरचना दिशानिर्देशों ने विभागों और ठेकेदारों को एक साझा ढांचा प्रदान किया जिससे क्रियान्वयन में कुछ सुधार हुआ। सूरत में शुरू एक लचीली योजना ने जलवायु आंकड़े, बाढ़ के प्रारूप और भूमि-उपयोग के निर्णयों को एक जगह टटोलने का प्रयास किया है जिससे चरम मौसमी घटनाओं को विशुद्ध रूप से आपातकालीन प्रतिक्रिया के बजाय बनावट से जुड़े ढांचे एवं शासन तंत्र से जुड़े विषय के रूप में दर्शाया गया है।

ये प्रयास अपने आप में पूरी तरह दुरुस्त नहीं हैं मगर वे दिखाते हैं कि अगर डिजाइन सिद्धांत सलाहकार रिपोर्टों में अलग-थलग पड़े रहने के बजाय नगर निकाय के कार्यों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराएं तो क्या फर्क पड़ता है। यहां तक कि भारत के प्रमुख महानगर भी उपेक्षित डिजाइन क्षमता से हुए नुकसान की बात स्वीकार कर रहे हैं। बेंगलूरु में नवगठित ग्रेटर बेंगलूरु अथॉरिटी ने बाढ़, टूटे हुए फुटपाथ और असंगठित परियोजनाओं के साथ वर्षों की सार्वजनिक निराशा के बाद हाल ही में खुद शहरी डिजाइनरों और योजनाकारों की भर्ती करने के लिए कदम उठाया। ये प्रयास एम्बेडेड डिजाइन इंटेलिजेंस के बिना बेकार हैं, यहां तक कि भारी निवेश से भी कभी-कभी निराशाजनक परिणाम मिलते हैं।

तो डिजाइन को एक नागरिक कौशल के रूप में मानने का क्या आशय होगा? इसका मतलब होगा बजट को लाइन आइटम से परिणामों में स्थानांतरित करना, उदाहरण के लिए, ‘एक्स करोड़ सड़कों के लिए’ नहीं बल्कि ‘पैदल यात्री सुरक्षा में एक्स फीसदी सुधार’। इसका मतलब एक ऐसे खरीद प्रारूप से होगा जो न केवल लागत बल्कि गुणवत्ता और उपयोगिता का भी मूल्यांकन करता हो। इसका मतलब होगा वार्ड इंजीनियरों को परियोजनाओं का मूल्यांकन करने के लिए प्रशिक्षित करना ताकि वे अपने स्तर से ही पता लगा सकें। इसका मतलब होगा रेहड़ी-पटरी दुकानदारों, यात्रियों, छात्रों, कचरा निस्तारण कार्यकर्ताओं सहित नागरिकों को डिजाइन प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाना क्योंकि उनके पास भी ऐसी समझ होती है जिस पर योजनाकारों का ध्यान अक्सर नहीं जाता है।

वर्ष2050 में देश जिस अधिकांश बुनियादी ढांचे पर निर्भर करेगा उसका निर्माण अभी तक नहीं हुआ है। अब लिए गए निर्णय आने वाली पीढ़ियों के लिए गतिशीलता प्रारूप, गर्म मौसम के जोखिम, सार्वजनिक जीवन और जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता पर असर छोड़ेंगे। अच्छी बनावट मायने रखेगी और इसे देने की क्षमता भी उतनी ही अहम होगी। भारत को अपनी संस्थाओं के अंदर डिजाइन के बारे में संजीदगी से विचार करने वाले लोगों की आवश्यकता है। अगर यह शासन तंत्र का एक सामान्य हिस्सा बन जाता है तो शहर ऐसे तरीकों से काम करना शुरू कर देंगे जो थकाऊ होने के बजाय सहजता एवं सरलता का एहसास कराएंगे। चुनौती बहुत बड़ी है लेकिन अवसर भी छोटा नहीं है।


(लेखक इंस्टीट्यूट फॉर कंपेटिटिवनेस के अध्यक्ष हैं। इस आलेख में मीनाक्षी अजित का भी सहयोग है)

First Published : December 30, 2025 | 9:46 PM IST