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सेबी के सरप्लस पर सीमा क्यों? बाजार नियामक की ताकत कमजोर होने का खतरा

सेबी के व्यय की सीमा तय करना और उसकी सालाना प्राप्तियों को संचित निधि को हस्तांतरित करने का प्रस्ताव एक बुरा विचार है। विस्तार से बता रहे हैं अजय त्यागी

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अजय त्यागी   
Last Updated- January 02, 2026 | 9:23 PM IST

संसद के हाल ही में समाप्त हुए शीतकालीन सत्र में सरकार ने प्रतिभूति बाजारों से संबंधित कानूनों को समेकित और संशोधित करने के लिए प्रतिभूति बाजार संहिता, 2025, विधेयक पेश किया। यह लेख विधेयक के खंड 124 पर केंद्रित है, जो भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के वार्षिक अधिशेष सामान्य कोष को भारत की संचित निधि (सीएफआई) में हस्तांतरित करने से संबंधित है।

अब सवाल यह है कि मौजूदा प्रावधानों में प्रस्तावित परिवर्तन क्या है? इस कोष में कितना पैसा आता है और कितना जाता है? संक्षेप में कहें तो सेबी द्वारा बाजार से जुड़े अवसंरचना संस्थानों, विनियमित संस्थाओं और बाजार प्रतिभागियों पर लगाए गए शुल्क और प्रभार इस फंड में आने वाले धन का हिस्सा हैं। इस फंड का उपयोग नियामक के राजस्व और पूंजीगत व्यय को पूरा करने के लिए किया जाता है। नियामक का वार्षिक बजट उसके बोर्ड द्वारा अनुमोदित किया जाता है। एक वित्तीय रूप से स्वायत्त संस्था से इसी प्रकार कार्य करने की अपेक्षा की जाती है।

अब, प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, कानून नियामक की वार्षिक निधि आवश्यकता की अधिकतम सीमा निर्धारित करता है, और अ​धिशेष रकम समेकित निधि को प्राप्त होगी। खंड124 के प्रासंगिक अंश इस प्रकार हैं:

‘… (3) बोर्ड एक आरक्षित निधि तैयार करेगा और किसी भी वित्त वर्ष में सामान्य कोष के वार्षिक अधिशेष का 25 फीसदी ऐसी आरक्षित निधि में जमा किया जाएगा। यह पिछले दो वित्त वर्षों के वार्षिक व्यय के योग से अधिक नहीं होगा।

(5) उप धारा (3) के अधीन वार्षिक अधिशेष के अंश को जमा करने के बाद, उस वित्त वर्ष के लिए सामान्य निधि का शेष वार्षिक अधिशेष भारत की संचित निधि में जमा किया जाएगा…’

इस खंड से संबंधित विधेयक के उद्देश्यों और कारणों का विवरण इस प्रकार है: ‘विधेयक के खंड124 में यह प्रावधान है कि भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 की धारा 14 के अंतर्गत स्थापित सामान्य कोष को संहिता के प्रयोजनों के लिए निधि माना जाएगा।’ इसमें न तो नियामक द्वारा आरक्षित निधि के गठन और अधिशेष रा​शि को समेकित निधि को हस्तांतरित करने के उद्देश्य का वर्णन है और न ही इसके बारे में कोई चर्चा!

तो मौजूदा प्रावधानों में इस बदलाव के प्रस्ताव का तर्क क्या है? सार्वजनिक रूप से उपलब्ध टिप्पणियों से पता चलता है कि सरकार ने वर्षों से सेबी के कोष में अत्यधिक वृद्धि देखी और बजट की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इस अधिशेष को अपने पास हस्तांतरित करने के अपने अधिकार पर विचार किया, जिसके चलते यह बदलाव किया गया। कुछ लोग इसकी तुलना कुछ वर्ष पहले सरकार द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अधिशेष कोष को समेकित निधि में हस्तांतरित करने से करते हैं। यह तर्क कई मायनों में निराधार है।

सेबी अधिनियम, 1992 के तहत सेबी के सामान्य कोष की स्थापना का तर्क काफी सीधा था- यानी नियामक को अपने खर्च पूरे करने के लिए आय अर्जित करने में सक्षम बनाना ताकि वह सरकारी अनुदानों पर निर्भर न रहे। अब स्थिति उलट गई है- सरकार नियामक से वार्षिक राजस्व प्राप्त करने की कोशिश कर रही है!

विनियमित संस्थाओं पर लगाए गए शुल्क और प्रभार ही सेबी की आय का एकमात्र स्रोत हैं, इसलिए किसी भी समय इनकी मात्रा निर्धारित करते समय नियामक का अल्प से मध्यम अवधि का अनुमानित व्यय प्रमुख कारक हो सकता है। नियामक से अपेक्षा की जाती है कि वह नियमित रूप से शुल्क और प्रभारों को समायोजित करे ताकि निधि में आने वाली राशि अनुमानित व्यय को पूरा करने के लिए पर्याप्त हो। यह स्वीकार किया जाता है कि कई बार अनुमान लगाने में सावधानी बरतने के बावजूद प्राप्तियों और व्यय राशि में अंतर हो सकता है। हाल के वर्षों में सेबी की निधि में अधिशेष के बड़े पैमाने पर जमा होने का एक कारण भारत के पूंजी बाजारों में बढ़ती गतिविधि है, जिसमें प्रतिभागियों की संख्या में वृद्धि और नई संस्थाओं का प्रवेश शामिल है। इस स्थिति को सुधारने के लिए नियामक के लिए पहला कदम यह होना चाहिए था कि उचित विश्लेषण के बाद शुल्क और प्रभारों को उचित रूप से कम किया जाए और इसका लाभ विनियमित संस्थाओं को दिया जाए।

किसी भी स्थिति में बाजार नियामक द्वारा विनियमित संस्थाओं और बाजार प्रतिभागियों पर लगाए गए शुल्क और प्रभार वैध रूप से सरकार के लिए वार्षिक राजस्व का स्रोत नहीं बन सकते। ये कर या शुल्क नहीं हैं। न ही इस हस्तांतरण को सेबी द्वारा सरकार को दिया गया लाभांश माना जा सकता है। इस परिभाषा में एक बड़ी समस्या यह है कि एक बार सेबी से होने वाली आय सरकार के घाटे वाले बजट के लिए वार्षिक राजस्व का स्रोत बन जाए, तो इस तरह की प्राप्तियों को साल-दर-साल बढ़ाने का लगातार दबाव बना रहेगा। यह बेतुका है क्योंकि इसका अर्थ होगा- नियामक को विनियमित संस्थाओं से अधिक से अधिक आय अर्जित करने का दायित्व सौंपना ताकि सरकार का बजट चलाया जा सके। यह भी स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित वार्षिक हस्तांतरण कानूनी रूप से मान्य है या नहीं।

इसके अलावा, कोई कानून किसी सांविधिक नियामक की व्यय आवश्यकताओं पर मनमाने ढंग से सीमा कैसे तय कर सकता है? फिर नियामक के सरकार से स्वतंत्र रूप से काम करने के बुनियादी और सर्वमान्य अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत का पालन करने का भी प्रश्न उठता है। ध्यान दें कि बाजार नियामक सरकारी स्वामित्व वाली सूचीबद्ध कंपनियों को भी नियंत्रित करता है। हितों के किसी भी संभावित टकराव, या यहां तक कि इसकी आशंका से भी बचना जरूरी है। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा अपने वित्तीय क्षेत्र आकलन कार्यक्रम रिपोर्ट में इस पर कड़ी टिप्पणी किए जाने के आसार हैं।

आरबीआई के अधिशेष फंड को समेकित निधि में हस्तांतरित करने से इसकी तुलना करना पूरी तरह से गलत है। सरकार केंद्रीय बैंक को मुद्रा छापने और जारी करके आय अर्जित करने की अनुमति देती है। आरबीआई विभिन्न वाणिज्यिक गतिविधियों और कार्यों से भी आय अर्जित करता है। आरबीआई द्वारा सरकार को फंड का हस्तांतरण लाभांश भुगतान की श्रेणी में आता है।

तर्क को छोड़ दें तो, इसमें शामिल राशियों की तुलना कैसे की जा सकती है? जहां आरबीआई ने वित्त वर्ष 2025 के लिए सरकार को लगभग 2.69 लाख करोड़ रुपये हस्तांतरित किए, वहीं सेबी के सामान्य कोष की वित्त वर्ष 2024 के लिए समापन शेष और अधिशेष रा​शि क्रमशः केवल 5,500 करोड़ रुपये और 1,000 करोड़ रुपये थी। अधिशेष निधि का हस्तांतरण सरकार की बजट राजस्व आवश्यकताओं के लिए ऊंट के मुंह में जीरा जैसा होगा।

तो बाजार नियामक के पास जमा अतिरिक्त कोष से निपटने का उपाय क्या है? जैसा कि पहले बताया गया है, पहला कदम शुल्क और प्रभार कम करना होना चाहिए। यदि किसी भी समय अतिरिक्त निधि बहुत अधिक हो जाती है, और निकट भविष्य में इसके निष्क्रिय और अप्रयुक्त रहने की संभावना है, तो बोर्ड सरकार को एकमुश्त राशि हस्तांतरित करने का निर्णय ले सकता है। बेशक, इसे एक बार की कार्रवाई मानी जानी चाहिए, और इसे नियम या मिसाल के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए।

सेबी के बोर्ड में वरिष्ठ और जिम्मेदार व्यक्ति हैं जिनमें वित्त और कॉरपोरेट मामलों जैसे दो मंत्रालयों के सचिव, आरबीआई के एक डिप्टी गवर्नर और प्रतिष्ठित स्वतंत्र निदेशक शामिल हैं। बोर्ड को इस मुद्दे को संभालने दें। नियामक की राजस्व आवश्यकताओं पर सांविधिक सीमा तय करना और उसकी सालाना प्राप्तियों को संचित निधि को हस्तांतरित करने का प्रस्ताव एक बुरा विचार है जिसे छोड़ दिया जाना चाहिए।


(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रतिष्ठित फेलो, सेबी के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व आईएएस अधिकारी हैं)

First Published : January 2, 2026 | 9:15 PM IST