BS Manthan 2026 में ‘क्या भारत दुनिया का फूड फैक्ट्री बन सकता है?’ विषय पर अपनी बात रखते हुए एक्सपर्ट्स
बिज़नेस स्टैंडर्ड ‘मंथन’ में बुधवार को हुई पैनल चर्चा में एक्सपर्ट्स ने साफ कहा कि भारत अगर दुनिया का फूड हब बनना चाहता है तो केवल निर्यात बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। उनका कहना था कि सबसे पहले तो हमें खेती के लिए मिट्टी की सेहत सुधारनी होगी, उर्वरक सब्सिडी सही किसानों तक पहुंचानी होगी, राज्यों के बीच असमानता कम करनी होगी और बाजार के गलत संकेतों को ठीक करना होगा। इस चर्चा का विषय था “क्या भारत दुनिया का फूड फैक्ट्री बन सकता है?”
एक्सपर्ट्स ने यह भी कहा कि भारत चावल और झींगा जैसे उत्पादों में पहले से मजबूत निर्यातक है, लेकिन अब सटीक खेती को बढ़ावा देने, सब्सिडी की बेहतर टारगेटिंग, बाजार व्यवस्था को मजबूत करने और लंबी अवधि की स्पष्ट नीतियां बनाने की जरूरत है। इससे देश अपनी आबादी और वैश्विक बाजार, दोनों की जरूरतें पूरी कर सकेगा।
ICRIER के प्रोफेसर आशोक गुलाटी ने कहा कि भारत वैश्विक कृषि व्यापार में मजबूत स्थिति में है, खासकर ऐसे समय में जब बड़े ट्रेड समझौतों पर बातचीत चल रही है। उन्होंने बताया कि अमेरिका और चीन जैसे देश कृषि उत्पादों के शुद्ध आयातक हैं, जबकि भारत शुद्ध निर्यातक है। इसके बावजूद देश को पोषण सुरक्षा हासिल करने में अभी कम से कम 20 साल लग सकते हैं। उन्होंने कहा कि पांच साल से कम उम्र के करीब 35% बच्चे कुपोषण के कारण अविकसित (स्टंटेड) हैं।
गुलाटी ने इसे मिट्टी की खराब होती सेहत से जोड़ा। उनका कहना था कि आज हम जो गेहूं और चावल खा रहे हैं, उनमें पहले की तुलना में पोषक तत्व कम हो गए हैं, क्योंकि जमीन खुद पोषण की कमी झेल रही है। उन्होंने कहा कि मिट्टी को फिर से उपजाऊ और स्वस्थ बनाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा। साथ ही रिजनरेटिव एग्रीकल्चर अपनानी होगी और नीतियों, उत्पादों व खेती के तरीकों में बदलाव करना होगा, वरना देश अपनी जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाएगा।
उन्होंने कहा कि खेती को पैसे और संसाधनों की कमी नहीं है, दिक्कत यह है कि वे सही जगह नहीं पहुंच रहे। करीब 22% यूरिया खेतों के बजाय प्लाईवुड जैसी इंडस्ट्री में चला जाता है और कुछ मात्रा पड़ोसी देशों में तस्करी भी हो जाती है।
उन्होंने यह भी बताया कि नीति बनाने वालों को कई बार यह साफ नहीं होता कि असली किसान कौन है, क्योंकि काफी जमीन किराए पर खेती के लिए दी जाती है। PM-Kisan जैसी योजनाएं जमीन के रिकॉर्ड पर आधारित हैं, लेकिन हो सकता है कि रिकॉर्ड में दर्ज मालिक विदेश में रहता हो और खेती कोई और कर रहा हो।
गुलाटी ने सुझाव दिया कि एक एग्री-स्टैक तैयार किया जाए। डिजिटल टूल्स, सैटेलाइट डेटा और उर्वरक बिक्री के आंकड़ों को मिलाकर यह समझा जा सकता है कि जमीन किसके पास है, कौन सी फसल उगाई गई, कितनी खाद की सिफारिश हुई और असल में कितनी खरीदी गई। उनका कहना है कि अगर यह सिस्टम सही तरीके से लागू हो जाए तो हर साल 30,000 से 40,000 करोड़ रुपये तक की उर्वरक सब्सिडी बचाई जा सकती है।
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नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने कहा कि कुछ लोगों का नजरिया सिर्फ नकारात्मक बातों पर टिका रहता है, जबकि सेक्टर की उपलब्धियों को नजरअंदाज कर देते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले 10 सालों में यानी 2024-25 तक भारत की कृषि ने 4.6 प्रतिशत की सबसे ऊंची विकास दर हासिल की है। दुनिया के उन देशों में जहां कृषि GDP का 1 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा है, भारत सबसे तेज गति से आगे बढ़ रहा है और चीन को भी पीछे छोड़ दिया है। कुछ राज्यों में तो विकास दर 7 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो वहां की मैन्युफैक्चरिंग से भी ज्यादा है।
लेकिन चंद ने माना कि यह विकास पूरे देश में एक समान नहीं फैला है। कुछ फसलें और कुछ राज्य पीछे छूट गए हैं।
CSEP के अध्यक्ष और सीनियर फेलो लवीश भंडारी ने कहा कि भारत खेती के सेक्टर को खोलने में जरूरत से ज्यादा सावधानी बरतता है। उन्होंने माना कि अभी कई हिस्से मुकाबले के लायक मजबूत नहीं दिखते, लेकिन जब तक सुधार नहीं होंगे और बाहरी प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं होगा, तब तक असली क्षमता का पता नहीं चलेगा।
लवीश भंडारी ने कहा कि खेती के लिए भी 20–30 साल की साफ और लंबी सोच जरूरी है, जैसे पिछले सालों में टेलीकॉम, प्राइमरी शिक्षा और सड़कों के क्षेत्र में काम हुआ। उनका कहना था कि जहां बाजार ठीक से काम नहीं कर पा रहा, वहां सरकार को आगे आकर दखल देना चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि खेती ऐसी होनी चाहिए जो देश के लिए अतिरिक्त उत्पादन (सरप्लस) पैदा करे।