अक्सर देखा जाता है कि नौकरी करने वाले कई लोग 30 प्रतिशत टैक्स स्लैब में पहुंच जाते हैं, जबकि बड़े अमीर परिवारों पर असली टैक्स बोझ इससे कम होता है। वित्त विशेषज्ञ संजय कथूरिया कहते हैं कि यह फर्क टैक्स चोरी की वजह से नहीं है। असली वजह यह है कि अमीर लोग अपनी कमाई को अलग तरीके से प्लान करते हैं। उन्होंने एक्स पर लिखा, एक ही देश और एक ही टैक्स कानून है, फर्क सिर्फ जानकारी और समझ का है।
कथूरिया ने आयकर कानून की धारा 56(2)(x) के बारे में बताया। इस धारा के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति को अपने सगे रिश्तेदारों से कोई उपहार मिलता है तो उस पर टैक्स नहीं लगता। इस पर रकम की कोई सीमा भी तय नहीं है। यानी महंगी संपत्ति भी दी जाए तो वह टैक्स मुक्त हो सकती है। उन्होंने कहा कि अगर माता पिता अपने बच्चे को कीमती चीज या संपत्ति देते हैं तो उस पर टैक्स नहीं लगेगा। यह कोई चाल या गलती नहीं है, बल्कि कानून में साफ लिखा प्रावधान है।
कथूरिया ने कहा कि कुछ मशहूर लोग सीमित दायित्व भागीदारी फर्म यानी एलएलपी बनाकर अपनी कमाई को व्यवस्थित करते हैं। एलएलपी में कमाई को साझेदारों के बीच बांटा जा सकता है। पहले फर्म के स्तर पर मुनाफे पर टैक्स लगता है। इसके बाद कारोबार से जुड़े खर्च जैसे उपकरण खरीदना, कर्मचारियों की तनख्वाह देना, यात्रा खर्च या निवेश का पैसा मुनाफे से घटाया जा सकता है। इससे कुल टैक्स बोझ कम हो जाता है। इसके मुकाबले नौकरी करने वाला व्यक्ति अपने निजी खर्च, जैसे लैपटॉप या यात्रा, को सीधे अपनी तनख्वाह से घटाकर टैक्स कम नहीं कर सकता।
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उन्होंने हिंदू अविभाजित परिवार यानी एचयूएफ के बारे में भी बताया। एचयूएफ को कानून में एक अलग टैक्स पहचान मिलती है। इसका मतलब है कि यह अपने नाम से अलग आयकर रिटर्न भर सकता है। इसकी अपनी छूट सीमा होती है और धारा 80C के तहत अलग से कटौती का फायदा मिलता है। संपत्ति बेचने पर होने वाले लाभ की गणना भी अलग तरीके से की जाती है। इस तरह कारोबारी परिवार कानूनी रूप से अलग अलग टैक्स रिटर्न भर सकते हैं। इससे कुल मिलाकर परिवार पर पड़ने वाला टैक्स बोझ कम हो सकता है।
आयकर कानून की धारा 10(1) के अनुसार खेती से होने वाली आय पर टैक्स नहीं लगता, बशर्ते वह तय नियमों के अनुसार हो। कथूरिया ने कहा कि अगर कृषि आय कानून की शर्तों को पूरा करती है, तो उस पर केंद्रीय आयकर नहीं देना पड़ता।
कथूरिया के अनुसार कारोबार करने वाले लोग और फ्रीलांस पेशेवर अपने काम से जुड़े खर्च को अपनी कमाई में से घटा सकते हैं। जैसे स्टूडियो का किराया, सॉफ्टवेयर का खर्च, मशीन या उपकरण खरीदना और कर्मचारियों की तनख्वाह। इन खर्चों को घटाने के बाद जो मुनाफा बचता है, उसी पर टैक्स लगता है, इसलिए उनका टैक्स कम हो सकता है। लेकिन नौकरी करने वाले व्यक्ति को अपने ऐसे निजी खर्च पर सीधी टैक्स छूट नहीं मिलती।
कथूरिया ने कहा कि जो लोग पात्र हों, वे एचयूएफ बना सकते हैं। परिवार के बीच उपहार से जुड़े नियमों का सही और कानूनी तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। जो लोग फ्रीलांस या सलाह देने का काम करते हैं, वे एलएलपी बनाने पर विचार कर सकते हैं। साथ ही धारा 80C, 80D और मकान किराया भत्ता जैसी छूट का पूरा फायदा लेना चाहिए। बेहतर टैक्स योजना के लिए किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट से सलाह लेना भी समझदारी हो सकती है।
उन्होंने साफ कहा कि ये सभी तरीके कानून के अंदर हैं। असली फर्क इस बात से पड़ता है कि किसे नियमों की कितनी जानकारी है और कौन उनका सही उपयोग करना जानता है।