प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारत में रिटायरमेंट की तैयारी को लेकर पेंशन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण (PFRDA) लगातार नए और समावेशी कदम उठा रहा है। देश के करोड़ों असंगठित और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा से जोड़ने के लिए नई व्यवस्थाएं लाई जा रही हैं। साथ ही, अलग-अलग वर्गों के लिए पेंशन में योगदान से जुड़े नियमों को भी उनकी जरूरत के हिसाब से आसान और व्यावहारिक बनाया जा रहा है।
लेकिन अक्सर लोगों के मन में सवाल होता है कि क्या नेशनल पेंशन सिस्टम यानी NPS में बिना किसी न्यूनतम रकम की अनिवार्यता के निवेश किया जा सकता है? इसका जवाब है हां, लेकिन यह सुविधा सभी NPS ग्राहकों के लिए एक जैसी नहीं है। अलग-अलग श्रेणियों के लोगों के लिए इसके नियम और योगदान की व्यवस्था अलग-अलग है।
देश में डिजिटल कामकाज बढ़ने के साथ डिलीवरी पार्टनर्स, कैब ड्राइवर्स और फ्रीलांसर्स जैसे गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए पेंशन की राह भी आसान हुई है। PFRDA ने इस वर्ग को पेंशन व्यवस्था से जोड़ने के लिए अक्टूबर 2025 में ‘NPS ई-श्रमिक (प्लेटफॉर्म सर्विस पार्टनर)’ शुरू किया था। इसका मकसद उन लाखों लोगों के लिए लंबे समय की बचत का विकल्प तैयार करना है, जिन्हें पारंपरिक नौकरी की तरह एम्प्लॉयर से जुड़ी पेंशन या रिटायरमेंट बेनिफिट नहीं मिलते।
इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत इसमें पैसे जमा करने के नियम को काफी आसान रखा गया है। इसमें PFRDA की ओर से कोई फिक्स्ड न्यूनतम योगदान तय नहीं किया गया है। हालांकि, PFRDA ने 99 रुपये प्रति माह का जिक्र उदाहरण के तौर पर किया है, लेकिन इसे जरूरी न्यूनतम योगदान नहीं माना जा सकता। प्लेटफॉर्म और वर्कर आपसी सहमति से तय कर सकते हैं कि पेंशन खाते में कितनी रकम जमा की जाएगी।
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PFRDA के मुताबिक, जब NPS में ‘नो मिनिमम इन्वेस्टमेंट’ की बात होती है, तो इसे पूरे ऑल सिटीजन मॉडल पर लागू नहीं माना जा सकता। आम नागरिकों के लिए NPS के ऑल सिटीजन मॉडल में खाते को चालू रखने के लिए कुछ तय नियम हैं। खाता खोलते समय कम से कम 500 रुपये का योगदान करना होता है। इसके अलावा, एक वित्त वर्ष में कम से कम 1,000 रुपये जमा करना जरूरी है। अगर कोई व्यक्ति पूरे साल में यह न्यूनतम रकम जमा नहीं करता है, तो उसका टियर-I खाता फ्रीज हो सकता है।
वहीं, सरकारी कर्मचारियों के लिए NPS की व्यवस्था अलग है। उनके टियर-I खाते में अलग से कोई न्यूनतम एकमुश्त रकम जमा करने की शर्त नहीं होती, क्योंकि उनका योगदान सीधे वेतन से जुड़ा होता है। केंद्र सरकार के कर्मचारियों के मामले में मूल वेतन और महंगाई भत्ते का 10 प्रतिशत कर्मचारी की ओर से NPS में जाता है, जबकि 14 प्रतिशत योगदान सरकार की ओर से किया जाता है।
राज्य सरकारों के कर्मचारियों के लिए योगदान उनके संबंधित राज्य के नियमों के मुताबिक तय होता है। इसलिए सरकारी कर्मचारियों के लिए अलग से न्यूनतम रुपये जमा करने की बाध्यता नहीं है, क्योंकि उनके NPS में योगदान वेतन के आधार पर नियमित रूप से होता रहता है।
PFRDA के मुताबिक, e-Shramik मॉडल में पैसे जमा करने की व्यवस्था काफी हद तक NPS के कॉरपोरेट मॉडल जैसी है। इसमें योगदान के तीन तरीके हैं। प्लेटफॉर्म एग्रीगेटर और सर्विस पार्टनर दोनों मिलकर पैसे जमा कर सकते हैं। दूसरा विकल्प यह है कि सर्विस पार्टनर खुद अपने पेंशन खाते में रकम जमा करे। तीसरे मामले में पूरा योगदान प्लेटफॉर्म एग्रीगेटर की ओर से किया जा सकता है। इस मॉडल में पैसे जमा करने की कोई ऊपरी सीमा तय नहीं की गई है।
इस मॉडल को शुरुआती दौर में बढ़ावा देने के लिए PFRDA ने ‘पॉइंट्स ऑफ प्रेजेंस’ यानी PoP के लिए इंसेंटिव की व्यवस्था भी की है। इसके तहत 31 मार्च 2026 तक इस मॉडल में रजिस्टर्ड नए NPS खातों पर प्रति खाते 100 रुपये तक का इंसेंटिव दिया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए खाते को एक्टिव माना जाना जरूरी है। एक्टिव अकाउंट वह है, जिसमें संबंधित वित्त वर्ष में कम से कम 1,000 रुपये का योगदान किया गया हो। इस व्यवस्था के तहत सर्विस पार्टनर्स से ऑनबोर्डिंग फीस भी नहीं ली जाएगी।
गिग वर्कर्स के काम करने के तरीके को ध्यान में रखते हुए NPS ई-श्रमिक मॉडल में रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया दो चरणों में रखी गई है। पहले चरण में आधार आधारित e-KYC या PFRDA की ओर से मान्य किसी अन्य तरीके से जरूरी जानकारी जुटाई जाती है। इसमें नाम, पता, PAN, मोबाइल नंबर और बैंक खाते की जानकारी शामिल है। KYC पूरा होने के बाद सर्विस पार्टनर की सहमति से उसका परमानेंट रिटायरमेंट अकाउंट नंबर (PRAN) जनरेट किया जा सकता है।
इसके बाद दूसरे चरण में कुछ अतिरिक्त जानकारी देनी होती है। इसमें माता या पिता का नाम, ईमेल ID और नॉमिनी की जानकारी शामिल है। नॉमिनी की जानकारी ऑनबोर्डिंग के 60 दिनों के भीतर दर्ज की जानी होती है।
गिग वर्कर्स के लिए नौकरी या काम का प्लेटफॉर्म बदलना आम बात है। इसी को ध्यान में रखते हुए e-Shramik मॉडल में पेंशन खाते की पोर्टेबिलिटी की सुविधा भी रखी गई है। कोई सर्विस पार्टनर एक साथ कई प्लेटफॉर्म एग्रीगेटर के साथ काम कर सकता है, लेकिन उसका व्यक्तिगत पेंशन खाता एक समय में केवल एक एग्रीगेटर के जरिए खोला जा सकता है। बाद में वह अपने पेंशन खाते को एक प्लेटफॉर्म एग्रीगेटर से दूसरे पर ट्रांसफर या पोर्ट कर सकता है।
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अलंकित लिमिटेड के वेल्थ मैनेजमेंट बिजनेस हेड शरद चंद कहते हैं कि गिग इकोनॉमी के लिए यह एक बड़ा और रणनीतिक बदलाव है। सामाजिक सुरक्षा को केवल पारंपरिक नौकरियों तक सीमित रखने के बजाय अब इसे पोर्टेबल, लचीला और डिजिटल रूप से आसान बनाना समय की जरूरत है। उनका मानना है कि NPS ई-श्रमिक मॉडल प्लेटफॉर्म वर्कर्स को उनकी बदलती आय के अनुसार बचत करने का अवसर देता है, जिससे वे छोटी-छोटी और अनियमित किस्तों के जरिए भी समय के साथ एक बड़ा रिटायरमेंट फंड तैयार कर सकते हैं।
हालांकि, फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का यह भी मानना है कि ‘बिना किसी न्यूनतम सीमा’ वाली व्यवस्था का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि बिना जमा किए खाता अपने आप बढ़ता रहेगा। NPS एक डिफाइंड-कंट्रीब्यूशन और मार्केट-लिंक्ड रिटायरमेंट प्रॉडक्ट है। इसका मतलब है कि सेवानिवृत्ति के समय मिलने वाला कुल कॉर्पस इस बात पर निर्भर करेगा कि व्यक्ति ने कितने समय तक कितना पैसा जमा किया और उस पर बाजार का प्रदर्शन कैसा रहा। PFRDA इसमें किसी प्रकार के निश्चित रिटर्न की गारंटी नहीं देता है।
NPS से बाहर निकलने और राशि निकालने के नियम भी स्पष्ट हैं। नॉन-गवर्मेंट कैटेगरी (जिसमें प्लेटफॉर्म वर्कर्स शामिल हैं) के लिए नॉर्मल एग्जिट के समय कुल जमा राशि का 80 प्रतिशत तक एकमुश्त निकाला जा सकता है, जबकि कम से कम 20 प्रतिशत हिस्सा पेंशन (एन्युटी) खरीदने में लगाना अनिवार्य होता है। यदि रिटायरमेंट के समय कुल जमा पेंशन का पैसा 8 लाख रुपये या उससे कम है, तो ग्राहक को पूरी राशि एकमुश्त निकालने की छूट मिलती है और एन्युटी खरीदना जरूरी नहीं रहता।
यदि कोई ग्राहक सामान्य समय से पहले यानी प्री-मैच्योर एग्जिट करता है, तो उसे अपनी कुल जमा राशि का कम से कम 80 प्रतिशत हिस्सा एन्युटी के लिए सुरक्षित रखना होता है और केवल 20 प्रतिशत ही एकमुश्त मिल पाता है। इसके अलावा, कुछ विशेष जरूरतों के लिए शर्तों के साथ आंशिक निकासी की अनुमति भी दी जाती है। रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली एन्युटी या पेंशन की आय पर इनकम टैक्स के मौजूदा नियमों के अनुसार टैक्स लागू होता है, जबकि पात्रता के तहत मिलने वाली एकमुश्त निकासी टैक्स-फ्री रहती है।