इलेस्ट्रेशन- अजय कुमार मोहंती
अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा शुल्क को व्यापार नीति के हथियार के रूप में अंधाधुंध इस्तेमाल करने के प्रयास को खारिज कर दिया है। इसके साथ ही ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का एजेंडा कुछ हद तक भ्रमित हो गया है। यह घटनाक्रम एक साथ चकित करने वाला भी था और नहीं भी। जो लोग ध्यान दे रहे थे, उनके लिए यह स्पष्ट हो गया था कि अदालत के न्यायाधीश, यहां तक कि कुछ रूढ़िवादी न्यायाधीश भी प्रशासन के वकीलों द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे तर्कों से आश्वस्त नहीं दिख रहे थे।
दूसरी ओर, ट्रंप को उस अदालत से 6-3 का झटका मिला है जो अब तक उनके उद्देश्यों और तरीकों के प्रति सहानुभूति का रुख रखती आ रही थी। यह बात कुछ हद तक चौंकाने वाली है। सर्वोच्च न्यायालय ने अब तक ऐसे कई मौकों पर हस्तक्षेप करने से इनकार किया है, जब वह हस्तक्षेप कर सकता था। उदाहरण के लिए, उसने निचली अदालतों को राष्ट्रपति द्वारा अमेरिकी सिविल सेवा को कमजोर करने से रोकने की कार्रवाई करने से रोका और उन्हें आव्रजन प्रवर्तन पर उनके अत्यधिक विघटनकारी कदमों को बढ़ावा देने की अनुमति दी। लेकिन इस मामले में, जो ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की पहली कार्रवाई थी, अदालत ने पूरा ध्यान दिया और उसने उनके खिलाफ फैसला सुनाया। यहां तक कि ट्रंप द्वारा नियुक्त दो न्यायाधीशों ने भी प्रशासन के खिलाफ मतदान किया।
यह बात हमें याद दिलाती है कि कैसे कुछ मामलों और हालात में अभी भी एक लोकलुभावनवादी नेता की शक्तियों को जांच-परख के जरिये संतुलित किया जा सकता है। सामान्य रूप से अमेरिका सहित दुनिया भर की अदालतें, उन नीतियों के विरुद्ध स्पष्ट निर्णय देने में बहुत हिचकिचाती रही हैं जिन्हें कार्यपालिका का नेता लोकतांत्रिक जनादेश प्राप्त मानकर लागू करता है। यह निश्चित रूप से ट्रंप के शुल्क के मामले में भी सच है।
आखिरकार, यह उनकी प्रमुख नीति रही है और वे अपने राजनीतिक करियर में, यहां तक कि उससे पहले भी, इसकी उपयोगिता को लेकर असामान्य रूप से सुसंगत रहे हैं। लेकिन इस अवसर पर अदालत ने जोर दिया कि उन्हें कांग्रेस की अनुमति प्राप्त करनी होगी क्योंकि वे उस अधिकार से आगे बढ़ गए हैं जो विधायिका ने कार्यपालिका को सौंपा था। यह ध्यान देने योग्य है कि अदालत के दृष्टिकोण से यह एक बहुत सीमित निर्णय था। प्रशासन ने यह तर्क दिया था कि राष्ट्रपति को शुल्क लगाने का अधिकार दिया गया है और यह उपयोगी तथा उचित भी हैं।
अदालत ने न केवल दूसरी दलील पर कोई निर्णय नहीं दिया, बल्कि विशेष रूप से यह कहा कि वह इस पर निर्णय देने के लिए योग्य नहीं है और केवल अमेरिकी कांग्रेस ही ऐसा कर सकती है। अन्य सर्वोच्च न्यायालय, जो आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप करते हैं, इस विनम्रता से सीख ले सकते हैं।
ट्रंप पर इस निर्णय का असर समय के साथ स्पष्ट होगा। हालांकि इस मामले में मौखिक बहस कई महीनों तक चली है, जिससे उन्हें इस संभावना को समझने का समय मिला कि शुल्क को खारिज किया जा सकता है। इसलिए, यद्यपि उन्होंने सार्वजनिक रूप से न्यायाधीशों पर हमला किया, वे अपने सामान्य उतावलेपन को कुछ हद तक नियंत्रित भी कर पाए हैं। हालांकि, समय बीतने के साथ उनकी नाराजगी और बढ़ सकती है। तथ्य यह है कि उन्होंने शुल्क को अपनी विदेश नीति में डराने-धमकाने के प्राथमिक साधन के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था, और इस हथियार को उनके शस्त्रागार से हटा दिए जाने से वे लगातार निराश और क्रोधित होते रहेंगे।
अब तक अमेरिकी प्रशासन का जवाब यही रहा है कि जहां तक संभव होगा, वह राष्ट्रपति को कुछ व्यापार नीति संबंधी अधिकार सौंपने वाले अन्य कानूनों का उपयोग करके अपने शुल्क के विकल्प तैयार करेगा। एक आधारभूत 10 फीसदी शुल्क पहले ही लगाया जा चुका है। उस कानून के तहत जो 150 दिनों तक 15 फीसदी तक शुल्क की आपातकालीन कार्रवाई की अनुमति देता है। इसका एक कारण यह सुनिश्चित करना भी है कि सरकार को उन कंपनियों को धन वापस न करना पड़े जिनसे वह पहले ही शुल्क वसूल चुकी है।
व्हाइट हाउस जो करने की योजना नहीं बना रहा है, वह भी उतना ही दिलचस्प है। बहुत कम लोग उम्मीद करते हैं कि राष्ट्रपति व्यापार नीति पर स्पष्ट अधिकार देने की मांग करने के लिए कांग्रेस जाएंगे जहां रिपब्लिकन तकनीकी रूप से दोनों सदनों पर नियंत्रण रखते हैं। यह संकेत देता है कि प्रशासन को उस समर्थन स्तर पर उतना भरोसा नहीं है जितना वह दिखाना चाहता है। विशेष रूप से निचले सदन में, जहां पार्टी का मामूली बहुमत इस वर्ष के अंत में होने वाले मध्यावधि चुनावों में स्पष्ट रूप से खतरे में दिख रहा है।
कभी-कभी आधुनिक लोकतंत्रों की संस्थागत शक्ति स्वयं को पुनर्स्थापित कर सकती है। पिछले कुछ दिनों में हमने इसके कई उदाहरण देखे हैं। दुनिया के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति की प्रमुख नीति को उससे छीन लिया गया है। अटलांटिक के पार, ब्रिटिश शाही परिवार के एक सदस्य को उनके जन्मदिन पर ही थोड़े समय के लिए गिरफ्तार कर लिया गया।
ऐसा संभवतः एक आधिकारिक रहस्य लीक करने के कारण किया गया। दक्षिण कोरिया में, एक पूर्व राष्ट्रपति, जिसने तख्तापलट का प्रयास किया था, को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। इसलिए यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि वर्तमान समय के लोकप्रिय नेता, जो राज्य पर चुपचाप कब्जा करने में माहिर होते हैं, हमेशा पूरे तंत्र को अपनी इच्छा के अनुसार नहीं मोड़ सकते। केवल एक या दो संस्थाएं जो प्रतिरोध के लिए तैयार हों, गंभीर कठिनाई पैदा कर सकती हैं।
यद्यपि सबसे प्रभावी नेता अनुकूलन कर लेते हैं यानी हालात के हिसाब से अपने आप को ढाल लेते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप यह सोचकर संतोष कर सकते हैं कि उनके ‘लिबरेशन डे’ शुल्क पहले ही वह संदेश प्रसारित कर चुके हैं जो वे देना चाहते थे। अमेरिका के कई व्यापारिक साझेदार, जिनमें भारत भी शामिल है, इन शुल्क के दबाव में विशेष व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर करने को मजबूर हुए, जिनसे अमेरिकी वस्तुओं की एक विस्तृत श्रृंखला तक पहुंच खुली। आज भी, यदि वे किसी असुरक्षित अर्थव्यवस्था के खिलाफ शुल्क की धमकी दें, तो उस धमकी में कुछ हद तक विश्वसनीयता बनी रहेगी।
उदाहरण के लिए, यह मानना कठिन है कि यूरोपीय संघ अचानक अमेरिकी शुल्क की धमकी को कम गंभीरता से लेना शुरू कर देगा। लोग तो यही मानेंगे कि यदि ट्रंप वास्तव में चाहें तो वे किसी न किसी अप्रत्यक्ष तरीके से शुल्क फिर से लागू कर देंगे। यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि अमेरिका अब भी एक बड़ा और जटिल देश है, और उसे केवल एक व्यक्ति के मुद्दों और उत्साह तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
इसमें कोई संदेह नहीं कि ट्रंप ने अमेरिकी राजनीति में उल्लेखनीय बदलाव किए हैं। उनका पहला वर्ष पद पर अत्यधिक व्यस्त रहा है। लेकिन आने वाले कुछ महीनों में, और जैसे-जैसे मध्यावधि चुनाव नजदीक आएंगे, उनकी शक्ति की सीमाएं और उनके कार्यों के विरुद्ध प्रतिरोध और अधिक स्पष्ट हो सकते हैं।