SEBI के चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय | फाइल फोटो
बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) भारत में प्रतिभूति उधार लेन-देन (एसएलबीएम) की गतिविधियों को व्यापक बनाने का प्रयास कर रहा है। नियामक हाल ही में शुरू किए गए क्लोजिंग ऑक्शन सत्र (सीएएस) व्यवस्था को मजबूत करने के लिए नकद बाजार के बुनियादी ढांचे को सशक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
घटनाक्रम के जानकारों के अनुसार सेबी एसएलबीएम खंड में कई बदलावों पर चर्चा कर रहा है। इन बदलावों में पात्र शेयरों के दायरे को बढ़ाना, एसएलबी सेगमेंट और नकद बाजार के बीच शुद्ध निपटान की अनुमति देना और स्टॉक एक्सचेंजों के बीच पारस्परिक संचालन क्षमता (इंटरऑपरेबिलिटी) को सक्षम बनाना शामिल है।
सूत्रों ने बताया कि इन प्रस्तावों पर बाजार के भागीदारों और सेबी की समितियों के सदस्यों के साथ दो बैठकों में चर्चा की गई है। उन्होंने कहा कि अगले महीने इस पर और बातचीत हो सकती है।
यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब सेबी नकदी बाजार में अधिक लिक्विडिटी और भागीदारी बनाने तथा क्लोजिंग ऑक्शन सत्र (सीएएस) के कामकाज को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहा है। व्यापक एसएलबी बाजार निवेशकों को शॉर्ट-सेलिंग और आर्बिट्राज के लिए प्रतिभूतियों को अधिक कुशलता से उधार लेने की अनुमति देगा जिससे नकदी और डेरिवेटिव बाजारों के बीच संबंध मजबूत होगा और संभवतः शेयरों के बंद भाव में विचलन को कम किया जा सकेगा।
वैश्विक स्तर पर अच्छी तरह से विकसित प्रतिभूति उधार लेन-देन बाजार परिपक्व इक्विटी बाजारों का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है जो शॉर्ट-सेलिंग, आर्बिट्राज, मार्केट-मेकिंग और कुशल मूल्य खोज का समर्थन करता है। हालांकि भारत में स्थिति अलग है। यहां म्युचुअल फंड को शॉर्ट-सेलिंग की अनुमति नहीं है जो उधार ली गई प्रतिभूतियों की मांग के सबसे बड़े संभावित स्रोतों में से एक को सीमित करता है।
एक जानकार ने इसे विस्तार से बताया, ‘एसएलबीएम के भीतर शुद्ध निपटान या नेट सेटलमेंट उन उपायों में से एक है जिन्हें लागू किया जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि कोई सुबह उधार लेता है और दोपहर तक आवश्यकता पूरी हो जाती है तो उसे निपटाया जा सकता है। दूसरी है सीधे नकदी के साथ नेटिंग। उदाहरण के लिए यदि कोई नकदी बाजार में शॉर्ट करता है और एसएलबीएम में उधार लेता है तो यह क्लियरिंग कॉरपोरेशन स्तर पर नेट हो जाता है।’
एसएलबी के लिए एक्सचेंजों के बीच इंटरऑपरेबिलिटी की भी अनुमति दी जा सकती है। इस मामले की जानकारी रखने वाले एक और व्यक्ति ने कहा, ‘शुद्ध निपटान के लिए इंटरऑपरेबिलिटी बेहतर है। कोई भी व्यक्ति किसी भी एक्सचेंज पर ट्रेड कर सकता है और दूसरे एक्सचेंज पर सौदे का निपटान कर सकता है।
अभी ट्रेडिंग सदस्य और संरक्षक (कस्टोडियन) दोनों जगहों पर पैसे रखते हैं। इंटरऑपरेबिलिटी होने से जहां भी मौका मिलेगा, वे वहां ज्यादा ट्रेड कर पाएंगे।’
इस बारे में जानकारी के लिए सेबी को ईमेल भेजा गया मगर खबर लिखे जाने तक जवाब नहीं आया।
इस कदम से नकदी सेगमेंट को व्यापक बनाने, नकदी और डेरिवेटिव बाजार के बीच संबंध को मजबूत करने और बाजार की लिक्विडिटी में सुधार करने की उम्मीद है, खास तौर पर शॉर्ट सेलर्स के लिए। इसके अलावा, हाल ही में पेश किए गए क्लोजिंग ऑक्शन सत्र (सीएएस) तंत्र में अधिक भागीदारी और स्थिरता आने की उम्मीद है।
उद्योग के कुछ भागीदारों ने आग्रह किया कि एसएलबी को लोकप्रिय बनाने के लिए म्युचुअल फंड को उधार लेने की अनुमति दी जानी चाहिए। उद्योग के एक जानकार ने कहा, ‘जहां भी सीएएस लागू है वहां एसएलबी सेगमेंट बहुत मजबूत है। हमने एसएलबी में सुधार लाने से पहले सीएएस का परीक्षण करने की कोशिश की है। बाजार में लिक्विडिटी नहीं है और एसएलबी भी मजबूत नहीं है, इसीलिए बंद भाव में अचानक उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।’
उक्त शख्स ने कहा, ‘इस प्रक्रिया को आसान बनाना होगा। कर्ज देने में व्यावसायिक समझ और गुंजाइश होनी चाहिए। अभी इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है और कर से जुड़े मामलों की अलग-अलग व्याख्या की वजह से भी कुछ चिंता हैं।’
बाजार के एक अन्य भागीदार ने कहा, ‘किसी सूचकांक के पुनर्संतुलन या अनुबंध के निपटान के आसपास के दिनों में, आखिरी आधे घंटे में ट्रेडिंग वॉल्यूम बहुत बढ़ जाता है और एसएलबी का मौका भी ज्यादा होता है। यह मौका बहुत कम समय के लिए मिलता है और ज्यादातर उधारी पेशेवर ट्रेडर करते हैं जो इस पर आर्बिट्राज करते हैं। खुदरा निवेशक उधार देने वाले पक्ष में होते हैं लेकिन कुल उधारी में उनका हिस्सा बहुत कम होता है। पिछले एक साल में एसएलबी में वॉल्यूम काफी बढ़ा है।’
एक्सचेंज के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 के लिए एसएलबी सेगमेंट में एक्सचेंज पर कुल उधारी शुल्क बढ़कर 697 करोड़ रुपये हो गई, जो पिछले साल 425 करोड़ रुपये थी। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में यह 346 करोड़ रुपये रही।
ब्रोकर समुदाय के एक सदस्य ने कहा, ‘नियामक वायदा एवं विकल्प (एफऐंडओ) से वॉल्यूम को नकद खंड की ओर ले जाना चाहता है। एसएलबीएम में ज्यादा शेयर होने से वॉल्यूम को यहां लाने में मदद मिलेगी।’