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स्मॉलकैप शेयरों के लिए बेहतर परिस्थितियां, शेयर बाजार को मिली उम्मीद की किरण

बड़ी कंपनियां अपने कारोबार को लेकर जूझ रही हैं मानो देश में मंदी का दौर हो, लेकिन उनके शेयर की कीमतें मजबूत बनी हुई हैं। दूसरी ओर, कई छोटी कंपनियां शानदार प्रदर्शन कर रही हैं

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देवाशिष बसु   
Last Updated- February 25, 2026 | 10:19 PM IST

भारतीय शेयर बाजार इस समय एक दिलचस्प विरोधाभास पेश कर रहे हैं। बड़ी कंपनियां अपने कारोबार को लेकर जूझ रही हैं मानो देश में मंदी का दौर हो, लेकिन उनके शेयर की कीमतें मजबूत बनी हुई हैं। दूसरी ओर, कई छोटी कंपनियां शानदार प्रदर्शन कर रही हैं, जैसे अर्थव्यवस्था 10 फीसदी या उससे अधिक की वृद्धि दर वाली रफ्तार से बढ़ रही हो, लेकिन उनके शेयर भाव पस्त पड़े हैं। सवाल यह है कि यह विरोधाभास आखिर कैसे सुलझेगा? मेरे विचार से अब अच्छी गुणवत्ता वाली स्मॉलकैप कंपनियों के शेयर बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं जबकि बड़ी कंपनियों के शेयरों में ठहराव बना रह सकता है।

सितंबर 2024 में शिखर पर पहुंचने के बाद से भारतीय शेयर बाजार ने अधिकांश वैश्विक बाजारों की तुलना में कमजोर प्रदर्शन किया है। इससे पहले 18 महीनों तक तेजी का दौर चला था। इस दौरान बाजार की तेजी को जून 2024 के आम चुनावों में सत्तारूढ़ दल का उम्मीद से कमजोर प्रदर्शन भी नहीं रोक पाया। नतीजों के दिन, शुरुआती झटके के बाद बाजार फिर संभल गया और ऊपर बढ़ता रहा। हालांकि, 2024 के अंत में परिस्थितियां बदलने लगीं।

कई प्रतिकूल कारक सामने आए और इसके बाद लगभग 18 महीनों तक बाजार अपेक्षाकृत कमजोर रहा। अगर हम निफ्टी या सीएनएक्स 500 की बड़ी कंपनियों को देखें तो यह कमजोरी उतनी स्पष्ट नहीं दिखती। सितंबर 2024 की शुरुआत से जनवरी 2026 के अंत तक निफ्टी में लगभग 2 फीसदी की गिरावट रही जबकि सीएनएक्स 500 करीब 5 फीसदी नीचे रहा। लेकिन इसी अवधि में निफ्टी माइक्रोकैप सूचकांक में लगभग 17 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। यदि औसत रिटर्न के बजाय मध्यमान रिटर्न पर नजर डालें तो तस्वीर और भी चिंताजनक दिखाई देती है।

स्मॉलकैप शेयरों में आई गिरावट कुछ हद तक तार्किक थी। इनमें से कई कंपनियों के शेयर अधिक महंगे हो गए थे। तेजी से बढ़ते फंड के प्रवाह और ऊंची वृद्धि दर की उम्मीदों ने उनके मूल्यांकन को काफी ऊपर पहुंचा दिया था। ऐसे में जब वर्ष 2025 में अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां उभरने लगीं तो महंगी और ऊंची वृद्धि वाले शेयरों में बिकवाली शुरू हो गई।

ये चुनौतियां मुख्य रूप से तीन कारणों से सामने आईं। पहला, सरकार के पूंजीगत व्यय में कमी आई जिसकी वर्ष 2023-24 के तेजी वाले बाजार को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका थी। शुरुआत में इस कमी के लिए 2024 के आम चुनावों को जिम्मेदार ठहराया गया लेकिन सरकारी खर्च में सुस्ती अगले वर्ष तक जारी रही। दूसरा, 2025 में अमेरिका ने भारत पर दंडात्मक आयात शुल्क (टैरिफ) लगा दिए। तीसरा, घरेलू खपत में भी मंदी देखने को मिली। अधिक करों और वेतन वृद्धि की धीमी रफ्तार के कारण लोगों की क्रय शक्ति प्रभावित हुई।

नकारात्मक खबरों के दबाव के बीच विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने भारी बिक्री की। पूर वर्ष 2025 और जनवरी 2026 को मिलाकर शुद्ध पूंजी निकासी लगभग 23 अरब डॉलर के करीब रही। ऐसी बिकवाली के दौरान समस्या यह होती है कि निवेशक अक्सर अंतर नहीं कर पाते और अच्छे शेयर भी बुरे शेयरों के साथ गिरावट का सामना करते हैं। इस अवधि के दौरान एफआईआई की ओर से निरंतर बिक्री के कारण भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने रुपये को कमजोर होने दिया और ऐसा संभवतः निर्यातकों को सहारा देने के लिए किया गया।

चूंकि भारतीय शेयर बाजार का रुपये के मूल्य के साथ अधिक सह-संबंध है ऐसे में यह स्थिति और खराब हो गई। पिछला वर्ष भारतीय बाजारों के लिए पिछले तीन दशकों में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला साल साबित हुआ। भारतीय शेयर बाजार ने अन्य उभरते बाजारों की तुलना में लगभग 40 फीसदी कम रिटर्न दिया। ऐसे समय में ‘खरीदारों की हड़ताल’ जैसी स्थिति देखी जाती है जिससे बाजार की स्थिति नाजुक हो जाती है। इसका मतलब यह है कि कोई स्पष्ट कारण न होने पर भी बाजार अचानक गिर सकता है। ऐसा ही हाल पिछले गुरुवार को देखा गया, जब सेंसेक्स 1,400 अंकों की बड़ी गिरावट के साथ बंद हुआ।

क्या इस पूरी स्थिति में कोई सकारात्मक पहलू भी नजर आता है? इसका जवाब हां में है। दिसंबर तिमाही के आंकड़े अचानक उत्साहजनक दिख रहे हैं। जैसा कि पिछले समय से देखा गया है कि बड़े शेयर टिकाऊ बने हुए हैं और छोटे शेयर कमजोर दिख रहे हैं। इसी विरोधाभासी स्थिति के बीच अब हमें एक और दिलचस्प तस्वीर देखने को मिली है। निफ्टी 50 कंपनियों के लिए तिमाही प्रदर्शन कमजोर रहा जबकि निफ्टी स्मॉलकैप और माइक्रोकैप कंपनियों के लिए परिणाम शानदार रहे।

निफ्टी 50 कंपनियों की बिक्री में 10 फीसदी की वृद्धि हुई जिनमें मेगाकैप फर्में शामिल हैं, लेकिन उनकी परिचालन लाभ वृद्धि शून्य फीसदी रही और शुद्ध लाभ में केवल 1 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। सीएनएक्स 500 कंपनियों ने 11 फीसदी बिक्री वृद्धि दर्ज की, साथ ही उनके परिचालन लाभ और शुद्ध लाभ में भी 8 फीसदी की वृद्धि हुई। यह प्रदर्शन बीएसई 250 के लार्जकैप और मिडकैप शेयरों के समान है जिनकी बिक्री में 11 फीसदी और मुनाफे में 7 फीसदी की वृद्धि हुई।

परंपरागत धारणा के मुताबिक आर्थिक दबाव में छोटी कंपनियों का प्रदर्शन खराब होता है क्योंकि बड़ी कंपनियों के पास अधिक संसाधन होते हैं लेकिन इसके विपरीत इन छोटी कंपनियों ने अब तक शानदार प्रदर्शन किया है। निफ्टी माइक्रोकैप सूचकांक की कंपनियों की बिक्री में 12 फीसदी की वृद्धि हुई, इनके परिचालन लाभ में 13 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई और शुद्ध लाभ में 24 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला समूह निफ्टी स्मॉलकैप 250 रहा। इस समूह की बिक्री में 11 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, परिचालन लाभ 22 फीसदी बढ़ा और शुद्ध लाभ की वृद्धि दर 38 फीसदी रही जो वाकई चौंकाने वाला आंकड़ा है।

यह कहना मुश्किल है कि क्या इससे खासकर स्मॉलकैप शेयरों में नई तेजी दिखनी शुरू होगी लेकिन मौजूदा स्थिति सितंबर 2024 के विपरीत दिखती है। कई छोटी लेकिन तेजी से वृद्धि करने वाली कंपनियों के लिए अब मूल्यांकन बहुत ही संतुलित और आकर्षक हैं। जैसा कि ऊपर बताया गया है कि इन कंपनियों की बुनियादी स्थिति मजबूत हुई है। हमारी ट्रैकिंग में शामिल 1,000 कंपनियों में से लगभग 200 ने 30 फीसदी परिचालन लाभ वृद्धि हासिल की है जो जून 2023 तिमाही के बाद सबसे अधिक संख्या है। इसके अलावा कुछ आर्थिक संकेतक भी इस सकारात्मक पहलू को समर्थन देते हैं।

सरकारी पूंजीगत व्यय अब बजट के स्तर तक लौट आया है और कॉरपोरेट आंकड़ों के अनुसार निजी क्षेत्र में भी पूंजीगत खर्च में कुछ तेजी देखने को मिली है। वाणिज्यिक वाहन क्षेत्र का प्रदर्शन शानदार है, ई-वे बिल नई ऊंचाइयों तक पहुंच चुके हैं और बैंक ऋण की वृद्धि भी लगातार मजबूत बनी हुई है। गुणवत्ता वाली छोटी कंपनियों की मजबूत बुनियादी स्थिति और उनके शेयरों की गिरती कीमतें वास्तव में निवेश के लिए एक दिलचस्प मौका तैयार करती हुई दिखती हैं। ऐसे समय में बेहतर की उम्मीद की जा सकती है।


(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के सह-संस्थापक और मनीलाइफ फाउंडेशन के ट्रस्टी हैं)

First Published : February 25, 2026 | 10:16 PM IST