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टीवी रेटिंग का संकट गहराया, सरकार की नई नीति के चलते विज्ञापन बाजार पर बढ़ी चिंता

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा बार्क की रेटिंग रोकने और नई नीति लागू करने से त्योहारी सीजन से ठीक पहले टीवी विज्ञापन बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है

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वनिता कोहली-खांडेकर   
Last Updated- August 17, 2026 | 10:47 PM IST

एक महीने से अधिक समय से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े टीवी बाजार में टीवी रेटिंग का काम पूरी तरह ठप है। 1 जुलाई को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल ( बीएआरसी या बार्क) को निर्देश दिया कि वह ‘टेलीविजन दर्शकों की माप और टीवी रेटिंग को रोक दे।’ यह आदेश तब तक लागू रहेगा जब तक नई टेलीविजन रेटिंग नीति के तहत बीएआरसी के पंजीकरण के नवीनीकरण के आवेदन पर फैसला नहीं हो जाता। यह नई नीति इसी साल मार्च में जारी की गई थी।

यह अच्छी खबर नहीं है। केबल या डायरेक्ट-टु-होम (डीटीएच) के जरिये मिलने वाले पारंपरिक टीवी पर विज्ञापन खर्च लगातार घट रहा है। वर्ष 2023 में यह खर्च करीब 31,200 करोड़ रुपये था जो वर्ष 2025 में घटकर लगभग 26,300 करोड़ रुपये रह गया। हालांकि, विज्ञापन से जुड़े सेकंड स्पॉट की खरीद बिक्री के लिए इस्तेमाल की जाने वाली रेटिंग की कमी का अब तक बहुत बड़ा असर दिखाई नहीं दिया है। टैम मीडिया रिसर्च के अनुसार, विज्ञापन खर्च फिलहाल लगभग स्थिर है। 

इसका एक कारण यह भी है कि जुलाई का विज्ञापन खर्च काफी पहले ही तय हो चुका था। इसलिए रेटिंग के आंकड़े उपलब्ध न होने के बावजूद जुलाई में विज्ञापन खर्च पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। लेकिन अगस्त से त्योहारों का मौसम शुरू हो रहा है। इसी दौरान टीवी पर विज्ञापन खर्च सबसे ज्यादा होता है। 

अगर रेटिंग के आंकड़ों का यह संकट लंबे समय तक जारी रहता है तो कई विज्ञापनदाता टीवी पर अपने खर्च को लेकर दोबारा सोच सकते हैं। इसका असर अलग-अलग प्रसारण कंपनियों पर अलग-अलग पड़ेगा। बड़ी कंपनियां इस स्थिति को संभाल लेंगी। विज्ञापनदाता जियोस्टार, ज़ी या सोनी जैसे बड़े नेटवर्क के पुराने दर्शक आंकड़ों और उनकी बाजार हिस्सेदारी के आधार पर विज्ञापन देने का फैसला कर सकते हैं। लेकिन छोटे और खास दर्शक वर्ग को लक्ष्य बनाने वाले ब्रांडों के लिए स्थिति मुश्किल हो सकती है। खासकर क्षेत्रीय भाषाओं या छोटे भौगोलिक क्षेत्रों में काम करने वाले ब्रांडों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है। 

नई टेलीविजन रेटिंग नीति का उद्देश्य मूल रूप से अच्छा है। इसका लक्ष्य यह है कि रेटिंग के क्षेत्र में दूसरी कंपनियों के लिए भी प्रवेश आसान हो।

नई नीति में कम से कम 80,000 मीटर लगाने की व्यवस्था की गई है। इन मीटरों की संख्या हर साल 10,000 बढ़ाई जानी है और आखिरकार यह संख्या 1,20,000 तक पहुंचनी है। इन मीटर के जरिये लगभग 5.5 लाख लोगों की टीवी देखने की आदतों का आकलन किया जा सकेगा। इसके मुकाबले बीएआरसी के पास फिलहाल 58,000 मीटर ही हैं, जो इससे काफी कम लोगों तक पहुंचते हैं।

नियम के मुताबिक, किसी भी रेटिंग एजेंसी के बोर्ड में कम से कम 33 फीसदी सदस्य स्वतंत्र होने चाहिए। इसके अलावा, वह सर्वेक्षण जिसके आधार पर टीवी दर्शकों का नमूना चुना जाता है, हर तीन साल में किया जाना चाहिए।

नीति का एक और महत्त्वपूर्ण उद्देश्य तकनीक से जुड़े बदलावों को ध्यान में रखना है। यानी रेटिंग व्यवस्था केवल पारंपरिक टीवी तक सीमित न रहे बल्कि डिजिटल माध्यमों पर बढ़ रहे दर्शकों को भी माप सके। इसे तकनीक-तटस्थ रेटिंग व्यवस्था कहा गया है। पंजीकरण के नवीनीकरण के बाद बीएआरसी को नई व्यवस्था के कुछ प्रावधानों के अनुरूप खुद को ढालने के लिए नौ महीने का समय मिलेगा।

यह तर्क दिया जा सकता है, जैसा कि इस स्तंभ में पहले भी कहा गया है कि किसी निजी उद्योग में इस्तेमाल होने वाली रेटिंग या कोई भी मापदंड वास्तव में खरीदार और विक्रेता के बीच का मामला होना चाहिए। फिर सरकार या नियामक को इसमें क्यों पड़ना चाहिए? लेकिन यह तर्क 15 साल से भी पहले ही खत्म हो गया था, जब टैम की टीवी रेटिंग व्यवस्था में पहली बार नियामकीय हस्तक्षेप शुरू हुआ। इसके बाद कई कानूनी लड़ाइयां हुईं, सलाहकार रिपोर्टें आईं और तरह-तरह के विवाद सामने आए। आखिरकार टैम की रेटिंग व्यवस्था को धीरे-धीरे बंद किया गया और 2015 में बीएआरसी का काफी मुश्किल परिस्थितियों में गठन हुआ। बीएआरसी एक 60:20:20 के अनुपात वाला संयुक्त उपक्रम है। इसमें इंडियन ब्रॉडकास्टिंग ऐंड डिजिटल फाउंडेशन (आईबीडीएफ), इंडियन सोसाइटी ऑफ ऐडवर्टाइजर्स और एडवर्टाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया की क्रमशः 60, 20 और 20 फीसदी हिस्सेदारी है।

बीएआरसी को भी वही समस्याएं झेलनी पड़ीं, जिनका सामना टैम ने किया था। बीएआरसी का नमूना मनोरंजन जैसे बड़े क्षेत्र के लिए पर्याप्त मजबूत है। टीवी पर देखे जाने वाले कुल कार्यक्रमों में मनोरंजन की हिस्सेदारी 50 फीसदी से अधिक है। लेकिन जब बात छोटे या खास दर्शक वर्ग वाले कार्यक्रमों और श्रेणियों की आती है तब आंकड़े सांख्यिकीय रूप से अस्थिर हो जाते हैं।

हर नया मीटर लगाने की लागत करीब 10,000 रुपये है। नए दिशानिर्देश के तहत 60,000 अतिरिक्त मीटर लगाने का मतलब करीब 60 करोड़ रुपये का खर्च है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि आईबीडीएफ ऐसे माध्यम में इतना बड़ा निवेश करने को लेकर बहुत उत्साहित नहीं है जो लगातार गिरावट के दौर से गुजर रहा है।

वर्ष 2019 में भारत के 21 करोड़ से अधिक घरों में टीवी सेट था यानी करीब 90 करोड़ लोगों तक टीवी की पहुंच थी। लेकिन महामारी और स्ट्रीमिंग सेवाओं के बढ़ते चलन के कारण वर्ष 2025 में यह संख्या घटकर 15.7 करोड़ घरों और 65.9 करोड़ लोगों तक रह गई। यह गिरावट आगे भी जारी रही है। लेकिन बीएआरसी वर्ष 2018 के बाद से टीवी पहुंच के उसी आंकड़े का इस्तेमाल कर रहा है क्योंकि आखिरी सर्वेक्षण उसी साल हुआ था। 

टीवी जैसे वीडियो सामग्री की खपत की असली बढ़त अब डीडी फ्री डिश और कनेक्टेड टीवी (सीटीवी) से हो रही है। डीडी फ्री डिश सरकार के नियंत्रण वाली मुफ्त डीटीएच सेवा है। दूसरी ओर, कनेक्टेड टीवी ऐसे टीवी हैं जो इंटरनेट से जुड़े होते हैं। अब इनकी पहुंच 5 करोड़ से अधिक घरों तक हो चुकी है। 

अलग-अलग माध्यमों के दर्शकों को एक साथ मापना इतना मुश्किल क्यों है खासकर तब, जब ज्यादातर बड़े प्रसारकों के अपने सफल ओटीटी मंच भी हैं। उदाहरण के लिए, जियोस्टार के पास जियोहॉटस्टार है और सोनी के पास सोनीलिव है। डीटीएच, केबल और इंटरनेट, इन सभी माध्यमों पर दर्शकों की संख्या को एक साथ मापने वाली व्यवस्था तैयार करने की अनुमानित लागत करीब 150 करोड़ रुपये है। सवाल यह है कि इसका खर्च कौन उठाएगा?

इससे पूरे मामले की सबसे हैरान करने वाली बात सामने आती है। टीवी पर वास्तव में पैसा खर्च करने वाले विज्ञापनदाता अब तक लगभग चुप हैं। 

फिलहाल ऐसी चर्चा है कि व्यवस्था में निरंतरता बनाए रखने के लिए बीएआरसी को अस्थायी यानी प्रोविजनल पंजीकरण दिया जा सकता है। दूसरी ओर, भारत में नई रेटिंग एजेंसी स्थापित करने में अब तक किसी कंपनी ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है। 

भारत में आर्थिक उदारीकरण शुरू हुए 35 साल हो चुके हैं। देश में पहले कुछ निजी टीवी चैनलों मसलन सीएनएन, स्टार टीवी, सन टीवी और ज़ी का प्रसारण शुरू हुए भी काफी समय बीत चुका है। प्रसारण क्षेत्र के लिए अलग नियामक व्यवस्था बने हुए भी 22 साल हो चुके हैं। इसके लिए भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) जिम्मेदार है।

फिर भी नियमन का तरीका कुछ जाना-पहचाना और थकाऊ-सा लगता है। टीवी उद्योग अब पारंपरिक टीवी से डिजिटल माध्यम की ओर बड़े बदलाव के दौर में पहुंच रहा है। ऐसे में अच्छा होगा कि इस नए दौर की शुरुआत सहयोग पर आधारित व्यवस्था के साथ हो।

First Published : August 17, 2026 | 10:47 PM IST