प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
करीब 35 साल पहले भारत में टेलीफोन कनेक्शन मिलना जश्न मनाने जैसा मौका होता था। लैंडलाइन कनेक्शन मंजूर होने, तार बिछाने और फोन के चालू होने में आम तौर पर महीनों या कभी-कभी वर्षों इंतजार करना पड़ता था।
गोल डायल वाला वह उपकरण जो एक अविश्वसनीय बैक-एंड ऑपरेटिंग सिस्टम से जुड़ा होता था, किसी व्यवसाय के लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। अगर घर पर टेलीफोन लग जाता तो वह पूरे इलाके के लिए संपर्क का एकमात्र माध्यम होता था। टेली-घनत्व यानी प्रति 100 लोगों पर टेलीफोन की संख्या बहुत थी और हर जेब में मोबाइल हैंडसेट होने की बात तो उस दौर में सोची भी नहीं जा सकती थी।
कैपजेमिनाई में टेलीकॉम-इंडिया के उपाध्यक्ष और इंडस्ट्री प्लेटफॉर्म लीडर संदीप अरोड़ा ने कहा, ‘उदारीकरण से पहले दूरसंचार दुर्लभ और सरकारी सेवा थी। इसकी पहुंच कम थी और कीमतें ज्यादा थीं।’
1991 में जब तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह संसद में एक ऐसा बजट पेश करने के लिए खड़े हुए जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था में चार दशक से चले आ रहे लाइसेंस-नियंत्रण को खत्म कर दिया, तब दूरसंचार कोई मुख्य मुद्दा नहीं था लेकिन यह क्षेत्र शायद उन सुधारों का सबसे प्रमुख उदाहरण है।
बदलाव उदारीकरण के बाद राष्ट्रीय दूरसंचार नीति 1994 और बाद में 1999 की नई दूरसंचार नीति के साथ शुरू हुआ, जिसने इस क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी, तय लाइसेंस शुल्क से राजस्व-साझेदारी मॉडल में बदलाव किया और भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) जैसे स्वतंत्र नियामक की स्थापना की। 1994 की नई दूरसंचार नीति का उद्देश्य शहरी और ग्रामीण भारत में लोगों को तेजी से लैंडलाइन कनेक्शन उपलब्ध कराना था वहीं 1999 की नीति ने राजस्व साझेदारी मॉडल प्रस्तुत किया, जिसकी वजह से उस समय 16 से 17 रुपये प्रति मिनट वसूली जा रही कॉल दर में तेजी से कमी आई।
सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक एस पी कोचर कहते हैं, ‘आज दूरसंचार नेटवर्क डिजिटल देश की उम्मीदों को आगे बढ़ा रहे हैं। जो सेवा कभी प्रतीक्षा-सूची वाली होती थी वह अब हर समय चालू रहने वाली डिजिटल जीवनरेखा बन गई है।’ कोचर 1990 के दशक की शुरुआत से भारत के दूरसंचार क्षेत्र में हो रहे बदलावों के साक्षी रहे हैं।
वह कहते हैं, ‘सुधारों ने भारत के बुनियादी ढांचे, प्रतिस्पर्धा, तकनीक और निजी भागीदारी को देखने का नजरिया बदल दिया।’ उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि 1991 के आर्थिक उदारीकरण ने इस क्षेत्र को बदलने के साथ-साथ पूरी अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर डाला। कभी सीमित और चुनिंदा लोगों तक पहुंच रखने वाली दूरसंचार सेवा आज आधुनिक भारत के लगभग हर क्षेत्र की बुनियादी जरूरत बन चुकी है। यह क्षेत्र अरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था में बदल गया है और देश की अर्थव्यवस्था में करीब 12 से 14 फीसदी का योगदान देता है।
केपीएमजी इंडिया में पार्टनर और नैशनल लीडर (क्लाइंट्स ऐंड मार्केट्स) अखिलेश टुटेजा कहते हैं, ‘भारत का दूरसंचार क्षेत्र 1991 के सुधारों की सबसे प्रमुख सफलता की कहानियों में से एक है।’
उनके मुताबिक दूरसंचार क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोलने से प्रतिस्पर्धा बढ़ी, जरूरी पूंजी आई और नवाचार तथा ग्राहक-केंद्रित सेवा को बढ़ावा मिला। कोचर के मुताबिक निजी कंपनियों के प्रवेश, लाइसेंसिंग व्यवस्था में बदलाव और नई नीतियों ने धीरे-धीरे इस क्षेत्र को सीमित से व्यापक बनाने में योगदान दिया। प्रतिस्पर्धा से निवेश आया, तकनीक ने दक्षता बढ़ाई और नीतिगत सुधारों ने दूरसंचार को सीमित वर्ग की सेवा से बदलकर जनसेवा बना दिया।
31 जुलाई, 1995 को पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने कोलकाता से भारत में पहली बार मोबाइल फोन कॉल की। उन्होंने दिल्ली में तत्कालीन केंद्रीय संचार मंत्री सुखराम को फोन किया। यह कॉल बी के मोदी और ऑस्ट्रेलिया की टेल्स्ट्रा द्वारा संयुक्त रूप से बनाए गए नेटवर्क पर की गई थी और इसके लिए नोकिया हैंडसेट का इस्तेमाल हुआ था।
इसके बाद अगले एक दशक में वायरलेस सेवाओं का तेजी से विस्तार हुआ। शुरुआती दौर में सालाना ग्राहक वृद्धि 30 फीसदी से अधिक रही और इसमें पूरा योगदान मोबाइल सेवाओं का था। ग्राहकों के लिए इससे दूरसंचार तक पहुंच में जबरदस्त सुधार हुआ और सेवाओं को तेजी से अपनाया गया। निवेशकों के लिए यह बड़े पैमाने पर निवेश और रिटर्न का अवसर बना। व्यापक डिजिटल तंत्र के लिए दूरसंचार डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन गया।
टुटेजा ने कहा, ‘सुधार या तकनीक, अकेले कोई भी इस वृद्धि को संभव नहीं बना सकता था। दोनों ने मिलकर दूरसंचार ढांचे को उपयोगी सेवा से बदलकर भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना दिया।’
वायरलेस तकनीक, डेटा नेटवर्क और स्मार्टफोन में लगातार हो रहे तकनीकी नवाचार ने इस बदलाव को और तेज किया। कैपजेमिनाई के अरोड़ा के मुताबिक यह बदलाव अब लगभग पूरा हो चुका है।
ट्राई के जून 2026 के आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल दूरसंचार ग्राहकों की संख्या 1.34 अरब पार कर चुकी है। इनमें करीब 1.3 अरब वायरलेस कनेक्शन हैं जबकि फिक्स्ड लाइन कनेक्शनों की संख्या 4.78 करोड़ से कम रह गई है। देश का कुल दूरसंचार घनत्व बढ़कर 94.3 फीसदी हो गया है। अरोड़ा के मुताबिक उदारीकरण ने उद्योग की संरचना को भी पूरी तरह बदल दिया।
बाजार खोले जाने के बाद भारती एयरटेल, हचिसन, आइडिया सेल्युलर, बीपीएल मोबाइल और स्पाइस कम्युनिकेशंस जैसी निजी कंपनियों के प्रवेश ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (एमटीएनएल) और भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) के दबदबे को खत्म कर दिया। बाजार अधिक पूंजी-गहन होने के साथ-साथ प्रतिस्पर्धी भी बन गया।
इन सुधारों के साथ कई मूल्यवर्धित सेवाओं की शुरुआत भी हुई, जिनमें सेल्युलर मोबाइल, पेजर, ईमेल और इंटरनेट शामिल थे। शुरुआती दौर में भारती एयरटेल ने बड़े पैमाने पर विस्तार और परिचालन दक्षता का मॉडल तैयार किया जबकि वैश्विक कंपनियां बेहतर क्रियान्वयन और प्रबंधन के तौर-तरीके लेकर आईं। हालांकि क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव 2016 में आया, जब रिलायंस जियो ने पूरे क्षेत्र को नए सिरे से परिभाषित कर दिया। अरोड़ा के मुताबिक जियो ने कीमतों में बड़ा बदलाव किया, 4जी को तेजी से अपनया गया और डेटा खपत को ऐसे स्तर तक पहुंचाया, जिसे दुनिया के बहुत कम बाजारों ने देखा था।
सितंबर 2016 में रिलायंस जियो ने देश भर में 4जी नेटवर्क लॉन्च किया और कई महीनों तक मुफ्त डेटा और वॉयस कॉल की पेशकश की। उस समय बाजार में एक जीबी मोबाइल डेटा की कीमत करीब 225 रुपये थी। अपने ग्राहकों को जियो की ओर जाते देखने के खतरे के बीच प्रतिद्वंद्वी कंपनियों ने भी कीमतों में कटौती शुरू कर दी। करीब एक साल के भीतर औसत डेटा कीमतें लगभग आधी हो गईं। इसके बाद कुछ ही वर्षों में अंतरराष्ट्रीय तुलना के लिहाज से भारत में मोबाइल डेटा शुल्क दुनिया में सबसे सस्ते हो गए।
आज स्थिति यह है कि 1991 से पहले के लैंडलाइन-प्रधान बाजार का भारत में लगभग पूरी तरह उलटफेर हो चुका है। इंटरनेट ग्राहकों की संख्या करीब 1 अरब को पार कर चुकी है और औसत भारतीय मोबाइल ग्राहक हर महीने 21 जीबी से अधिक डेटा का इस्तेमाल कर रहा है।
हालांकि क्षेत्र में बदलाव के साथ इसकी बाजार संरचना भी बदल गई है। निजी क्षेत्र में रिलायंस जियो और एयरटेल के बीच लगभग द्विध्रुवीय स्थिति बन गई है। हालांकि सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी और सरकारी मदद वाली एक अन्य कंपनी वोडाफोन आइडिया भी बाजार में है।
क्षेत्र के कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति बाजार में बड़ी हिस्सेदारी रखने वाली कंपनियों के लिए फायदेमंद हो सकती है लेकिन उपभोक्ताओं के लिए विकल्प सीमित हो गए हैं। यह स्थिति 2012 से पहले के दौर से अलग है, जब एतिसलात, टेलीनॉर, एमटीएस जैसी कई वैश्विक कंपनियां भारतीय बाजार में मौजूद थीं।
दूरसंचार क्षेत्र की सलाहकार फर्म कॉम फर्स्ट इंडिया के निदेशक महेश उप्पल कहते हैं, ‘दो कंपनियों के पास बाजार का 70 फीसदी से अधिक हिस्सा है। इसलिए बाजार का अत्यधिक केंद्रीकरण चिंता का विषय है।’
उनके मुताबिक, ‘सबसे बेहतर विकल्प यह होता कि बीएसएनएल का वोडाफोन आइडिया के साथ विलय कर दिया जाता क्योंकि दोनों में सरकार सबसे बड़ी हिस्सेदार है और दोनों को इससे फायदा हो सकता था।’ उप्पल कहते हैं, ‘अन्य तरीकों से प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित किया जा सकता है, जैसे दूरसंचार सेवाओं के रीसेलर यानी वर्चुअल नेटवर्क ऑपरेटरों (वीएनओ) के जरिये, जो ज्यादातर विकसित बाजारों में उपलब्ध हैं।’
भारत में कई वर्षों से वर्चुअल नेटवर्क ऑपरेटरों के लिए लाइसेंसिंग व्यवस्था मौजूद है लेकिन यह बाजार अपेक्षित रूप से आगे नहीं बढ़ पाया है।
उप्पल कहते हैं, ‘इसके लिए अधिक उदार नियामकीय दृष्टिकोण की जरूरत है। राजस्व हिस्सेदारी की व्यवस्था भी एक बड़ी बाधा है। इसके अलावा कुछ अन्य शर्तें भी हैं जो उनके लिए मुश्किलें पैदा करती हैं।’ यूरोप का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि वहां दूरसंचार कंपनियों के लिए रीसेलरों को थोक दरों पर सेवाएं उपलब्ध कराना अनिवार्य है। भारत में ऐसी सुविधा नहीं होने के कारण वर्चुअल ऑपरेटरों के लिए आकर्षक मार्जिन हासिल करना मुश्किल है।
सुधारों का वास्तविक असर बाजार के बदलते स्वरूप में दिखाई दिया। नियमन और प्रतिस्पर्धा ने कंपनियों के एक पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को जन्म दिया। कोचर कहते हैं, ‘उदारीकरण ने उपकरण विनिर्माताओं, टावर कंपनियों, फाइबर प्रदाताओं, हैंडसेट निर्माताओं, ऐप डेवलपरों, डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म, स्टार्टअप, क्लाउड सेवाओं, साइबर सुरक्षा कंपनियों और लाखों डिजिटल उद्यमियों के लिए रास्ता खोला।’
उनके मुताबिक दूरसंचार ने अर्थव्यवस्था में अपनी श्रेणी ही बदल ली है। यह अब लगभग हर दूसरे क्षेत्र के लिए बुनियादी ढांचा बन चुका है। कोचर कहते हैं, ‘दूरसंचार अब सिर्फ संपर्क का माध्यम नहीं है। यह भारत के डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और डिजिटल अर्थव्यवस्था की नींव है।’
अरोड़ा के मुताबिक दूरसंचार अब डिजिटल पहचान से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और कंपनियों के डिजिटलीकरण की बुनियाद बन चुका है। यह उस दौर में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है जब भारत अपनी संप्रभु आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) क्षमताएं विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और देश डेटा, कंप्यूटिंग तथा एआई क्षमताओं को विश्वसनीय घरेलू पारिस्थितिकी दूरसंचार उभरता हुआ प्रमुख क्षेत्र बना और इसने कई दूसरे क्षेत्रों की वृद्धि को गति दी है।