केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय परिसंपत्ति मुद्रीकरण पाइपलाइन (एनएमपी) का दूसरा संस्करण जारी कर दिया है। इसे सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग ने कई संबंधित मंत्रालयों के साथ मिलकर तैयार किया है। ये वे मंत्रालय हैं जिनके पास ऐसी परिसंपत्तियां हैं जिनका इस्तेमाल किया जा सकता है।
एनएमपी 2.0 के लिए दिए गए आंकड़े अनुमान से काफी अधिक हैं। सरकार का कहना है कि इसमें 16.72 लाख करोड़ रुपये का निवेश तैयार करने की क्षमता है। इसमें से करीब 6 लाख करोड़ रुपये की राशि निजी पूंजीगत व्यय से संबद्ध होगी। सरकार इसे अनावश्यक आशावाद के रूप में नहीं देखती। नीति आयोग का दावा है कि एनएमी के पहले संस्करण से 5.3 लाख करोड़ रुपये की पूंजी जुटाई गई जो तय लक्ष्य का करीब 90 फीसदी थी।
केंद्रीय वित्त मंत्रालय के दृष्टिकोण से देखें तो वह जिन व्यापक राजकोषीय बाधाओं का सामना कर रहा है और जिस प्रकार ऋण-जीडीपी अनुपात को कम करने की आवश्यकता है, परिसंपत्ति मुद्रीकरण को पुनर्जीवित करना यह सुनिश्चित करने के लिए एक व्यावहारिक कदम है कि मौजूदा वृद्धि की गति खो न जाए। पिछले दशक में सरकार की वृद्धि रणनीति मूलतः सार्वजनिक क्षेत्र के पूंजीगत व्यय पर निर्भर रही है। लेकिन यह तंत्र अपनी गतिशीलता और प्रेरणा खो रहा है। हाल के वर्षों में जैसा देखा गया उस तरह से आवंटन को लगातार बढ़ाना कठिन हो गया है।
वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में पूंजीगत व्यय को 11 फीसदी से अधिक बढ़ाया गया है, लेकिन सुस्ती के स्पष्ट संकेत हैं। सरकार यह भी मानती है कि इस वर्ष का सकल उधारी आंकड़ा बाज़ारों को कुछ हद तक चौंका चुका है। इस दृष्टिकोण से पूंजी जुटाने के लिए परिसंपत्ति मुद्रीकरण एक कम नुकसानदेह तरीका है। बाजार उधारी के विपरीत, यह उन लोगों को आकर्षित करेगा जो दीर्घकालिक वित्तपोषण में रुचि रखते हैं। उदाहरण के लिए, टोल राजस्व को अपेक्षाकृत पूर्वानुमेय राजस्व धारा माना जाता है और यह बीमा वित्त या सॉवरिन संपत्ति कोषों के निवेश को आकर्षित कर सकता है।
इसके साथ ही, वित्त मंत्री का यह कहना सही है कि इसे केवल राजस्व जुटाने या पूंजी के नए सिरे से उपयोग के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मुख्य उद्देश्य, पारंपरिक विनिवेश और निजीकरण की तरह, यह सुनिश्चित करना है कि सार्वजनिक क्षेत्र में फंसी हुई परिसंपत्तियां बाजार अनुशासन और दक्षता की आवश्यकताओं के अधीन हों और इस प्रकार अधिक उत्पादक बनें तथा आगे चलकर उत्पादन बढ़ाएं। यही कारण हो सकता है कि एनएमपी 2.0 ने अपनी गणनाओं में सार्वजनिक और निजी पूंजी को स्पष्ट रूप से मिलाया है। प्रश्न यह है कि क्या ऐसा मिश्रण वास्तव में साकार होगा।
सैद्धांतिक रूप से, निजी क्षेत्र का कोई भी नया संचालक पुनर्चक्रित परिसंपत्ति की राजस्व क्षमता को उन्नत करने के लिए धन लगा सकता है। उदाहरण के लिए, स्मार्ट ग्रिड या पूर्वानुमानित राजमार्ग रखरखाव उनके दृष्टिकोण से पिछले मानकों की तुलना में 15 या 20 फीसदी तक रिटर्न बढ़ा सकते हैं। ऐसे सहायक निवेश का व्यापक अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ेगा, जिससे समग्र दक्षता में वृद्धि होगी।
आखिर में यह मानना होगा कि परिसंपत्ति पुनर्चक्रण या मुद्रीकरण हमेशा दो कमियों से ग्रस्त रहेगा। पहली कमी यह है कि भारतीय राज्य पर, जिसमें नियामक और न्यायिक प्रणाली भी शामिल है, निवेशकों का पूरी तरह से भरोसा नहीं जम पाता। अतीत में कई अवसरों पर सार्वजनिक परिसंपत्तियों से जुड़े अनुबंधों को पलट दिया गया है। हाल की सफलताओं ने कुछ विश्वास वापस दिलाया है, लेकिन इस मोर्चे पर अभी भी काफी दूरी तय करनी बाकी है।
दूसरी कमी यह है कि निजी क्षेत्र के साथ टुकड़ों में सहयोग राजस्व बढ़ाने और राजनीतिक विरोध को कम करने में मदद कर सकता है, लेकिन इससे वह दक्षता वृद्धि नहीं मिलेगी जो पूर्ण निजीकरण से संबद्ध होती है। सरकार ने पिछले दशक में सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को पूरी तरह बेचने का विचार लगभग छोड़ दिया है, कुछ बड़े उदाहरणों जैसे एयर इंडिया को छोड़कर। इस विकल्प को फिर से विचार के लिए सामने रखा जाना चाहिए।