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BS ‘Manthan’ में बोले डिफेंस एक्सपर्ट्स: ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के लिए सैन्य शक्ति में बनना होगा आत्मनिर्भर

एक्सपर्ट्स ने कहा कि बदलती दुनिया में भारत को अपनी रणनीतिक आजादी मजबूत करनी है तो उसे सेना, रक्षा उद्योग और नई तकनीक पर ज्यादा जोर देना होगा

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अभिजित कुमार   
Last Updated- February 25, 2026 | 7:01 PM IST

बुधवार को नई दिल्ली में बिजनेस स्टैंडर्ड ‘मंथन’ सम्मेलन के दूसरे दिन सैन्य अधिकारियों, राजनयिकों और उद्योग जगत के लोगों ने कहा कि अगर भारत को अपनी रणनीतिक आजादी बनाए रखनी है, तो उसे अपनी सेना मजबूत करनी होगी, रक्षा उद्योग को बढ़ाना होगा और तकनीक में आत्मनिर्भर बनना होगा।

‘रणनीतिक स्वायत्तता’ विषय पर हुई इस चर्चा में यह भी कहा गया कि आजकल दुनिया में व्यापार और तकनीक का इस्तेमाल दबाव बनाने के हथियार की तरह हो रहा है। ऐसे माहौल में अपने फैसले खुद लेने की ताकत बहुत जरूरी है।

‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का मतलब क्या है?

मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के डायरेक्टर ‘जनरल’ एंबेसडर सुजन चिनॉय ने कहा कि रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब साफ है कि देश अपने फैसले खुद ले सके। उनका कहना था कि महात्मा गांधी मानते थे कि भारत को किसी भी साम्राज्यवादी हित के कारण किसी सैन्य गठबंधन में नहीं फंसना चाहिए और हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर अपना स्वतंत्र रुख रखना चाहिए।

उन्होंने कहा, “आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू ने भी कोशिश की कि भारत शीत युद्ध के दोनों गुटों से दूरी बनाए रखे। हालांकि, जरूरत पड़ने पर भारत ने मुद्दों के आधार पर फैसले लिए। जैसे 1971 में जब अमेरिका ने अपना युद्धपोत USS एंटरप्राइज बंगाल की खाड़ी में भेजा, तब भारत ने सोवियत संघ के साथ शांति, मित्रता और सहयोग की संधि की।”

चिनॉय ने यह भी कहा कि कई बार बाहरी दबावों से भारत की स्वायत्तता प्रभावित हुई। 1948 में कश्मीर मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में बड़े देशों ने चर्चा का रुख बदल दिया और मामला भारत-पाकिस्तान विवाद के रूप में पेश किया गया। उन्होंने जोर देकर कहा कि असली रणनीतिक स्वायत्तता तभी मानी जाएगी, जब देश युद्ध के समय भी अपने फैसले खुद लेने की क्षमता रखे।

सैन्य शक्ति के बिना ‘स्वायत्तता’ अधूरी

दिल्ली पॉलिसी ग्रुप के डिस्टिंग्विश्ड फेलो (Distinguished Fellow) लेफ्टिनेंट जनरल दीपेंद्र सिंह हुड्डा (रिटायर्ड) ने साफ कहा कि स्वायत्तता ताकत के बिना कायम नहीं रह सकती। उनके मुताबिक, रणनीतिक स्वायत्तता दरअसल ताकत पर ही टिकी होती है। बड़े देशों के दबाव का सामना करने के लिए मजबूत सेना बेहद जरूरी है।

उन्होंने जापान और जर्मनी का उदाहरण देते हुए कहा कि ये देश दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं, लेकिन उन्हें महाशक्ति नहीं माना जाता, क्योंकि उनकी अपनी स्वतंत्र सैन्य ताकत सीमित है और वे सुरक्षा के लिए गठबंधनों पर निर्भर रहते हैं।

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हुड्डा ने कहा कि भारत आज दुनिया की टॉप तीन-चार सैन्य शक्तियों में गिना जाता है। ऊंचाई वाले इलाकों में युद्ध का अनुभव, हिंद महासागर में मजबूत नौसैनिक क्षमता और परमाणु निरोधक ताकत भारत की बड़ी विशेषताएं हैं। परमाणु क्षमता की वजह से भारत को कोई भी परमाणु दबाव में नहीं ले सकता।

हालांकि, उन्होंने यह भी आगाह किया कि चीन के साथ सैन्य अंतर बढ़ने नहीं देना चाहिए। पिछले एक दशक से भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक बना हुआ है। ऐसे में मजबूत रक्षा औद्योगिक आधार तैयार करना बेहद जरूरी है।

रक्षा प्रौद्योगिकी में कहां हैं कमजोरियां?

चिनॉय ने कहा कि भारत ने स्वदेशी विमानवाहक पोत, लड़ाकू विमान और टैंक बनाने में अच्छी तरक्की की है, लेकिन प्रोपल्शन सिस्टम अब भी कमजोर कड़ी बना हुआ है। आने वाले समय में करीब 270 तेजस लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट सेवा में शामिल होंगे, मगर उनके इंजन की तकनीक में अभी काफी सुधार की जरूरत है।

कल्याणी स्ट्रैटेजिक सिस्टम्स लिमिटेड के चेयरमैन राजिंदर सिंह भाटिया ने बताया कि दुनिया भर में रक्षा पर करीब 2.5 ट्रिलियन डॉलर खर्च हो रहे हैं, जबकि भारत का रक्षा बजट लगभग 80 बिलियन डॉलर है। यानी वैश्विक खर्च में भारत की हिस्सेदारी करीब 3 प्रतिशत है। उनका कहना था कि 2047 तक भारत का रक्षा औद्योगिक ढांचा सात से आठ गुना तक बढ़ाना होगा।

भाटिया ने कुछ ढांचागत कमियों की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि रिसर्च एंड डेवलपमेंट की पुरानी श्रेणियां और लंबी खरीद प्रक्रिया बड़ी समस्या हैं। उनका कहना था, “अगर खरीद की प्रक्रिया विकास की अवधि से ज्यादा लंबी हो जाए, तो इसका मतलब है कि आप पुरानी तकनीक ही खरीद रहे हैं।”

क्या सेनाएं भविष्य के लिए तैयार हैं?

हुड्डा ने माना कि भारतीय सेनाएं लगातार आगे बढ़ रही हैं, लेकिन नई तकनीक अपनाने की रफ्तार और तेज हो सकती थी। उन्होंने कहा कि हाल में ऑपरेशन सिंदूर के बाद ड्रोन और मानव रहित प्रणालियों पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है।

उनका कहना था कि सिर्फ नई तकनीक खरीद लेना काफी नहीं है। उसके साथ सही संगठनात्मक ढांचा, मजबूत साइबर रणनीति और बेहतर डेटा सिस्टम भी जरूरी हैं, ताकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों का पूरा लाभ उठाया जा सके।

भाटिया ने कहा कि भारत के पास अब तकनीकी रोडमैप मौजूद है, लेकिन उद्योग, स्टार्टअप, विश्वविद्यालयों और सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है। उनके मुताबिक, अलग-अलग हिस्सों में काम करने के बजाय सभी को एक टीम की तरह मिलकर काम करना होगा, तभी असली नवाचार संभव होगा।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत को आयात पर निर्भरता कम करनी होगी, रक्षा निर्यात बढ़ाना होगा और नई उभरती तकनीकों पर तेजी से काम करना होगा। तभी देश लंबे समय तक अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रख सकेगा।

First Published : February 25, 2026 | 6:39 PM IST