संपादकीय

Editorial: कॉरपोरेट मुनाफे की रफ्तार तेज, निवेश पीछे; विनिर्माण को नई ताकत देना बड़ी चुनौती

पीएम सलाहकार परिषद की रिपोर्ट के अनुसार, कॉर्पोरेट मुनाफा बढ़ने के बावजूद घटती सीमांत लाभप्रदता और नीतिगत अड़चनों के कारण निजी निवेश रफ्तार नहीं पकड़ पा रहा है

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- August 17, 2026 | 10:42 PM IST

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद द्वारा जारी नए कार्य पत्र में महामारी के बाद देश के हालात में सुधार से जुड़ी एक केंद्रीय कमजोरी को रेखांकित किया गया है। कॉरपोरेट मुनाफा निवेश की तुलना में कहीं अधिक तेजी से सुधरा है। ब्याज और कर पूर्व लाभ (पीबीआईटी) वर्ष 2023-24 में 21.4 फीसदी बढ़ा जबकि सकल अचल परिसंपत्ति केवल 6.1 फीसदी बढ़ी। इससे 15.3 फीसदी का अंतर पैदा हुआ। निवेश महामारी के झटके से उबर चुका है लेकिन उसकी वापसी की दर कमजोर रही है। यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि निवेश संबंधी निर्णय मौजूदा परिसंपत्तियों पर अर्जित लाभ पर कम निर्भर करते हैं और आगामी पूंजी के अनुमानित लाभ पर अधिक।

पत्र में निवेश पर दबाव के प्रमाण मिले हैं जो घटती सीमांत लाभप्रदता की वजह से है। कंपनियां अपने मौजूदा परिसंपत्ति आधार पर लाभप्रद बनी रह सकती हैं लेकिन यदि नई क्षमता से तुलनीय रिटर्न की उम्मीद नहीं है तो वे नया पूंजीगत व्यय टाल सकती हैं। घरेलू कंपनियों और आयात से बढ़ती प्रतिस्पर्धा, वैश्विक औद्योगिक अति-क्षमता, और तेज तकनीकी पुराने पड़ने की संभावना उन कारकों में शामिल हैं जिन्हें पत्र ने संभावित कारण बताया है।

भारत को केवल ऐसी नीतियों की आवश्यकता नहीं है जो कंपनियों को अधिक व्यय के लिए प्रेरित करें। उसे ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो उत्पादक निवेश को अधिक मुनाफे वाला बनाएं। इस संदर्भ में नीति आयोग-क्रिसिल का एक हालिया खाका जो भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में बदलने का इरादा रखता है, 12 ऐसे क्षेत्रों को चिह्नित करता है जिनमें वैश्विक नेतृत्व और पैमाना हासिल करने की क्षमता है।

और यह बड़े पैमाने, बुनियादी ढांचे, तकनीक, कौशल, घरेलू स्तर पर मूल्यवर्धन और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ गहरे एकीकरण पर जोर देता है। भारत का विनिर्माण हिस्सा पिछले दो दशकों से सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) में लगभग 16-18 फीसदी पर अटका हुआ है, जबकि लॉजिस्टिक्स और अधोसंरचना की खामियां, बिखरे हुए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) और सीमित पैमाने की अर्थव्यवस्थाएं प्रतिस्पर्धात्मकता को बाधित करती रही हैं।

क्लस्टर-आधारित विनिर्माण इन बाधाओं में से कुछ को दूर कर सकता है। साझा उपयोगिताओं, लॉजिस्टिक्स, परीक्षण सुविधाओं और सुव्यवस्थित अनुमोदनों वाले एकीकृत औद्योगिक पार्क स्थिर और परिचालन लागत को कम कर सकते हैं, आपूर्तिकर्ता संबंधों को सुगम बना सकते हैं और कंपनियों को पैमाना हासिल करने में मदद कर सकते हैं।

शुल्कों को युक्तिसंगत बनाना भी इस प्रयास का हिस्सा होना चाहिए। आयातित मध्यवर्ती वस्तुओं और घटकों पर उच्च शुल्क घरेलू उत्पादन की लागत बढ़ाते हैं और निर्यात पर अप्रत्यक्ष कर की तरह काम करते हैं। आधुनिक विनिर्माण में जहां उत्पादन कई देशों में फैला होता है वहां प्रतिस्पर्धी कीमतों पर मध्यवर्ती कच्चे माल तक पहुंच वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में भागीदारी के लिए आवश्यक है। इसलिए एक सरल और कम शुल्क संरचना कच्चे माल की लागत को कम करके और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार करके विनिर्माण निवेश के पक्ष को मजबूत करेगी।

वैश्विक मूल्य श्रृंखला का तर्क विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। भारत का वैश्विक विनिर्माण मूल्यवर्धन में हिस्सा 1995 में लगभग 1.5 फीसदी से बढ़कर 2023 में 3.2 फीसदी हो गया जबकि चीन का हिस्सा लगभग 5 फीसदी से बढ़कर करीब 32 फीसदी हो गया। स्पष्ट है कि कंपनियों को बड़े निर्यात बाजारों, विश्वसनीय आपूर्तिकर्ताओं, तकनीक और पैमाने तक पहुंच की आवश्यकता है। जब तक घरेलू शुल्क, लॉजिस्टिक्स और निवेश की स्थितियां भारतीय कंपनियों को वैश्विक उत्पादन नेटवर्क से जुड़ने की अनुमति नहीं देतीं तब तक हालिया व्यापार समझौते सीमित लाभ ही देंगे। 

तकनीकी क्षमता पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पत्र ने अत्यधिक नवोन्मेषी ‘सितारा’ कंपनियों की अनुपस्थिति को एक कारण बताया है कि पहले का निवेश उछाल वापस नहीं आया। वर्ष 2025 में भारत का सकल अनुसंधान एवं विकास व्यय सकल घरेलू उत्पाद का केवल लगभग 0.6 से 0.7 फीसदी था जबकि अमेरिका में यह लगभग 3.45 फीसदी और चीन में 2.58 फीसदी था। यकीनन उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि पूंजीगत व्यय को अनिश्चितकाल तक सब्सिडी दी जाए। इसके बजाय टिकाऊ निजी निवेश तभी उभर कर आयेगा जब कंपनियां निरंतर वाणिज्यिक रिटर्न देखें।

First Published : August 17, 2026 | 10:42 PM IST