बैंकिंग तंत्र में परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार जारी है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा देश में बैंकिंग की प्रगति और रुझानों को लेकर प्रस्तुत ताजा रिपोर्ट दर्शाती है कि अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों में सकल गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (जीएनपीए) का अनुपात मार्च 2020 के 8.2 फीसदी के स्तर से घटकर मार्च 2021 में 7.3 फीसदी हो गया। आरबीआई के मुताबिक सितंबर 2021 तक यह अनुपात घटकर 6.9 फीसदी होने का अनुमान है। बैंकों ने दिसंबर 2021 तिमाही में जो वित्तीय नतीजे घोषित किए उनसे पता चलता है कि बैंकिंग क्षेत्र की बैलेंस शीट निरंतर सुधर रही है। बुधवार को इस समाचार पत्र में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार 28 सूचीबद्ध बैंकों ने सालाना आधार पर 64.1 फीसदी वृद्धि दर्ज की। इनका मुनाफा 21.5 फीसदी बढ़ा।
मुनाफे में तेज इजाफा इसलिए हुआ क्योंकि प्रोविजन और आपात व्यय में कमी आई। परिणामस्वरूप इन बैंकों का जीएनपीए 3.5 फीसदी कम हुआ। इस बीच विशुद्ध आय सालाना आधार पर 10 फीसदी सुधरी। बैंकिंग क्षेत्र में निरंतर सुधार से भरोसा मजबूत होना चाहिए क्योंकि इससे वृद्धि और स्थिरता को जोखिम कम होता है। कॉर्पोरेट क्षेत्र के हालात को ध्यान में रखें तो अर्थव्यवस्था में सुधार के साथ भारत निवेश की दृष्टि से बेहतर स्थिति में होगा। सरकार पूंजीगत व्यय को इस आशा में गति दे रही है कि समय के साथ यह निजी निवेश आकर्षित कर सकता है। हालांकि इसमें कुछ समय लग सकता है क्योंकि क्षमता का इस्तेमाल अभी भी कम है और मध्यम अवधि का पूर्वानुमान अनिश्चित है।
यह सही है कि ऋण में सुधार हुआ है और ऐसा खुदरा क्षेत्र की बदौलत हो रहा है। हालांकि आरबीआई ने इस बात को रेखांकित किया है कि कम रेटिंग वाली कंपनियों को कर्ज नहीं मिल रहा है। व्यापक स्तर पर बैंकिंग क्षेत्र की बैलेंस शीट सुधर रही है लेकिन जोखिम बरकरार है। उदाहरण के लिए जब कर्जदारों को दी जा रही मदद वापस ले ली जाएगी तो प्रोविजनिंग बढ़ानी पड़ सकती है। आने वाली तिमाहियों में मुनाफे पर असर पड़ सकता है क्योंकि बाजार की ब्याज दर में इजाफा हो रहा है। बैंकों की बॉन्ड खरीद प्रभावित हो सकती है। यह बात भी रेखांकित करने लायक है कि बैंकिंग तंत्र में सफाई का बड़ा हिस्सा इस वजह से संभव हुआ क्योंकि कर्ज के एक हिस्से को बट्टे खाते में डाला गया। ऐसा नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि ऐसे में निरंतर पैसे डालने की आवश्यकता होगी। उदाहरण के लिए सरकार ने 2014 से अब तक सरकारी बैंकों में 3.5 लाख करोड़ रुपये की राशि डाली है।
परिसंपत्ति की गुणवत्ता सुधरने पर बैंक प्रबंधनों को ऋण मानक सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। यह अहम है खासकर सरकारी बैंकों में। ऐसा करके ही निवेश सुधरने पर परिसंपत्ति की समस्याओं का दोहराव रोका जा सकेगा। इसके अलावा सरकार को ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) की व्यवस्था को मजबूत करना होगा ताकि संकटग्रस्त परिसंपत्तियों को तय अवधि में निपटाया जा सके। जैसा कि इस समाचार पत्र में भी प्रकाशित हुआ था, 360 सदस्यों की आवश्यकता वाले राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट में 63 सदस्य हैं। सरकार को पंचाट को जरूरी मानव संसाधन मुहैया कराना चाहिए और मामलों का जल्द निस्तारण सुनिश्चित कराना चाहिए। इससे न केवल बैंकों को मदद मिलेगी बल्कि पूंजी भी अधिक किफायती होगी। यह बात वृद्धि के लिए मददगार होगी। संकटग्रस्त संपत्तियों के निपटान के लिए सरकार ने परिसंपत्ति पुनर्गठन कंपनी के जरिये एक वैकल्पिक प्रणाली भी स्थापित की है। मौजूदा हालात में तो आईबीसी ही फंसे कर्ज को निपटाने का बेहतर तरीका है। ऐसे में ढांचे को मजबूत किया जाना आवश्यक है।