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क्या चावल निर्यात कर भारत बेच रहा है अपना पानी? BS ‘मंथन’ में एक्सपर्ट्स ने उठाए गंभीर सवाल

भारत ने कृषि विकास में चीन को पछाड़ा है, लेकिन विशेषज्ञों ने सब्सिडी पर निर्भरता कम करने और जल-पोषण सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी है

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बीएस संवाददाता   
Last Updated- February 25, 2026 | 11:23 PM IST

भारत पहले से ही चावल के निर्यात जैसे क्षेत्र में वैश्विक कृषि व्यापार में एक बड़ा खिलाड़ी है। लेकिन विशेषज्ञों ने आग्रह किया कि सब्सिडी और खरीद की मानसिकता से उत्पादकता और पोषण रणनीति की ओर ले जाने की जरूरत है जो अभी भी किसानों को उतार-चढ़ाव से बचाती है।

बिज़नेस स्टैंडर्ड के कार्यक्रम मंथन 2026 के दौरान एक सत्र में नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद, इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनैशनल इकनॉमिक रिलेशन्स (इक्रियर) के प्रोफेसर अशोक गुलाटी, और सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस (सीएसईपी) में सीनियर फेलो लवीश भंडारी ने बिज़नेस स्टैंडर्ड के संजीव मुखर्जी के साथ विभिन्न मसलों पर बात की।

रमेश चंद ने तर्क दिया कि भारत चावल निर्यात में पहले से ही  वैश्विक ताकत जैसा है। लेकिन उन्होंने कहा कि महत्त्वाकांक्षा को वांछनीयता और परिणामों की कसौटी से देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि चावल में विश्व शक्ति बनने के साथ-साथ भारत वर्चुअल पानी का सबसे बड़ा निर्यातक भी बन गया है। चंद ने कहा कि जब भारत एक किलो चावल भेजता है, तो वह प्रभावी रूप से लगभग 3,000 लीटर वर्चुअल पानी भेजता है। इसे चावल उत्पादक इलाकों में गिरते जल स्तर से समझा जा सकता है।

उन्होंने कहा, ‘तो क्या हमें अपने ही लोगों को पानी के मामले में असुरक्षित बनाकर विश्व शक्ति का यह खिताब हासिल करना चाहिए? बुनियादी आवश्यकता के मामले में असुरक्षित?”

चंद ने कृषि को लेकर नकारात्मक मानसिकता की भी आलोचना की और कहा कि यह इस सेक्टर के लिए बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि 2025 तक पिछले 10 साल में भारत का कृषि क्षेत्र औसतन 4.6 प्रतिशत की दर से बढ़ा है, जो ऐतिहासिक रूप से उच्च दर है। प्रमुख कृषि अर्थव्यवस्थाओं में अब भारत तेजी से बढ़ता देश बन गया है  और उसने इस मामले में चीन  को पीछे छोड़ दिया है।

उन्होंने कहा कि जिन फसलों पर सब्सिडी दी जा रही है, उनमें मक्का को छोड़ दें तो बाकी की वृद्धि दर सबसे कम-करीब 1.5 प्रतिशत है। उन्होंने कहा, ‘मुझे लगता है कि यह नीति के हिसाब से यह गंभीर चुनौती है कि आप जिस क्षेत्र में अधिक पैसा लगा रहे हैं, उस क्षेत्र में न्यूनतम वृद्धि है।’

अशोक गुलाटी ने कहा कि भारत की निर्यात की क्षमता वास्तविक है। गुलाटी ने अमेरिका और यूरोपीय संघ का हवाला देते हुए कहा कि बड़े व्यापार समझौते अवसर लाते हैं, लेकिन यह उन्हीं उत्पादों के लिए फायदेमंद है जो सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी (एसपीएस) की बाधाएं पार कर सकते हैं।

गुलाटी ने कहा कि विश्व की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अमेरिका और चीन कृषि के शुद्ध आयातक हैं, जबकि भारत शुद्ध निर्यातक बना हुआ है। लेकिन इस अधिशेष से पूरी दुनिया को खिलाने की बहस मुकम्मल नहीं होती, क्योंकि भारत में पोषण संबंधी समस्याएं बनी हुई है। गुलाटी ने कहा कि भारत को अभी पोषण सुरक्षा में 10-20 साल लगेंगे और 5 साल से कम उम्र के करीब 35 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।

लवीश भंडारी ने कहा कि व्यापार समझौते प्रतिक्रिया वाली व्यवस्था हैं, न कि प्रमुख गेम। समस्या यह है कि भारत कृषि को खोलने से बहुत डरा हुआ है और प्रतिस्पर्धा को परखा नहीं गया है। उन्होंने कहा, ‘हमारे कृषि का बड़ा हिस्सा वाकई प्रतिस्पर्धी नहीं है, या कम से कम हमें विश्वास है कि यह प्रतिस्पर्धी नहीं है।  यह हो सकता है। हमें नहीं पता। हमने इसे आजमाया तक नहीं है।’

उन्होंने कहा कि राज्य अक्सर हस्तक्षेप करता है, कृत्रिम बाजार विफलता पैदा करता है और उसके बाद और अधिक हस्तक्षेप करके इसमें सुधार करता है। इसके लिए सब्सिडी का ढांचा तैयार होता है और इसे बंद करना राजनीतिक मजबूरी बन जाती है।

First Published : February 25, 2026 | 11:23 PM IST