बिज़नेस स्टैंडर्ड के मंथन समिट में मशहूर फिल्मकार और अभिनेता शेखर कपूर अपनी बात रखते हुए
मशहूर फिल्मकार और अभिनेता शेखर कपूर मानते हैं कि फिल्मों में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल आगे और भी बढ़ेगा। उनका कहना है कि भविष्य में फिल्में निर्देशक की कहानी पर नहीं बनेंगी बल्कि ऐसा दौर आने वाला है, जब दर्शक और एआई मिलकर कहानी गढ़ेंगे।
‘मासूम’, ‘मिस्टर इंडिया’ और ‘बैंडिट क्वीन’ जैसी चर्चित फिल्में बनाने वाले कपूर ने नई दिल्ली के भारत मंडपम में बिज़नेस स्टैंडर्ड के ‘बीएस मंथन’ कार्यक्रम में आज कहा, ‘एआई ऐसी ताकत है, जो फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कई नए बदलाव लाएगी।’ उन्होंने ‘एआई के दौर में सिनेमा’ विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि एआई वास्तव में फिल्मकारों को सशक्त बनाएगी। इसके कारण फिल्म निर्माण की लागत और समय घटने जैसे पहलुओं पर जोर देते हुए कपूर ने कहा, ‘मुझे एक फिल्म बनाने में तीन साल लगते हैं। लेकिन एआई का इस्तेमाल कर कोई भी 10,000 रुपये खर्च कर केवल दो दिन में फिल्म बना सकता है।’
साइंस-फिक्शन वेब सीरीज ‘वॉरलॉर्ड’ के लेखक, निर्माता और निर्देशक शेखर कपूर ने इसका निर्माण पारंपरिक तरीकों के बजाय एआई तकनीक की मदद से किया है। सैकड़ों करोड़ रुपये के बजट वाली फिल्मों का जिक्र करते हुए कपूर ने कहा कि फिल्म बनाने की लागत के लिहाज से देखें तो फिल्मों में एआई का इस्तेमाल वास्तव में सबको फिल्म बनाने का मौका देता है। इससे उन फिल्मकारों के लिए बेहतर संभावनाएं खड़ी हो रही हैं, जिनके पास संसाधनों की कमी है। उनका कहना है कि यह तकनीक लोगों के लिए सुलभ होगी तो अधिक से अधिक लोगों को अपनी कहानियां सुनाने का मौका मिलेगा। इस लिहाज से यह रचनात्मक स्वतंत्रता का भी दौर है।
कार्यक्रम के विषय पर चर्चा करते हुए कपूर ने एआई में बुद्धिमता के पहलू पर कहा कि इस दौर में इसे काफी गलत समझा जा रहा है। उन्होंने कहा, ‘एआई किसी अप्रत्याशित स्थिति में काम नहीं कर सकती, इसलिए इसकी बुद्धिमत्ता पर सवाल हो सकते हैं क्योंकि किसी परिस्थिति में जो सहज बोध किसी के मन में हो सकता है, वह एआई में दिखना संभव नहीं लगता है। यह अराजकता की तरह भी लग सकती है, जिस पर किसी का अंकुश ही नहीं हो।’
भविष्य में फिल्मों की दुनिया में एआई का स्वरूप क्या होगा इस पर मशहूर फिल्म निर्देशक कपूर का कहना था, ‘एआई पिरामिड के निचले स्तर से ऊपर उठेगी और हो सकता है कि आगे चलकर फिल्म निर्देशक की भूमिका भी आज जैसी अहम नहीं रहे। ऐसे में एआई और दर्शकों के बीच संवाद के जरिये फिल्म अपनी दिशा तय करती हुई दिख सकती है और फिल्म की कहानी भी देखने वाले की पसंद की हिसाब से बदलती नजर आ सकती है।’
उन्होंने कहा कि अगले वर्ष तक इस तरह की बातचीत जल्द ही एआई से आगे बढ़कर बड़े बुनियादी बदलावों की दिशा में होने लगेगी और उस वक्त पूरा ध्यान व्यक्तिगत विचारों और रचनात्मकता को बचाए रखने पर होगा।