बिज़नेस स्टैंडर्ड के मंथन समिट में रोल्स-रॉयस, मिडवेस्ट और मशरेक इंडिया के अधिकारी अपनी बात रखते हुए
बिज़नेस स्टैंडर्ड के मंथन कार्यक्रम में बुधवार को नई दिल्ली में उद्योग जगत के अधिकारियों ने कहा कि भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अब एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहां ध्यान असेंबली और पैमाने से हटकर तकनीक के स्वामित्व, बेहतर मटेरियल और सप्लाई चेन की मजबूती पर केंद्रित हो रहा है। फिलहाल इस सेक्टर का देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में हिस्सेदारी करीब 17 फीसदी है। रोल्स-रॉयस, मिडवेस्ट और मशरेक इंडिया के अधिकारियों ने कहा कि सरकारी नीतियों का समर्थन, ग्लोबल सप्लाई चेन में बदलाव और निवेशकों का भरोसा नए मौके बना रहे हैं। हालांकि, अभी भी कुछ चुनौतियां हैं। एडवांस मटेरियल, बौद्धिक संपदा (IP) का स्वामित्व और जरूरी खनिजों तक पहुंच में कमी बनी हुई है।
रोल्स-रॉयस में डिफेंस (भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया) के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट अभिषेक सिंह ने कहा कि मैन्युफैक्चरिंग का जीडीपी में हिस्सा 25 फीसदी तक बढ़ाना बेहद जरूरी है, क्योंकि इसके आर्थिक और रणनीतिक फायदे हैं।
उन्होंने कहा, “25 फीसदी तक पहुंचना बहुत महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि हम सभी जानते हैं कि मैन्युफैक्चरिंग क्या-क्या लाभ देती है।” उन्होंने आगे कहा कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर न केवल मल्टीप्लायर प्रभाव पैदा करता है, बल्कि बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन और सप्लाई चेन को स्थिरता भी प्रदान करता है।
सिंह ने इस बात पर भी जोर दिया कि मैन्युफैक्चरिंग “राष्ट्रीय सुरक्षा की मजबूती” और “रणनीतिक आत्मनिर्भरता” से भी जुड़ा है। खासकर आज के बदलते वैश्विक हालात में इसकी अहमियत और बढ़ गई है।
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पिछले एक साल में सप्लाई चेन में कई रुकावटें आईं। इससे यह साफ हुआ कि केवल ग्लोबल सप्लाई पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। खासतौर पर हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग में देश के अंदर क्षमता विकसित करना जरूरी है।
मिडवेस्ट के सीईओ कोल्लारेड्डी रामचंद्र ने कहा कि पहले देश ग्लोबल सप्लाई चेन पर भरोसा कर सकते थे। लेकिन अब यह मॉडल कमजोर पड़ने लगा है। उन्होंने कहा कि पिछले 12 महीनों में पहली बार ऐसा देखा गया है कि यह मॉडल हर समय काम नहीं करता।
उन्होंने कहा कि सिर्फ खनिज निकालना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें शुद्ध करने और प्रोसेस करने की तकनीक विकसित करना ज्यादा जरूरी है। उन्होंने कहा, “असली वैल्यू खनिज में नहीं, बल्कि उसे सही शुद्धता तक पहुंचाने की प्रक्रिया और तकनीक में है।”
भारत में करीब 1 लाख स्टार्टअप हैं, लेकिन इनमें से 50 से भी कम एडवांस्ड मटेरियल पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग में बढ़त हासिल करने के लिए इस स्थिति को बदलना होगा।
कोल्लारेड्डी ने रेयर अर्थ मिनरल्स को बड़ा अवसर बताया। उन्होंने कहा कि भारत अभी लगभग 500 टन रेयर अर्थ ऑक्साइड का उत्पादन करता है, जबकि चीन करीब 60,000 टन उत्पादन करता है। वहीं दुनियाभर में इसकी मांग करीब 75,000 टन है और लगातार बढ़ रही है।
उन्होंने कहा, “अगर सवाल है कि क्या भारत ग्लोबल बाजार का 25 फीसदी हिस्सा हासिल कर सकता है, तो जवाब है- हां, और वह इसे अगले 50 वर्षों तक बनाए रख सकता है।”
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उद्योग जगत के अधिकारियों ने कहा कि भारत का मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम अब बदल चुका है। यह पहले सिर्फ बेसिक असेंबली तक सीमित था, लेकिन अब ज्यादा जटिल और तकनीक-आधारित उत्पादन की ओर बढ़ रहा है।
अभिषेक सिंह ने बताया कि रोल्स-रॉयस ने भारत में शुरुआत एयरो गैस टर्बाइनों की असेंबली और टेस्टिंग से की थी, लेकिन अब कंपनी जटिल मैन्युफैक्चरिंग और को-डेवलपमेंट की ओर बढ़ चुकी है। उन्होंने कहा, “अब हम भारत में को-क्रिएशन के मॉडल पर काम कर रहे हैं, जहां बौद्धिक संपदा (IP) का स्वामित्व भारत के पास होता है।”
सिंह ने यह भी कहा कि भारत में मैन्युफैक्चरिंग साधारण मशीनिंग से आगे बढ़कर अब जटिल और हाई-टेम्परेचर कंपोनेंट्स तक पहुंच चुकी है। इसमें राज्य सरकारों की ओर से जमीन उपलब्ध कराना और स्किलिंग पहल अहम भूमिका निभा रही हैं।
उद्योग जगत के अनुसार, बैंकिंग और सरकारी नीतियों का समर्थन भारत के मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को मजबूत बना रहा है।
मशरेक इंडिया के सीईओ और कंट्री हेड तुषार विक्रम ने कहा कि सरकार की कई पहल इस ग्रोथ में अहम भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव योजना (PLI), राष्ट्रीय विनिर्माण नीति और गति शक्ति कार्यक्रम जैसे कार्यक्रमों को प्रमुख कारक बताया।
उन्होंने कहा कि भारत की बड़ी वर्कफोर्स, मजबूत डेटा इकोसिस्टम और विकसित भारत कार्यक्रम के तहत सरकार का जोर भी मैन्युफैक्चरिंग को आगे बढ़ा रहा है। वहीं कोल्लारेड्डी ने कहा कि PLI जैसी योजनाओं से उत्पादन और विस्तार को गति मिली है, लेकिन रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) को बढ़ावा देने की भी जरूरत है। उन्होंने कहा, “अगर तकनीक आपकी अपनी नहीं है, तो आप हर 5-6 साल में नई तकनीक पर निर्भर नहीं रह सकते।”
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वैश्विक अस्थिरता के बावजूद, उद्योग जगत के अधिकारियों का कहना है कि भारत मैन्युफैक्चरिंग निवेश के लिए एक आकर्षक गंतव्य बना हुआ है।
तुषार विक्रम ने कहा कि वैश्विक निवेशक भारत को एक भरोसेमंद सोर्सिंग डेस्टिनेशन के रूप में देखते हैं। उन्होंने कहा, “दुनिया के लिए यह समय चुनौतीपूर्ण है, लेकिन भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही है।” उन्होंने यह भी कहा कि भारत की गवर्नेंस, कानूनी ढांचा और नीतिगत दिशा वैश्विक निवेशकों को आकर्षित कर रही है।