नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित बीएस मंथन में विशेषज्ञों ने खेती में सुधार, मिट्टी की सेहत और खाद सब्सिडी में पारदर्शिता पर जोर दिया
नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित बीएस मंथन कार्यक्रम में कृषि विशेषज्ञों ने साफ कहा कि भारत अगर दुनिया की फूड फैक्ट्री बनना चाहता है तो सिर्फ निर्यात बढ़ाना काफी नहीं होगा। खेती की बुनियादी समस्याओं को ठीक किए बिना यह सपना पूरा नहीं हो सकता। चर्चा का विषय था कि क्या भारत दुनिया की खाद्य फैक्ट्री बन सकता है। वक्ताओं ने माना कि भारत चावल और झींगा जैसे उत्पादों का बड़ा निर्यातक बन चुका है, लेकिन कई अंदरूनी कमियां अभी भी रास्ता रोक रही हैं।
आईसीआरआईईआर के प्रोफेसर अशोक गुलाटी ने कहा कि अमेरिका और चीन जैसे बड़े देश खेती के उत्पाद आयात करते हैं, जबकि भारत निर्यात करता है। यह भारत की ताकत है। लेकिन एक चिंता भी है। उन्होंने बताया कि 5 साल से कम उम्र के करीब 35 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के कारण ठिगने हैं। उनका कहना था कि गेहूं और चावल में पहले जैसा पोषण नहीं रहा, क्योंकि मिट्टी की सेहत बिगड़ गई है। जब मिट्टी में ताकत नहीं होगी तो फसल में भी पोषण कम होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि मिट्टी को फिर से मजबूत बनाना होगा और खेती के तरीके बदलने होंगे, तभी हम अपनी और दुनिया की जरूरत पूरी कर पाएंगे।
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गुलाटी ने कहा कि सरकार खेती पर काफी पैसा खर्च करती है, लेकिन उसका पूरा लाभ किसानों तक नहीं पहुंच रहा। लगभग 22 प्रतिशत यूरिया खेती में इस्तेमाल ही नहीं होता। कुछ हिस्सा उद्योगों में चला जाता है और कुछ पड़ोसी देशों में तस्करी हो जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि डिजिटल तकनीक और सैटेलाइट की मदद से यह पता लगाया जा सकता है कि असली किसान कौन है, कौन सी फसल बोई गई है और कितनी खाद की जरूरत है। अगर यह व्यवस्था सही तरीके से लागू हो जाए तो हर साल 30000 से 40000 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।
नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने कहा कि पिछले 10 साल में 2024-25 तक खेती की औसत वृद्धि दर 4.6 प्रतिशत रही है, जो अब तक की सबसे ज्यादा है। दुनिया के बड़े कृषि देशों में भारत सबसे तेजी से बढ़ने वाला देश बन गया है और इस मामले में चीन को भी पीछे छोड़ चुका है। कुछ राज्यों में खेती की वृद्धि 7 प्रतिशत तक पहुंच गई है। लेकिन उन्होंने माना कि हर राज्य और हर फसल में समान विकास नहीं हुआ है।
सीएसईपी के अध्यक्ष लवीश भंडारी ने कहा कि भारत खेती के क्षेत्र में सुधार करने में बहुत सावधानी बरतता है। उनका मानना है कि अगर सुधार नहीं होंगे तो असली क्षमता सामने नहीं आएगी। उन्होंने कहा कि जैसे दूरसंचार, शिक्षा और सड़कों में लंबे समय की योजना बनाकर सुधार हुए, वैसे ही खेती में भी कम से कम 20 साल की स्पष्ट योजना बनानी होगी। खेती को ऐसा क्षेत्र बनाना होगा जो देश के लिए अतिरिक्त उत्पादन और आय पैदा करे।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास क्षमता है, लेकिन जमीन की सेहत सुधारनी होगी, सब्सिडी सही लोगों तक पहुंचानी होगी और तकनीक का सही इस्तेमाल करना होगा। अगर यह सब मिलकर किया जाए तो भारत सच में दुनिया की फूड फैक्ट्री बन सकता है।